भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१६७)

मुक्तिको पंथ वही कहत विनोद वाहि, केतेके अमोद रहें ककाहीकी माँहि वसि । भक्तिको मारग ललाम अति सरल जानो, कहे वकार धरो ध्यान दिन सांझ वसि ॥ रसनाके मूलमें रकार वसे सुधा जोपै, नेक न पियो रही माते क्यों न वांझ वसि । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, कोरि भलो भावै तो चाखो एकै झाँझ वसि ॥ २९ ॥

सबते सिरै है ज्यों प्रसन्न पर कर्णिकाजु, कारण ककार सब यज्ञको निस्तार है ॥ कहत वकार सो विचार करो बार बार, जन जगमाहिं जानो मानो सारासार है ॥ राम राम रटबो है आठो जाम जोई सोइ, निज नाम ध्यान धाम जानिये रकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी भावै और नरक निर्धार है ॥ ३० ॥

कक्काही कुमोदिनीको भाव निश्चि जानि लीजै, बक्काही विमल मति सूक्ष्म बखानिये । धारना सुलोक शुभ कहत रकार जासो, करि चित्त ध्यान ज्ञान सुरति शर सानिये ॥ कहत विचारिके उचारि साधु लक्षणो ये, करि उर स्वास ऊंची दृष्टितर तानिये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि जो लगावै तासो चित दे बखानिये ॥ ३१ ॥

कंटक अटक सो विमुक्त है ककार यह, सांची गति जानो मानो देखेहि सत्याइये । करि विश्वास श्वास खैचिके अकाश धरि, लरि लरि कालसो वकार रस प्याइये ॥ रमे सबहीमें आये देखत न नेक कोऊ, दोऊ डोरि एक करि त्रिकुटी लखाइये । ताहीते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मेरु नाद बिन्दु अरु चन्द सो लगाइये ॥ ३२ ॥

भूरि भूख आदि लोक जेते हैं तल लो, तेई भवसागर कैवर्त

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