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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(१५७)

पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ १ ॥ गुरु ब्रह्मस्वरूपं पुरुष अन्तृपं, सदा समीपं दिव्य सूरूपं । इच्छा जब कीन्हा जग पग दीन्हा, भगत प्रवीना संतनभूपं ॥ वैराग निधाना ज्ञान विज्ञाना, धुन ध्यान अन्तृपं उर मालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ २ ॥ चारों युग आये संत कहाये, भर्म मिटाये जन केरा । जे जन मन भाये ते अपनाये, सत शब्द हठाये जल बेरा ॥ न पाखंड पूजा देव न दूजा, दिल आतम हेरा लख लालं । जयपरमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ३ ॥ बंकेज बचाये सहतेजी पाये, चतुरभुज गाये मतभारी । धरमन बुद्ध आगर सबगुण सागर, पंथ उजागर कुलतारी ॥ द्वादश शिष्य सारे पंथ पियारे, सत शब्द बिचारे सुन आलं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ४ ॥ गनिका संग लीना ता रंग भीना, करमें कर दीना हंसि डारी । काशी पुर बासी भये उदासी, देख खवासी मति स्वारी ॥ सब बोल अबोला राव अडोला, पगपर जल डारी बुझि झालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ५ ॥ पातशाह रिसाना अहमक कूँफराना, बेपीर हराना कर डारी । पग डार जंजीरा बोरे नीरा, गंगा तीरा फंद टारी ॥ गयंद झुकाये सिंह दिखाये, बासंदजाली चंद तालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ६ ॥ सिकंदर पीरा भयो अधीरा कह गुरु पीरा बल जाऊँ । तेहि नाम तमाली कही कमाली, मन भई खुश्याली सुधमान् ॥ कमाल जियाये सुरदार उठाये, सत-

(१५८)

कवीरपंथी

शब्द सुनाये हृद रूयालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंद- कंदं जनपालं ॥ ७ ॥ जग जीवन तारे रतन उबारे, जग पग धारे हितकारी । युग युग चलि आये हंस चेताये, भरम मिटाये गुरु चारी ॥ अलमस्त दिवाना सब जग जाना, दे परवाना लिख भालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ८ ॥ शिव राम अयाना सब जग जाना, नहीं सयाना लघु- बारं । मैं अपत अपावन गुरु पद पावन, अघपुंज जरवन कर छारं ॥ बड धीरज दीना निर्भय कीना, जग किंकर मारं कर ढालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनन्दकंदं जनपालं ॥९॥

( कवीर महिमासे )

साखी ।

गुरु अष्टककू नित जपै, धरे निरन्तर ध्यान । भक्ति शरी- रहि ऊपजै, ज्ञान विज्ञानसुं जान ॥

॥ गुरु अष्टक ॥

सत सुकृतं सीरं सत कवीरं, अमर शरीरं स्थीरं । अजरम चितं रहे निचितं, त्रिगुण अतीतं गुरु पीरं ॥ अवगत अविकारी विषम विडारी, भ्रमतमहारी परकाशी प्रेम प्रकाशी, काशावासी सुखराशी ॥ १ ॥ माया गो पारं तजत असारं, धारत सारं संसारं । करुणा सुखसागर सब गुण आगर, भेष उजागर जग- तारं ॥ सत नाम सनेहा पुरुष विदेहा, करुणागेशा दुखनाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी काशीवासी सुखराशी ॥ २ ॥ उद बुद जग मूलं माया फूलं, सब जग भूलं त्रिय झूलं । संसारं पारं दुख सुख धारं, सदा असारं जग भूलं ॥ सत गुरु सुख सिन्धो दीननबन्धो, माया द्रन्दु तजनाशी । जय जय अवि-

शब्दावली

(१५९)

नाशी प्रेमप्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ३ ॥ तन मन गत जीतं बचन अभीतं माया अतीतं गत क्रोधं । ममता मद लोभं रहित अछोभं, समता शोभं शुध बोधं ॥ गुरु दीन दयाला जन प्रतिपाला, मेट विशाला चतुराशी । जय जय अविनाशी प्रेम- प्रकाशी, काशीवाशी सुखराशी ॥ ४ ॥ अनवद्य अखंडं सब जग मंडं, अतिहि प्रचंडं गुरु धरमं । सब वर्णाश्रमं भूले भ्रमं. पावन मरमं कर सरमं ॥ थक चारू वेदं न भेदं, ज्योति अछेदं तम- नाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी, काशी-वासी सुख- राशी ॥ ५ ॥ चारों जुगआये हंस चेताये, शब्द लखाये सुख- दाई । मधुवन पग धारे रतन उबारे, चौका सारे गति पाई ॥ धरमनि मन भाये वचन सुहाये, पंथ चलाये तज फांसी । जय जय अविनाशी प्रेम प्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ६ ॥ सुलतान चपेहू डार जंजीरू गंगातीरू भय पारं ॥ महमंत गयंदा मारत अंधा, गर्जत सिंधा मद डारं ॥ पग पर जल डारे पण्ड उबारे, अचरज सारे नृप काशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्र- काशी काशीबासी सुखराशी ॥ ७ ॥ मगहर स्थाना भई घम- साना, विरसिंध पठाना दल साजी । सत गुरु अलसाना चादर ताना, दोउ दीन मुलाना मनराजी ॥ घटका दोय भेहा खोलो तेहा, भूल विदेहा सुख राशी । जय जय अविनाशी प्रेम प्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ८ ॥ आत्म सुख धामं लिख शिव- रामं, सदा अरामं गुरु पासं । अघपुंज नसावन गुरु पद पावन परसत जावन सत्य भासं ॥ विनती सुनि लीजै दरसन दीजै, अपना कीजै अघनाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी, काशीवासी सुखराशी ॥ ९ ॥ (कवीरमहिमासे)

“कवीर” नाम साहात्म्य ।

श्रीपार्वत्यवाच ।

कवित्त-अहो महादेव तीन अक्षरको एक नाम, कहैं कवीर तासो कहो यह को हैजू । देव उपदेव है कि लोक लोकपाल है कि, यतिकि तपी कि सिद्धि साधक लो सोहैजू । योगी योगध्यानी है कि व्रत है कि संयम है, यंत्र है कि मंत्र किधों तंत्र मन मोहैजू । किधों धाम क्षेत्र कोई तीरथको नाम हैं; कहो कृपाकरि जग योग यज्ञ जो हैजू ? ॥ १ ॥

श्रीमहादेव उवाच ।

कहत ककार जासो केवल सो ब्रह्म जानो, मानो वी-शेष बीज अक्षर जगतको । जेते ब्रह्माण्ड पिण्ड आदि अंत-मध्य तहां सो, रमत रकार ज्ञनकार है भगतिको । भावी भूत भवितव्य तीनों अक्षरते न्यारो, नाही सो यही बात प्रमाण वेदमतिको ॥ ताहिंते कहत है कवीर तीन अंकजोरी, मोरि मोरि औरही कहैगे ते अगतिको ॥ १ ॥

जलमें कवीर और थलमें कवीर पांच, तत्वमें कवीर तीन गुणमें कवीर है । विद्यमान जानो यों विशेष अवशेष नाहीं, रहै कैसे निशि दिन ज्यो दृगन नीर है ॥ स्थावर औ जंगमके जेते जीव जगत मांझ, रह्यो भरपूर जैसे जड़ित जंजीर है । ताही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और ही लगावे सो अधीर है ॥ २ ॥

कहत ककार सुखसागर दातारपति, ध्यानके साजन गुरु-ज्ञान बीज बानी है । रटत रकार सो रहित आदि अंत मध्य, कहत चाहत जाकी अकथ कहानी है । गुंगेके सो गुड जोई खाय

श्री १०८ पं० श्री उग्रनाथ साहय

सत्यनाम

कबीरधर्मिन्धर इन्दोरेके भूतपूर्व आचार्य प्रफेसनेश्वर श्री १०८ शंकर सम्प्रदायसमी साहय सत्यनाथसाहारी

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शब्दावली

(१६२)

सोई स्वाद जाने, चुप चाप हूँके कछु बात न बखानी है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और ही कहेंगे ते अज्ञानी है ॥ ३ ॥

थलचर अस्थावर जंगम जगतमांझ, कवीर सबके कायाको अधीश है। विविध विलास हास ममता जपाय यश, छाजत अकाश छाया हगकी कशीस है ॥ राजत रकार रति राग अनु-राग सदा, जगत विभाग केहु तक न ईश है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और भाषे सो तो मूढ विस्वेवीस है ॥ ४ ॥

कंज जैसो फूल्यो इंगला पिंगलाके मांझ पैठि, अज है पवन सो आकाश वाही अंक है। विविध प्रकार ज्ञानी गावत ज्ञान वाही, ध्यानी धरे ध्यान भुक्तिके बीच बंक है ॥ वाही रंकार झनकार करे आठो याम, रसना रटेते नाम कटत कलंक है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि औरही कहे ते यमशंक है ॥ ५ ॥

कहत पिथूरसर सागर अधीश वाही, सुखकी लहरि लहरत आठो याम है। वाहि जो विहारी विहरत बंकनाल बीच, तृष्णा मोह जाल ताको अमि निज नाम है ॥ भूआदि लोक पाल-अतल आदि अंक जेते, तेते मांझ रक्षक प्रदक्षक सो धाम है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और भाषे ताने जान्यो नहि राम है ॥ ६ ॥

करुणाको सुख सागर अगाध राजे गाजे, दिन रात बाजे दुंदुभी अपार है। विविध प्रकार जो विचारे तकुटीके मांझ, मनसा विस्तार ताने दीसे कर्तार है ॥ वाही जो रकार योग रण

कवीरपंथी शब्दावली ६

(१६२)

कवीरपंथी-

संश्राम सदा, कामादिक बैरिनको करत प्रहार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और भाषे ताने जान्यो नहि सार है ॥ ७ ॥

कक्का कामनाको देनहारो है जगत मांझ, बक्वा त्यों विहंग सब इन्द्री जीतवार है। रमत रकार चारों वेदनमें धार धार, बार बार कही सही वाही कतार है नाद और विदक कशिशा है जोरि देखो, मोरि देखो घोटिक की घाटी घनसार है। ताही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और ही लगावे सो गँवार है ॥ ८ ॥

कका कंदर्प जासो वीर्य कहत कोऊ, उलटि चढावे जो बढावे यों कपालमें। विविधि विलासके विषयनते विमुख है, डारे अघधोय खोय लोकलाज हालमें ॥ दया युक्त हैके त्यों निरोगी देह पायके, वही रत्न डर लेके रहै रटत हवालमें। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहैं सो तो जाय जम जालमें ॥ ९ ॥

हीरा मोती पन्ना और अक्षर निहारो सर्व, वही जो ककार चिंतामणि को अकार है। विविध प्रकार महिमाके जिते जाल, तिन्हे जानत मराल संत वही जो बकार है। रचित रकार सो जटित सब लोक ओक, वाकी कलानि मांझ रटत रकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहे सूझे नहि वार पार है ॥ १० ॥

वेद निज अंकनको नाम गुने अंक जेते, तेते और वृक्ष यों ककार कल्प-तरु है। विविध विशेष भाव साक्षी है जगत मांझि, अगर रस चोआ मांझ जानियो अतरु है ॥ राजित रकार सब अक्षर रहित जैसे, विद्युत प्रकारके अकाश भास भरु है। ताहिंते

शब्दावली

(१६३)

कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहै सो तो महा- नीच नरु है ॥ ११ ॥

घटत घटावत बढावत बढत विधु, क कलासेती त्योंही जगत व्यवहार यो । विवेक संबन्धिनि सुबुद्धि जासो कहैं कवि, रसके लहरिकी समूह सो रकारयो ॥ दशो द्वार घेरे पुनि छहु द्वार हेरे घनी, पेटि बीच टेरे निरेहूर दरबार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, तोरि तितुका सो जग होय भवपार यो ॥ १२ ॥

कर्म उद्धार जो सो ककार थिर चरमांझ, विधिहुकी मुक्ति सो पंथपार प्रमाण यो । रसनाके मूलमें पियूष सिन्धु राजे गाजे, निशिदिन बाजे विनु तार करता यो ॥ इन्द्री दशो घेरे दशो द्वार एक जोरि करि, त्रिकुटके मांझ हेरि गंगाजीकी धार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि दे स्वास तब दिसै सिर्जनहार यो ॥ १३ ॥

कलनकी कीर्ति सो कलेश बेलि खंडवेको, विपत्ति बिहंडवेको कहत प्रचंड यो । विविध विलास सत्य लोक आस पास मंद, हांसके प्रकाश कोटि भास करै दण्ड यो ॥ सोह रसवंत रस रूपको स्वरूप जानै, तानै जब सो कठिन करालको दण्ड यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरी, और और कहै ताको सुकृत बिहंड यो ॥ १४ ॥

करुणाको सागर उजागर है काया माझ, क्यों न धसि देखो अवरेखो दशों द्वार वो । विविध भावको विशारद है आठों याम, तजि धनधाम जो विचारे वार पार वो ॥ रमत रमावत रहत दिन रेनि ऐसे, जैसे परमान हैं झरोखाके मझार वो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि और कहै सो तो भूल्यो निज सार वो ॥ १५ ॥

(१६४)

कवीरपंथी—

कमल ते भयो जे प्रकाशी विधि नाम जाको, जगत् विलासी तासु कहत कर्तार वो । विविध प्रकारके विकार दुख नाशवेकूँ, कामादिक फांसवेकूँ करवत कुहाड वो ॥ तीनों गुण राजत रकार माझ माया बाद, अति अहलाद रस सागर को सार वो । ताहिंते कहत हैं कवीर यह तीन अंक जोरि, मोरि और भाषै सो तो छिति पर भार वो ॥ १६ ॥

कहत ककार कलिमल निस्तार जो पैसो, कामादिक भार छार छार करि डारे जो । दुर्जनके वृक्ष भव कानन विदारवे कूँ, ब्रह्महि विचारवेकूँ क्षमा उर धारे जो ॥ रसना उचारे सत भाव पण पारे हानि, बांधि विदारे काम क्रोधको मेटि डारे जो । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, हंसि मुख मोरि लोक लाज को विडारे जो ॥ १७ ॥

कक्का कैवर्त भवसागर उतारे पार, विविधि प्रकार अघ जारन वकार तो । केशवको केवल जो नाम सो रकार जाने सो, ताहीको बखानै भव होय वार पार तो । दान व्रत तीरथ विधान योग यज्ञ जेते, ते ते कह्यो श्रुति मांझि नामहीको लार तो । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी और कहै बूढे कारी धार तो ॥ १८ ॥

कहत करार सो कमलको अकार उर, सबही को प्यारो है उजारो ज्ञानी जनको ॥ कहत विचित्र इतिहास किते वेद मांझ, रसकी स्मृति सो मुख दाता तन मनको ॥ ताहि जो न गावै मुख पावै कहो कौन भांति, मुक्तिको धावै नहि पावै सो एक कनको । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मेरे ऐसेही कहै सो तो सांचे पनको ॥ १९ ॥

कुमोद प्रगट हूँके सुमिरत विधि जाहि, सोइ ककार निरधार

शब्दावली

(१६५)

उर धारिये । सुखके समुद्र माझ अचल बिहार जाको, चल न चित्त ताको अचंचल निहारिये ॥ रहस्य बताऊँ एक राजत अमरलोक, लखिके रकार तन मन धन वारिये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, कोरि सो अक्षर निछावर करि डारिये ॥ २० ॥

कक्षाको कल्याणको निधान खानि जानि लीजे, ववाते विहंगको स्वरूप उर ध्याइये । रहत निरन्तर निर्मल व्याधि खंडनको, विपत्ति विहंडनेको रंकार गाइये ॥ सोई निज साधु जाने निगम अगाध मतो, याहीको लखेते थिरताको पद पाइये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि और कहै ताको सुख न दिखाइये ॥ २१ ॥

कलिके जे कर्म तिन्हैं करत विनाश कवि, छविको कमल फूले हियेमें किलकयो है । विमल सो निर्मल मन है ऐसे जैसे, मीन वारिधिमें चन्दको बलकयो है । राग अरु द्वेष सो विशोक है रकार मांझ, लखि सो तेज पुंज हृदयमें झलकयो है । ताहिते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि तोरि तात बंक नालमें खिलकयो है ॥ २२ ॥

करुणा समुद्र माझ कहत जहाज जासो, सोई है ककार चढ़ि कयों न पार हूजिये । सत्त संधानहीको नाम विस्तार उरधारि, विविधि प्रकार धाय धाय वही धूजिये ॥ रचित रकार गुण नामको प्रमाण सब, है के कोकिला सजग बन मांझ कूजिये । ताहिते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि चित्त डोरि तोरि जग पगु मूजिये ॥ २३ ॥

कहत कंक मणि सब पावन जासों कवि, ताहि वा ककारमें अनेक छवि छहरे । विगरे प्रपंच वाहि उपमा की आंचनि सो, फिर ढरि आवै रूपसागरकी लहरे । रसको समूह समाधान है

(१६६)

कवीरपंथी—

रकार यह, विहर विहर बक नालहि में थहरे । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि और कहै परे भव माझ भहरे ॥२४॥

वही गुणवान जासो कहत गुणीलै लोग, वही योग भोग जासों कहत ककार है । वही है विजय जग जुरै जैत बारनिमें, वही पार जाय जाको नाम यो वकार है ॥ वही रंकार राति घौस ध्वनि लागी रहै, जागि रहै ज्योति सोई दीसै वारपार है । ताही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कीनो जगकानन कुहार है ॥ २५ ॥

कही निज कर्म तासो कटत विकर्म सब, तब है अशंक गावै केवल ककारको । विविधि विहार केते रतिके बढायबेको, चाहो उरहार तो विचारो वा वकारको ॥ वही सर्व ऊपर विराजै रवि राजै तैसे, निशिदिन बाजे गाजे जान यों रकारको । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, ऐसेही लगावै ते प्रस्थान करै पारको ॥२६॥

कलि मांझ केवल सुनामही बतायो सार, वही जो ककार धाइ धाइ करि गाइये । आठहुँ प्रकार योग धारण कहत जासो, वही तो वकार श्वास प्रास गहि लाइये ॥ राग अरु द्वेषको विसारि डार वही सोई, विषय निवार एक रंकार ध्याइये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जागि, कोरी कोरी कृपा पूरो गुरु मिलि पाइये ॥ २७ ॥

कमल पर वासी हैं विलासी कर्तार जासो, कहत विरंचि एक कक्काही को नाम है । कुटिल कटाक्ष मृदुमंजुल चितोनि जाकी, विविधि बितोनि विहरत आठों याम है ॥ लोक परलोक सामर्थ्य रस भानको सो, रटत रकार सब करे पूरो काम है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि स्वास केते गे परम घाम है ॥ २८ ॥

शब्दावली

(१६७)

मुक्तिको पंथ वही कहत विनोद वाहि, केतेके अमोद रहें ककाहीकी माँहि वसि । भक्तिको मारग ललाम अति सरल जानो, कहे वकार धरो ध्यान दिन सांझ वसि ॥ रसनाके मूलमें रकार वसे सुधा जोपै, नेक न पियो रही माते क्यों न वांझ वसि । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, कोरि भलो भावै तो चाखो एकै झाँझ वसि ॥ २९ ॥

सबते सिरै है ज्यों प्रसन्न पर कर्णिकाजु, कारण ककार सब यज्ञको निस्तार है ॥ कहत वकार सो विचार करो बार बार, जन जगमाहिं जानो मानो सारासार है ॥ राम राम रटबो है आठो जाम जोई सोइ, निज नाम ध्यान धाम जानिये रकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी भावै और नरक निर्धार है ॥ ३० ॥

कक्काही कुमोदिनीको भाव निश्चि जानि लीजै, बक्काही विमल मति सूक्ष्म बखानिये । धारना सुलोक शुभ कहत रकार जासो, करि चित्त ध्यान ज्ञान सुरति शर सानिये ॥ कहत विचारिके उचारि साधु लक्षणो ये, करि उर स्वास ऊंची दृष्टितर तानिये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि जो लगावै तासो चित दे बखानिये ॥ ३१ ॥

कंटक अटक सो विमुक्त है ककार यह, सांची गति जानो मानो देखेहि सत्याइये । करि विश्वास श्वास खैचिके अकाश धरि, लरि लरि कालसो वकार रस प्याइये ॥ रमे सबहीमें आये देखत न नेक कोऊ, दोऊ डोरि एक करि त्रिकुटी लखाइये । ताहीते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मेरु नाद बिन्दु अरु चन्द सो लगाइये ॥ ३२ ॥

भूरि भूख आदि लोक जेते हैं तल लो, तेई भवसागर कैवर्त

(१६८)

कवीरपंथी—

यो ककार है । देह जासो कहत विदेह सब सन्त ताहि, ताहि उर लेके करो गेह घनसार है ॥ ररकि ररकि रजनिको है समुह शून्य, मान अवसान को कृशानको दरार है । ताहिते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न करो जोई सोइतो करार है ॥ ३३ ॥

कपट पट छेदा कुबुद्धि अरु काम वेधा, कोधको विभेदा खेदा कलिको ककार यो । सहित आचार है विचाररु प्रमारथको, स्वारथको सोदर सहोदर वकार यो ॥ राग द्वेष नाशै यमहूको आश पाशै हरे, हरि उर गासे तन सासे यों रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि घोरि कोरि कोरी घनसार यो ॥ ३४ ॥

चारहु प्रकारकी मुक्ति जे हैं जगत मांझ, तिनमें सारूप जो का रूप वही जानिले । चौसठ कला है जेते विद्याको प्रधान आन, कीरति बढावन वकार उर मानिले ॥ वही गुरु ज्ञान जामे रहत विवेक प्रण, कीरति गतिमुक्ति रकार छिति छानिले । ताहि ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि त्रिकुटीके छिद्र मांहिं शर सांघिले ॥ ३५ ॥

ज्ञानमें कह्यो है वही, ध्यानमें कह्यो है वही, श्रुतिमें वही, वही सुमृति ककार मथि । बीजमें कह्यो है वही, मंत्रमें कह्यो है वही, यंत्रमें कह्यो है वही, तंत्रमें वकार मथि ॥ जीवमें वही है, दोऊ हगमें वही है सांचे, नेह वही है धृति देहमें रकार मथि । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, कोरिमें वही तृण तोरिमें अकार मथि ३६ ॥

ज्ञानही की नीति सो ककार करे निशि दिन, विमल सुनिर्मल वकार वाणी वर है । रमत रमणीया सदा चार प्रगट यह, देह देही गेहीमें अदेहहीको घर है ॥ करो न विचार सन्तहीयमें स्मरण ताकी, रह्यो भर पूरन अफर धारा घर है । ताहिते कहत हैं कवीर

शब्दावली

(१६९)

तीन अंक जोरि, मोरि मोरि नासिकाके बीचमें रकार है ॥३७॥

दारिद पछारि तितुकासे तोरी डारे तिन्हे, करत निहाल जेसे भूधर ककार यो । अतिरस मोद है विनोद सुखसागर सौ, सब गुण आगर सो नागर वकार यो ॥ हंसनमें कह्यो सो परमहंस सामरथ, वही गतिको गरंथ सो अर्थ रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मारि सब कुमति विदारे काम अरि यो ॥३८॥

करे कर कर्म औ विकर्म किते काटे हाल, करत निहाल सोई कका करतार है । अनुभव विवेक जासों ज्ञान विज्ञान कहे, सकल सयानको सयान यो वकार है ॥ रति है संसारके विकार त्यागवेको सब, जागवेको भँवर गुफामें रंकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न देखो हिये बड़ो निजसार है ॥ ३९ ॥

कठिन है कोमल है मृदु है मयंक सुख, सुख दुख तोरन है रह्यो भरपूर है । जगको जनैता व्यवहारको बनेता वही, कवि कहै केता सो विभेता चक्कर है ॥ न्यारो मखमल सो अकुरो अरिदल त्यौहौं, मारो छल बल प्यारो घरते न दूर है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देख तेरे हियेमें जहूर है ॥ ४० ॥

मित्र अरु वैर भाव कल्पित कहे हैं दोऊ, करो निरधार कोऊ कक्का जुदों जानिल्यो । ज्ञान औ अज्ञान यों उठाये धरे दोऊ जहाँ, वक्वा ही विज्ञान रूप भक्ति भूप मानिल्यो ॥ वही रति ज्ञानको रमावे दिन रैन कई, सोई चित चायसों उठाय हिय आनिल्यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि हग अंशको सु हंस घट छानिल्यो ॥ ४१ ॥

जिते जग पापके पटल लपटाये अंग, करै क्षण भंग कलि

(१७०)

कबीरपंथी—

केवल ककार वर । जेते जगमाहिं वेद विद्याके विपाक फल, सोधि सोधि बोधि बतायो है वकार वर ॥ रसको अभ्यास जिन करे छिन एक संत, वही निज कन्त जासो कहत रकार वर । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि के तनु बेलि गाज सामधार वर ॥ ४२ ॥

चन्दकी कलाते और सूरकी कलाते न्यारो, दामिनी कलाते कृसान ते ककार भिन्न । गुणनते न्यारो जाको कहत स्वरूप साधु, निगम अगाध दुरराध वकार भिन्न ॥ जागृत औ स्वप्न सुषूपतिके आगे बढे, तुरिया माहिं चढै ररकि रकार भिन्न । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि दशों द्वार सो जोरि दे अकार भिन्न ॥ ४३ ॥

कालरूपी व्याल ताके ज्वालका है त्याग तहां, अति बहुभागी जानो कक्का के मझार जू । विविधि ऋचा हैं जेते वेदमें बतावे कवि, तिनके समूह वसे वक्वा निरधार जू ॥ आप डर अन्तरमें क्रीडा करे आठो याम कहा करै दूजे एक कुंज रंकार जू । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि गतिलाय कटै पापके पहार जू ॥ ४४ ॥

कविनकी बानीमें प्रकाश करै आठो याम, सोई वह चैतन्य पुरुष है ककार थिर । संग्रह सकल गुण युक्त है समूत वही, रहै बन्यो सो गुण सन्यो जो वकार थिर ॥ नाम ले लै गावत विदाहत सकल अघ, रटि रटि रागनमें रहत रकार थिर । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो हिये बसत अकार थिर ॥ ४५ ॥

नित्य नइमित्य पराकृत अतिअन्त चारु, प्रलैके समूहमें न विनशें ककार यो । आदि अंत मध्य जेते जीव हैं जगत मांझ, सबहीको मोहे सो है समुझ वकार यो ॥ एकही पुरुष रमि रह्यो सब लोकनमें, थिर चर थावर विथावर रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखै तेरे घट झनकार यो ॥ ४६ ॥

शब्दावली

(२७१)

कायाहूको जाने अरु मायाहूको जाने वही, मुक्तिहूको जाने अरु मुक्ति को ककार वो । राग अरु द्वेष तैं विमुक्त सदा न्यारो रहै, सहे दिन रातिनके वहम वकार वो । अघके जरायबेको दाहक सदा है उर, रतिके रमायबेको राजत रकार वो । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न देखो त्रिकुटीमें सोमधार वो ॥ ४७ ॥

कमल कह्यो है वही श्रुति और सुमृति मांझ, ध्यान धरिबेको एक कका निरधार है। सिद्ध जितनी हैं जानी लीजिये जगत मांझ, तिनहुँको आदि बीज दिन दिन वकार है ॥ रचना रचन सब जीवन जगत माहि, पूरन प्रताप अघताप सो रकार है । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, रंचक जपेते कर्म कटत पहार है ४८ ॥

कला जितनी हैं जग ब्रह्महि विचारि लीजै, कहैं नेति नेति वेदन ककार मांझ । विकला विकास जेते विविध प्रकाश अब, कहे हुलास तेते बास है विकार मांझ ॥ रहित कह्यो मोह शोक्ते प्रसिद्ध वही, रमक झमक सब देखिये रकार मांझ । याही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न देखो सब जगत अकार मांझ ॥ ४९ ॥

अमल कमल गंध दिन दिन बसत जायैं, छिन छिन हंसत विकसत सो ककारमें । गुणके विभाग भाग विविध प्रकाश जेते, तेते सब जानि लीजै अचल वकारमें ॥ रसना रटत जाको नाम दिन रैन नीके, जगमगे ज्योति छुति होत है रकारमें । याहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न देखे सदा हाजिर अकारमें ॥ ५० ॥

करुणाके रूप औ समुद्र वही जान सदा, न्हाये गुणगाये दै बहाये अघ वकार सो ॥ वही साँचो नाम सबे भाग औ विभाग

(१७२)

कबीरपंथी-

माहिं, भरि भरि वहैरे विहारै है वकार सो ॥ भक्ति औ मुकुतिमें अत्यन्त रति जान्यों जाकी, दिन दिन सानो आनो भाव रंकार सो । याहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, तोरि जग रीहि प्रीति जोरिये रकार सो ॥ ५१ ॥

कलिके कलेसन जरायवेको पावक है, संत उर जावक अचल सुहाग कवि । संतत सो विविधि विलास वनमाली वेहि, वानी अधीश्वर है ईश्वर विचारि विविधि ॥ रसनाके बीच बेसे सुधारस बास आछे, वचन विलास हांस अमल प्रकाश रवि । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि ज्ञान पावक हवन कीजे कम हवि ॥ ५२ ॥

सकल ब्रह्मांडको अधार करतार सोई, सोई निराधार है विचार विस्तार कंक । सोई सब कालनको काल महाकाल जानो, सोई यमजाल बिहाल जगमग्यो वक । स्वर्ग पाताल छितिहूमें दशों दिशा सोई, रह्यो रमि रक्षक प्रतक्षक पुरान रंक । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि देखो हिये माहिं अंकित अनादि अंक ॥ ५३ ॥

कलिके कलेशनको तारत निषेध सोई, जाको नाम कक्षा जोइ जग करतार है । रतिके विनोदनको भागी है भैवर सदा, जग वन घन बीच भवन वकार है ॥ रतिके जे धर्म जिन्हैं पोथिनमें गावैं साधु, अगम अगाध बँधे बँधन रकार है । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, सत्य याहि मानो जग झूठो व्यवहार है ॥ ५४ ॥

साँचे साँचे सबद किये हैं जामें बीनि बीनि, छीन सब किये जग करम ककारने । सार सार लीनो और कुसार सब धोय डारचो, यज्ञ कीन्हे भरम पछारी कै वकारने । ध्यान धारणा धरत दिन रातिहू समुझि, भ्रम सब डारे खोई जगके रकारने । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि डोरिलावै ताकै जावै हम वारने ॥ ५५ ॥

शब्दावली

(१७३)

मोहको गवाँवे रोग दोष ले बहावे सब, भाव उपजावे ले पचावे काम कासना। विविधि विवेक ले त्रिविधि ताप हंत करै, उरधरि वाही जनि लावो कोप वासना ॥ केते लोक पालनकी सभा माँझ राजे वही, वही महि मंडन अखंडन रकासना। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और कहे ताको मुक्ति आसना ॥५६॥

कक्काही सकल जीव संभव विचार लीजै, वक्वाही विसर्ग सब संज्ञाको अधीश है। वही है रकार शब्द रूप सो अभासे सदा, संतत प्रकाशे दृग आनन रु शीश है ॥ शब्द अरु सूरति संयोगमें समाय रहे, कुर्भकी वृति गहे लहे वीसो वीस है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो तेरे हिये जगदीश है ॥५७॥

ज्ञान औ विज्ञान मख तीरथ वरत दान, सबही अनाथ नाथ जानिये ककार यो। मन बुधि चित्त अहंकार महाभूत पांचो, सबको मतो है कांचो सांचो हैं वकार यो। शब्द रूप रस औ परस वश है सो नाहिं, अरस चढायबेको दरश रकार यो। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मुसकाये पाँये गूँगेको अहार यो ॥ ५८ ॥

कक्काही कहत करतार किते भावनिको, वक्वाही विलासे अति सागरके पारको। रमत रकार नायकामें रूप भूप हूँके, शोभित सरूप यो कुरुप करतारको। विधि औ निषेध आछो बुरो ये तो माया वाद, विविध विषाद कियो माया और सारको। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि उर खोजिले मतो है भवपारको ॥ ५९ ॥

कक्काही कह्यो है कथनीय वारताके माहि, वक्वा व्याधि नाशवेको अति बलवीर है। शब्द औ स्वरूप सदा मुक्तिको है भूप जोई सोई, घट घट माहिं राजे रणधीर है। ब्रह्म शिव विष्णु केते कोटिन

(१७४)

कवीरपंथी—

तेतीस देव, रहे जोरि जोरि हाथ बड़ी यह भीर है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेकहु दयाके किये हरे पर पीर है ६० ॥

और युग माहिं योग यज्ञ व्रत दान जप, कलिमाहिं केवल सो कक्का अर्थ सार है । विद्याहुको ईश योग यज्ञके अधीश केते, भोगको विलासी वही बन्वा व्यवहार है ॥ रही आठों सिद्धि वार कार माझ वसि नीकै, नवो निद्धि पीकै जीके भयो भवपार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, स्वासको मरोरि त्रिकुटी में निरधार है ॥ ६१ ॥

लोक शुभ करन धरण बल बुद्धि वही, उधरन जक्त अघ हरण ककार है । पूरण प्रताप पद पल्लव नलिन वही, करि मन अलिन दलिन यों वकार है । विरहिनि माझ वही विविधि विहारी वन, वारी अघहारी नर नारी में रकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मन लाय देखो अमृतकी धार है ॥ ६२ ॥

मायाको अधीश वही जो कर्ता कहावत है, जासो कहै कक्कासो भै हक्क है जहानको । गुप्त औ प्रगट उभै धाम निराधारनके, वसि वसि न्यारो है वकार उर आनको ॥ रमत रकार सातों लोकनमें वार पार, विविध विहार प्रतिहार है निसानको । ताही तैं कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, ऊंचे मोरि देख भासै चांदनो सो भानको ॥ ६३ ॥

करम धरम त्यागिवेको यों ककार कही, मोह काटिवेको अघकन्दन विबंद यो । कर्मके विरिछ निवारवेको आठों याम, झुकि २ झुमि २ घूमि घूमि रन्द यो ॥ गुणी गुण धारण विदारण कठिण काल, तन अघ जारन उधारनको कन्द यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख हिये पुनोको सो चन्द यो ॥ ६४ ॥