कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 968 में से
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कवीरपंथी-
स्तोत्रदशक ।
नमस्कार बार बार सुन हमार सतगुरुं । तिभिर हरण तमसू दलत शरन पाल सुरवरं ॥ प्रकाशवान् तेज भानु भक्त भूप सरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ १ ॥
अमर लोक अरु अशोक सर्व दुःख नाशतं । तुव निवास सुख विलास, बहु प्रकाश शास्वतं ॥ आदि पुरुष आप हैं, जहाँ अलेख अक्षतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ २ ॥
सर्व गुननिधान कृपासिन्धु नागरं । सो प्रगटे अवनि आय ज्ञान गम्य उजागरं ॥ अनंत रूप ऊपमा सके सो कौन अरुयतं । युगन युगन हो कवीर जरण शरण ररुयतं ॥ ३ ॥
सर्वाजित विद्या रीति सर्व देश जीतियं । तोहि निहार गयो हार गात इंकार वीतियं ॥ काशी वासी पंडित भये निराश झरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ॥ ४ ॥
पादशाद दगा चाह गयन्द लाय गर्जनं । तुम दयाल हो विलास सिंहनाद तर्जनं । तोरि जझौर भये तीर रहे सर्व थकयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ५ ॥
रंक राव बलख आदि सकल जीव तारनं । तजि अमीर हो फकीर ज्ञान गम्य धारनं ॥ भक्ति पक्ष शुद्ध लक्ष थके जो स्वाद थकयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ६ ॥
पतित बहु परे पाय शरण भक्त वत्सलं । जानि दास भेटि त्रास दीन बास अविचलं ॥ सदा सुख नाहिं दुःख हंस शब्द परसि छकयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ७ ॥
विरद रावरो संभारु हो दयाल दुखहरं । ले उबार विघ्न टार अघ निवार सुख करं ॥ भेटो त्रास करत काल सब जिव भरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ८ ॥