कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
रविचन्द्रऽनंतं गुरु अंगरूपं । गुरु देव देवं शिरो भूप भूषं ॥ कृतं पार भव सिन्धु यमधार तालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ३ ॥
तीर्थ सर्वे गंगापि गुरु चर्ण माहीं । गुरु कामधेनु कल्पवृक्ष छाहीं ॥ भक्ति ज्ञान वैराग्य फलफूल डालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ४ ॥
गुरु चर्ण तोयं कटे पाप घोरं । लिये गुरु प्रसादं हटे यन्म जोरं ॥ मिटे ताप भवसिन्धु अमृतं रसालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ५ ॥
गुरु शम्भु ब्रह्मा गुरु विष्णु रूपं । गुरु आदि ब्रह्म अनादी अनूपं ॥ गुरुकी कृपा होय व्यापे न कालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ६ ॥
सत्यलोकवासी गुरु मुखविलासी । सो परगटे काशी निर्गुण उपासी ॥ नहीं गर्भ जन्म भये चन्द्रतालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ७ ॥
गुरु काशी सिधायै पंडित हरायै । भक्ति भाव बोध पथ जगमें चलायै ॥ नरपति पाय लागे खुले अनेक भालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ८ ॥
बादशाह पीर परचा लेन काजे । जडे गुरु जंजीरा सो तीरा विराजे ॥ मृतक सुत जिलायै कमाली कमालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ९ ॥
गुरुषोत्तम पुरीमें जलत पण्डा बुझायै । सुने सिद्ध बन्धासो फन्दा छुडायै ॥ बलख ज्ञान करके चितायै नृपालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १० ॥
थीर किये आसा सिन्धु नीरं हटायै । गुरु दरस दे ज्ञान