कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
यो ककार है । देह जासो कहत विदेह सब सन्त ताहि, ताहि उर लेके करो गेह घनसार है ॥ ररकि ररकि रजनिको है समुह शून्य, मान अवसान को कृशानको दरार है । ताहिते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न करो जोई सोइतो करार है ॥ ३३ ॥
कपट पट छेदा कुबुद्धि अरु काम वेधा, कोधको विभेदा खेदा कलिको ककार यो । सहित आचार है विचाररु प्रमारथको, स्वारथको सोदर सहोदर वकार यो ॥ राग द्वेष नाशै यमहूको आश पाशै हरे, हरि उर गासे तन सासे यों रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि घोरि कोरि कोरी घनसार यो ॥ ३४ ॥
चारहु प्रकारकी मुक्ति जे हैं जगत मांझ, तिनमें सारूप जो का रूप वही जानिले । चौसठ कला है जेते विद्याको प्रधान आन, कीरति बढावन वकार उर मानिले ॥ वही गुरु ज्ञान जामे रहत विवेक प्रण, कीरति गतिमुक्ति रकार छिति छानिले । ताहि ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि त्रिकुटीके छिद्र मांहिं शर सांघिले ॥ ३५ ॥
ज्ञानमें कह्यो है वही, ध्यानमें कह्यो है वही, श्रुतिमें वही, वही सुमृति ककार मथि । बीजमें कह्यो है वही, मंत्रमें कह्यो है वही, यंत्रमें कह्यो है वही, तंत्रमें वकार मथि ॥ जीवमें वही है, दोऊ हगमें वही है सांचे, नेह वही है धृति देहमें रकार मथि । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, कोरिमें वही तृण तोरिमें अकार मथि ३६ ॥
ज्ञानही की नीति सो ककार करे निशि दिन, विमल सुनिर्मल वकार वाणी वर है । रमत रमणीया सदा चार प्रगट यह, देह देही गेहीमें अदेहहीको घर है ॥ करो न विचार सन्तहीयमें स्मरण ताकी, रह्यो भर पूरन अफर धारा घर है । ताहिते कहत हैं कवीर