कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कर्ता शुभ गाथ धाम जायवेको साथ आये, ग्रन्थ शुभ गाथ नाथ सांचो करतारको । विविध विशेष रोग हरण अशेष वहि, श्रुति मुख देखि अनुपेखि ले वकारको ॥ वहि प्रतिपाल है रसाल ब्रह्म कहै जाहि, धरि धरि ध्यान ज्ञानी गावत रकारको । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि उर देखि हिये मांझ निज सारको ॥ ६६ ॥
कामते रहित कोध लोभ तैं रहित मद, मोह तैं रहित माया रहित ककार यो । विविधि प्रकारके विकार खंड खंड करि, डारे अघ देखतही प्रगट वकार यो ॥ निरंजन भौन माहि चितवत संत जाहि, धरे धाय धाय ध्यान रंचक रकार यो । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि उर देखो तेरे हिये मांझ सार यो ॥ ६६ ॥
जेते अभिलाष जग बासना विलाश वाहि, करि कक्का मांहि वास होये जग पार त्यो । मोहसे नृपतिको विदारवेको अह्व यह, शस्त्र काम जारिवेको धरिलै वकार त्यो ॥ दूरेते विराज सब जीवनसे आठों याम, करिले प्रकाश गुरु ज्ञानसो रकार त्यो । ताहिते कहत हैं कबीर तीनि अंक जोरि, मोरि उर देख नेक कटै जग भार त्यो ॥ ६७ ॥
कौन जाके तुल्य थिर चरमैं विशेष वही, युक्ति अनयुक्तिमें विचारिलै वकार है । जाको विस्तार सब लोकन पसारो पन्यो, रचि रचि धन्यो भाव भन्यो सो वकार है ॥ अतिरमणीय सब गुणनको ज्ञाता वही, दाता सो विज्ञानको प्रधान यो रकार है । ताहिते कहत हैं कबीर तीनि अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो सब जगमें विहार है ॥ ६८ ॥
कलह की खानि कलि कंटक विकंट वही, बंक उर अंक सोई कक्काको विचारि ले । विषमको भाव तामें लेशहु न नेक कहैं,