भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१५५)

जग बन्दन भर्म निकन्दन है। शरनी शतलोककी सन्दन है ॥ सतनाम सनेह सुधाम चढे। कलिमां कलिमां कलिमां ह पढे ॥ ३२ ॥

गुण ग्राम निकास कवीर कवी। यश गावत पावत कोटि छबी ॥ धुरधर्मधरा धर धारक हो। भवतारक पंथ प्रचारक हो ॥ ३३ ॥

नर पामर धामर बुद्धि बिना। यम ज्योति पतंगके ढंग बना ॥ जग व्याधि रु आधि असाध करे। चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥ ३४ ॥

भवतारण हेत निकेत कृपा। पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥ सुर भूप स्वरूप अनूप छिपा। रवि सोम जो कोटिक रोम दिपा ॥ ३५ ॥

गुरु गुप्त कियो धुरको बरनन। भव और भया बन तो शरनन ॥ हमरे उसके पुरवास करौ। निजु दासनको अब दास करो ॥ ३६ ॥

बिन कन्तके भवजल जन्त घने। दुःख द्वन्दक फन्दक फन्द फने ॥ जग नाहकी बाँह निबाह लहे। भ्रम भोडर में भेडर भीर बहे ॥ ३७ ॥

दनुजात बलात निपात भये। रणधीर वहीर गहीर गये ॥ जिहि जानत जाम सुधार धरे। मुनिके मन मंदिरमें विहरे ॥ ३८ ॥

मन मत्त मतंग मते यहि गौ। तुहि रावत होय महावत जौ। चित्त चञ्चर वञ्चर वञ्चक है। सम सञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥ ३९ ॥

यम वंकट संकट जीव महा। दमको गमको रमको न रहा ॥ भव सेत अभै पद देत तुही। कलि कण्टक कोटिन कर्म दही ॥ ४० ॥

चटि सेत पपीलन दील। तहाँ लंघेदीन पयोनिधि पीन महा। न वञ्चको हाड न चाड रहो। मन वाक शरीर कवीर कहो ॥ ४१ ॥

गुरु नेइ नदी सन दीस जिन्हैं। सुख वास न आस है त्रास