भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१५६)

कवीरपंथी—

तिन्हैं ॥ तुम दीनन बन्धु न पीननके । नित पास हो दास अधीननके ॥ ४२ ॥

मद मान भला न हिये अर भौ । नर नागर सागर भौ गरभौ ॥ करि पाप कलाप करे दुनिया । विष बीज अभी फलको लुनिया ॥ ४३ ॥

हरिमें हरिमें हमही बरषे । लहरी भव भक्ति हरी हरषे ॥ दुख दारिद वारिद ज्ञान घन । निर्भय करि भय समनं समनं ॥ ४४ ॥

जिव कालके जाल परे बपुरे । सतनाम निकाय सदा जपुरे ॥ गुरु भक्ति निनार किनार गहे । चतुरे लुतरे भवधार बहे ॥ ४५ ॥

भ्रम भूलते भूलते जात भगे । बुध बालन डालन पात लगे ॥ मन वाचक जाचक हौं दरको । तुम छोड़ अजोड़ सभी घरको ॥ ४६ ॥

प्रभु नामको दान निदान चहौं । कोइ आस रु बास विकासन हो ॥ तरनी बरनी तव नाम जहाँ । गहिये लहिये विश्राम तहाँ ॥ ४७ ॥

रसना रस रास रसै रस सो । जस तो वस और सबै कस सो ॥ चढ नाम रथागढ़ बीत विथा । रसना रस ना विन कीर्ति कथा ॥ ४८ ॥

पद पंकज प्यार जो छूटि गया । अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥ ठग ठाकुर आनिके जूटि गया । जग जीवनकी बुधि टूटि गया ॥ ४९ ॥

रहगीर मते बड़ी भीर भई । सतपंथ बिहाय कुपंथ लई ॥ गुरु भक्ति विना भव भूलि पडे । शरणागत पाहि कवीर हरे ॥ ५० ॥

दोहा—यह कवीरपंचाशिका, पढि सप्तीति परतीति ।

परम पुरुष पद पावई, काल कष्टको जीति ॥

इति श्रीकबीरमानुप्रकाशान्तर्गत श्रीकबीरपंचाशिका स्तुतिः समाप्ता ।

गुरु स्तोत्र ॥

गुरु दीनदयालं जन-प्रतिपालं, मेट विशालं जमजालं संतन रक्षपालं वचन रसालं, अतिहि कृपालं अतिकालं ॥ अति दुस्तर चालं पंथ करालं, अलमस्त हवालं सुख सालं । जय परमानंद