भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177

शब्दावली

(१६९)

तीन अंक जोरि, मोरि मोरि नासिकाके बीचमें रकार है ॥३७॥

दारिद पछारि तितुकासे तोरी डारे तिन्हे, करत निहाल जेसे भूधर ककार यो । अतिरस मोद है विनोद सुखसागर सौ, सब गुण आगर सो नागर वकार यो ॥ हंसनमें कह्यो सो परमहंस सामरथ, वही गतिको गरंथ सो अर्थ रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मारि सब कुमति विदारे काम अरि यो ॥३८॥

करे कर कर्म औ विकर्म किते काटे हाल, करत निहाल सोई कका करतार है । अनुभव विवेक जासों ज्ञान विज्ञान कहे, सकल सयानको सयान यो वकार है ॥ रति है संसारके विकार त्यागवेको सब, जागवेको भँवर गुफामें रंकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि कयों न देखो हिये बड़ो निजसार है ॥ ३९ ॥

कठिन है कोमल है मृदु है मयंक सुख, सुख दुख तोरन है रह्यो भरपूर है । जगको जनैता व्यवहारको बनेता वही, कवि कहै केता सो विभेता चक्कर है ॥ न्यारो मखमल सो अकुरो अरिदल त्यौहौं, मारो छल बल प्यारो घरते न दूर है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देख तेरे हियेमें जहूर है ॥ ४० ॥

मित्र अरु वैर भाव कल्पित कहे हैं दोऊ, करो निरधार कोऊ कक्का जुदों जानिल्यो । ज्ञान औ अज्ञान यों उठाये धरे दोऊ जहाँ, वक्वा ही विज्ञान रूप भक्ति भूप मानिल्यो ॥ वही रति ज्ञानको रमावे दिन रैन कई, सोई चित चायसों उठाय हिय आनिल्यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि हग अंशको सु हंस घट छानिल्यो ॥ ४१ ॥

जिते जग पापके पटल लपटाये अंग, करै क्षण भंग कलि