कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
असुरं मद मत्सर जो गजिहैं। तुव सींह आवाज सुनी भजिहैं॥ मन लोलुपता बहु दादुर जे। तेहि भक्षक पत्रग हो अँकजे १०॥
अब दीन दयाल कवीर गुरु। नित्य दीजिये प्रेम जो प्रीति करूं ॥ गुरु सागर नागर आप असे। परकाशक सो जग सूर जसे ॥ ११ ॥
गत रोग न दोष न मान मदं। अचलं अमलं सुखदं शुभदं। सिद्ध साधक हार रहे सगरे। पक्ष धुन्द धरे चकरार गरे ॥ १२ ॥
सुलतान नरेश अडे चरचा। बहुवार अनेक दिये परचा ॥ त्रिय रूप भये हग देखतही। उघरचो हियरा गुरु पेखतही १३॥
नृप साधु गये जग जानत हैं। गुरु ब्रह्म कवीरहि मानत हैं ॥ पवनं नभ तेज पृथ्वी रु जलं। सब खंडि आप सदा अचलं १४
शब्दादिक पंच विषय सबही। तेहि व्यापत नाहिं कदी कबही ॥ शरणागत पालक आप सुनो। अदमाँ पद दायन मान गुनो ॥ १५ ॥
महिमा बहु एक रसाय समं। वरणो कहि बात गुनी बचनं॥ कविता शुद्ध आप कृपा चरणं। जन आतमराम सो है शरणं १६
स्तोत्र सप्तक।
जै जै भवतारण भर्म निवारण हंस उबारण तव शरणं। शब्द विलासी अकह अविनाशी सत्य प्रकाशी भय हरणं ॥ १ ॥
निर्मल दयालं सार कृपालं आप विशालं अभय करणं। सतचित भावन रूप अजावन आतम पावन तेहि शरणं ॥ २ ॥
यह जिव अविनाशी ब्रह्म विलासी जगत प्रकाशी आप भये। आपहिं कीन्हा मति नहिं चीन्हा पंचमभिन्न सुरूप लगे ॥ ३ ॥
गुण आकर संगे चित मन रंगे चाल विहंगे भूल परे। विन रूप गुसाई अदल चलाई शून्य बसाई न्यार भये ॥ ४ ॥