कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
केवल ककार वर । जेते जगमाहिं वेद विद्याके विपाक फल, सोधि सोधि बोधि बतायो है वकार वर ॥ रसको अभ्यास जिन करे छिन एक संत, वही निज कन्त जासो कहत रकार वर । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि के तनु बेलि गाज सामधार वर ॥ ४२ ॥
चन्दकी कलाते और सूरकी कलाते न्यारो, दामिनी कलाते कृसान ते ककार भिन्न । गुणनते न्यारो जाको कहत स्वरूप साधु, निगम अगाध दुरराध वकार भिन्न ॥ जागृत औ स्वप्न सुषूपतिके आगे बढे, तुरिया माहिं चढै ररकि रकार भिन्न । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि दशों द्वार सो जोरि दे अकार भिन्न ॥ ४३ ॥
कालरूपी व्याल ताके ज्वालका है त्याग तहां, अति बहुभागी जानो कक्का के मझार जू । विविधि ऋचा हैं जेते वेदमें बतावे कवि, तिनके समूह वसे वक्वा निरधार जू ॥ आप डर अन्तरमें क्रीडा करे आठो याम कहा करै दूजे एक कुंज रंकार जू । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि गतिलाय कटै पापके पहार जू ॥ ४४ ॥
कविनकी बानीमें प्रकाश करै आठो याम, सोई वह चैतन्य पुरुष है ककार थिर । संग्रह सकल गुण युक्त है समूत वही, रहै बन्यो सो गुण सन्यो जो वकार थिर ॥ नाम ले लै गावत विदाहत सकल अघ, रटि रटि रागनमें रहत रकार थिर । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो हिये बसत अकार थिर ॥ ४५ ॥
नित्य नइमित्य पराकृत अतिअन्त चारु, प्रलैके समूहमें न विनशें ककार यो । आदि अंत मध्य जेते जीव हैं जगत मांझ, सबहीको मोहे सो है समुझ वकार यो ॥ एकही पुरुष रमि रह्यो सब लोकनमें, थिर चर थावर विथावर रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखै तेरे घट झनकार यो ॥ ४६ ॥