कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सत सुकृत सत्य स्वरूप सदा । जन ध्यावत पावत मुक्ति- पदा ॥ मुक्तामनि ते जिव जो जुगता । मृत्यु लोक ससोक न भव जुगता ॥ २ ॥
हम दीन दुखी किमि त्याग चहौं । करुणामय हो करुणामयहो॥ करुणा तन धारि करी करुणा । करुणामय धौं करुणा वरुणा॥३॥
सुर सिद्ध बखानत खान दया । जिव देखि अनाथ सनाथ किया ॥ जेहि ज्वाल जला यम भक्ष करे । विनु देव दयाल को रक्ष करे ॥ ४ ॥
यम जालिम जीवन जेर कियो । सुधि लेन दयानिधि देर कियो॥ सुख लेश न केत क्लेश भरे । जगदीश परे जगदीस परे॥५॥
जिव काल करालके ज्वाल दहे । तर ऊपर भूपर धाय गहे॥ हम जानि दयाल जो काल भजे । गुण ग्राम प्रनाम सो नाम तजे॥६॥
घटवाह मलाह सलाह कहो । फिरि कैलकी गैलकी सैल न हो ॥ वह सिंह समान शिकार करे । पिय पीव विना कहँ जीव तरे ॥ ७ ॥
हरि केहरि देहरि पार करो । सरकार बडे वर कार करो ॥ भय भंजन रंजन दासनको । खल डाटत काटत कासनको ॥८॥
भवसागर झागर काल बली । तहँ जीवकी उक्ति न युक्ति चली ॥ नहिं एक उपाय बनाय बनी । करु काज गरीब निवा- जगनी ॥ ९ ॥
प्रभु पेखतही जिव शीतल है । क्षणमें भवसिन्धुको पार लहे ॥ करुणा दग कोटिन काल हने । सुर सिन्धु कणा गिरि बिन्दु बने॥१०॥
मति धीर कवीर कवीर भजो । हित नाम प्रिया वित वाम तजो ॥ तपखान किरसान शिलादहके । जरते जिव प्रभु मार- गते वहके ॥ ११ ॥