कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 968 में से
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कवीरपंथो-
मुनि केशव वेष गणेशनुतं, सुरराज विराज नरींद्रनुतं । सनकादि फणीन्द्र कवीन्द्रनुतं, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ २ ॥
करुणामय रूपमनंत कलं, पदपंकजरेणु विशुद्धं जनं । पुंज हरं मति शुद्ध करं, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ३ ॥
श्रुति सार विचार इति विभुक्तं, हरिचन्द्रकला संभा विपुलं । कवि वंदित पाद सरोजयुगं, गुरुदेवमजं० ॥ ४ ॥
निज रूप मदं फल मोक्ष ददं, सरलं वरदं सुख सिंधु तरं । कलि काल विकार सो मोह दह, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ५ ॥
यमभीत हरं पर हेत तनुं, कलु साफ हकं रिषु काम दहं । शिव जीव विचार मनो विरतं, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ६ ॥
मद मोह विभंजन सूरपटं, द्विपदं द्विभुजं नररूप शुद्धं । विदुषाहृद मोदकरं वचसा, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ७ ॥
सम दृष्टि सुवाद मनो विरतं, भ्रम जालकवाद वितर्क मतिं । शुभदं पद सार कवीर वरं, गुरुदेव मजं विमलं० ॥ ८ ॥
स्तोत्र अष्टक ।
विभुं व्यापकं शुद्ध धीरं गंभीरं । सदाशिवरूपं प्रकासी निरीहं ॥ अमोल्यं अडोल्यं अशोच्यं प्रखामि जपेहं भजेहं कवीरं नमामि ॥ १ ॥
निहीसो निराकार निर्वाण रूपं । चिदाकाशमाकाश साक्षि- स्वरूपं ॥ अभेद्यं अछेद्यं धनी अंत्रजामि । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥ २ ॥
विषयपंच कोशादिव्यापे न तेही । मदादिक माहि नहिं शोक जेही ॥ ऐसा सु प्रिये गुरु हे मोहि स्वामी ॥ जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥ ३ ॥
स्वयं सिंधुराशि क्षमाके प्रकाशी । दयानिधिवासी सबे सुख रासी ॥ सोई धर्मदास गोसाई सुपासी । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥ ४ ॥