कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ १ ॥ गुरु ब्रह्मस्वरूपं पुरुष अन्तृपं, सदा समीपं दिव्य सूरूपं । इच्छा जब कीन्हा जग पग दीन्हा, भगत प्रवीना संतनभूपं ॥ वैराग निधाना ज्ञान विज्ञाना, धुन ध्यान अन्तृपं उर मालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ २ ॥ चारों युग आये संत कहाये, भर्म मिटाये जन केरा । जे जन मन भाये ते अपनाये, सत शब्द हठाये जल बेरा ॥ न पाखंड पूजा देव न दूजा, दिल आतम हेरा लख लालं । जयपरमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ३ ॥ बंकेज बचाये सहतेजी पाये, चतुरभुज गाये मतभारी । धरमन बुद्ध आगर सबगुण सागर, पंथ उजागर कुलतारी ॥ द्वादश शिष्य सारे पंथ पियारे, सत शब्द बिचारे सुन आलं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ४ ॥ गनिका संग लीना ता रंग भीना, करमें कर दीना हंसि डारी । काशी पुर बासी भये उदासी, देख खवासी मति स्वारी ॥ सब बोल अबोला राव अडोला, पगपर जल डारी बुझि झालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ५ ॥ पातशाह रिसाना अहमक कूँफराना, बेपीर हराना कर डारी । पग डार जंजीरा बोरे नीरा, गंगा तीरा फंद टारी ॥ गयंद झुकाये सिंह दिखाये, बासंदजाली चंद तालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ६ ॥ सिकंदर पीरा भयो अधीरा कह गुरु पीरा बल जाऊँ । तेहि नाम तमाली कही कमाली, मन भई खुश्याली सुधमान् ॥ कमाल जियाये सुरदार उठाये, सत-