कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
तेतीस देव, रहे जोरि जोरि हाथ बड़ी यह भीर है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेकहु दयाके किये हरे पर पीर है ६० ॥
और युग माहिं योग यज्ञ व्रत दान जप, कलिमाहिं केवल सो कक्का अर्थ सार है । विद्याहुको ईश योग यज्ञके अधीश केते, भोगको विलासी वही बन्वा व्यवहार है ॥ रही आठों सिद्धि वार कार माझ वसि नीकै, नवो निद्धि पीकै जीके भयो भवपार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, स्वासको मरोरि त्रिकुटी में निरधार है ॥ ६१ ॥
लोक शुभ करन धरण बल बुद्धि वही, उधरन जक्त अघ हरण ककार है । पूरण प्रताप पद पल्लव नलिन वही, करि मन अलिन दलिन यों वकार है । विरहिनि माझ वही विविधि विहारी वन, वारी अघहारी नर नारी में रकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मन लाय देखो अमृतकी धार है ॥ ६२ ॥
मायाको अधीश वही जो कर्ता कहावत है, जासो कहै कक्कासो भै हक्क है जहानको । गुप्त औ प्रगट उभै धाम निराधारनके, वसि वसि न्यारो है वकार उर आनको ॥ रमत रकार सातों लोकनमें वार पार, विविध विहार प्रतिहार है निसानको । ताही तैं कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, ऊंचे मोरि देख भासै चांदनो सो भानको ॥ ६३ ॥
करम धरम त्यागिवेको यों ककार कही, मोह काटिवेको अघकन्दन विबंद यो । कर्मके विरिछ निवारवेको आठों याम, झुकि २ झुमि २ घूमि घूमि रन्द यो ॥ गुणी गुण धारण विदारण कठिण काल, तन अघ जारन उधारनको कन्द यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख हिये पुनोको सो चन्द यो ॥ ६४ ॥