कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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गंग बारि करे पुकार सुन हमार समरतं ॥ त्राहि त्राहि शरण पाहि सखमाया अत्रतं ॥ अगाध महिमा साधु जाने सुनि देव यरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ ९ ॥
सांझ सवार नेम धार गुण तुम्हार उच्चरं । तुम कवीर हरण पीर करण तीर भव परं ॥ मैं अज्ञान शरण आयो, राख शर्म सरुयतं । युगन युगन हो कवीर चरण शरण ररुयतं ॥ १० ॥
स्तोत्र ।
जय दीन दयाल कृपाल हितं । मद लोभ रू मोह सदा रहितं ॥ अनवद्य अखण्ड अनादि अजं । सुर सन्त कविन्द्र मुनिन्द्र भजं ॥ १ ॥
वगियान वरेष्ट सु ब्रह्म वरं । छर अच्छर आतम पारपरं ॥ सत्यनाम कवीर गंभीर धयं । अणिमा महिमालघिमा सिधयं ॥ २ ॥
शिव सिद्ध सुरेश मुनीश अबे । मिलि माधव संत बंदे जो सबे ॥ गुण ज्ञान निधान विज्ञान अयं । निर्भय निर्मल सुख ब्रह्म स्वयं ॥ ३ ॥
उद्याचल ऊपर सूर दसा । वचनामृत पोषन चन्द्र जसा ॥ अक्ष-पाल कृपाल हमेश वर । हनुमन्त सुधारन काज परं ॥ ४ ॥
सनकादित ज्ञान जैसे गहिरे । सर्वलोकमें नारद ज्यों बिहरे । सर्व योगिन गोरख भीर यती । सत्य धारणसो हरिचन्द्र सती ॥ ५ ॥
गिरजापति नित ज्यों ध्यान धरं । अचलं गिरि सिंधु समं समरं ॥ शुक्रदेव जैसे गुरु ज्ञान गनं । सब दासन पार परं समनं ॥ ६ ॥
वचनं किरनं जन कञ्छ खिलोतव नाम लिये सत्तलोक मिले । वर्णाश्रम गायन वेद धुनी । सबके पर आप बिराज मुनी ॥ ७ ॥
नव खण्ड विहंडन काल कले । ब्रह्मण्ड इकीस जु आप गले ॥ भय टारन हारसो आप आजै । तेहि कारन आतम राम भजै ॥ ८ ॥
उस कारण आप सदा अजयं । जग काम रू क्रोध सबै तजयं ॥ गजराज प्रचण्ड मतंग गजा । जहैं केहरि सावक आप सजा ॥ ९ ॥