कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(१५१)
बूडत जो अघ कुंडनमें, यम फन्दन फूँक समूह बधोतो । कर्म अकर्मनके गजरा, शिर पायतलोधर आन खगोतो ॥ ठावन ठान कुठान सबै तजि, कंचन काँच उठाय लयोतो । को भवसिन्धु उबारत जीवन, जो कलि नाम कवीर न हो तो ॥ २ ॥
जो प्रभु स्वर्ग पताल करे सब, जो प्रभु लोक अखंडित छाये ॥ जो प्रभु खान रचे पर चार, वही प्रभु वेद सुवेद बनाये ॥ सो सर्वज्ञ कहे सुखलाल, रमो सबही नर भेद न पाये । सो प्रभु नाम कवीर कहाये, उबारन जीवनको जग आये ॥ ३ ॥
दै निज नाम लखाय हिये, सत शब्द गहे सत लोक सिधाये । जीवनको अपनो करिकै, गुरु ज्ञान अखंडित सो दरसाये ॥ हे प्रभु ब्रह्म अपार अगोचर, को बरने गुरुके गुन पाये । सो प्रभु नाम कवीर कहाये, उबारन जीवनको जग आये ॥ ४ ॥
कवित-काशी है सुवश नगर प्रभुको निवास जहाँ, सन्तन शिरताज वास देखो हग मीरको । भारी अघ पुंज कैंपे देखि दयाको सिन्धु, बरने को लोक शोभा गुनके गँभीरको ॥ कहे सुखलाल शुक्र शोभित प्रकाश जाको, ताहिको निशान शुक्ल अति सुख हीरको । कहे सुने शम्भु गौरा जागे नर नाहिँ बौरा, भागे यम जौरा चौरा परसे कवीरको ॥ ५ ॥
सद्गुरु ब्रह्म कवीरको, जप मन बारम्बार ।
विना तपे फल मिले, परे न यमकी धार ॥
अथ कवीरपञ्चाशिकाप्रारम्भ ।
(कवीरमानुप्रकाश पृ० २८०)
तोटक छन्द ।
जय सत्य कवीर कृपाल घनं । दल दुष्ट हनं पय पुष्ट जनं । योगजीत अतीत पुनीत प्रभु । बपु धारन कारण तारन भू ॥१॥