कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संशय मिटाये ॥ वृक्ष बट प्रगट कर दिखाये विशालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ ११ ॥
सुरनर सुनि नाग सबही गुरु मनावें । नारद सुनि शुक्रदेव गुरुहीकी ध्यावें ॥ गुरु वोइ मित्रं पिता रक्षपालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १२ ॥
गुरु योग योग्यं तपस्यासुरवतं । सो भवं रोग भग्यं गुरु ध्यान धरतं ॥ गुरुकी कृपा होय व्यापे न कालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १३ ॥
गुरु लोक प्रकाशं शसि कोटि भानं । पुरुष रूप कांति कहो को बखानं ॥ गुरु लोक पहुँचे हंस चालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १४ ॥
गुरु मोरि कर्म बहु हंस कीन्हें । सुनो तोहि जाने तबही शर्ण- लीन्हें । दीजे मोहि दीदार लेहु सँभालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १५ ॥
गुरुऽनन्त तारे सकेको बखानी । समावे चिटी पेट सागरको पानी ॥ निगमनेति भाषे तो मैं कौन वालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १६ ॥
अहो गुरु मैं हूँ सदा दास तेरे । हृदय वास कीजे गुरु आन मेरे ॥ भक्ति ज्ञान दीजे सुनो प्रणतपालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १७ ॥
गुरुकी जो महिमा पढे नित्यनेमा । गुरु है कवीरं सो ताहि सो प्रेमा ॥ हरे पाप सब कहे शास्त्र मालं । नमो गुरु दयालं कवीरं कृपालं ॥ १८ ॥
१ लं माला-समूह अर्थात् सब शास्त्र ।