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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(१७४)

कवीरपंथी—

तेतीस देव, रहे जोरि जोरि हाथ बड़ी यह भीर है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेकहु दयाके किये हरे पर पीर है ६० ॥

और युग माहिं योग यज्ञ व्रत दान जप, कलिमाहिं केवल सो कक्का अर्थ सार है । विद्याहुको ईश योग यज्ञके अधीश केते, भोगको विलासी वही बन्वा व्यवहार है ॥ रही आठों सिद्धि वार कार माझ वसि नीकै, नवो निद्धि पीकै जीके भयो भवपार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, स्वासको मरोरि त्रिकुटी में निरधार है ॥ ६१ ॥

लोक शुभ करन धरण बल बुद्धि वही, उधरन जक्त अघ हरण ककार है । पूरण प्रताप पद पल्लव नलिन वही, करि मन अलिन दलिन यों वकार है । विरहिनि माझ वही विविधि विहारी वन, वारी अघहारी नर नारी में रकार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मन लाय देखो अमृतकी धार है ॥ ६२ ॥

मायाको अधीश वही जो कर्ता कहावत है, जासो कहै कक्कासो भै हक्क है जहानको । गुप्त औ प्रगट उभै धाम निराधारनके, वसि वसि न्यारो है वकार उर आनको ॥ रमत रकार सातों लोकनमें वार पार, विविध विहार प्रतिहार है निसानको । ताही तैं कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, ऊंचे मोरि देख भासै चांदनो सो भानको ॥ ६३ ॥

करम धरम त्यागिवेको यों ककार कही, मोह काटिवेको अघकन्दन विबंद यो । कर्मके विरिछ निवारवेको आठों याम, झुकि २ झुमि २ घूमि घूमि रन्द यो ॥ गुणी गुण धारण विदारण कठिण काल, तन अघ जारन उधारनको कन्द यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख हिये पुनोको सो चन्द यो ॥ ६४ ॥

शब्दावली

(१७५)

कर्ता शुभ गाथ धाम जायवेको साथ आये, ग्रन्थ शुभ गाथ नाथ सांचो करतारको । विविध विशेष रोग हरण अशेष वहि, श्रुति मुख देखि अनुपेखि ले वकारको ॥ वहि प्रतिपाल है रसाल ब्रह्म कहै जाहि, धरि धरि ध्यान ज्ञानी गावत रकारको । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि उर देखि हिये मांझ निज सारको ॥ ६६ ॥

कामते रहित कोध लोभ तैं रहित मद, मोह तैं रहित माया रहित ककार यो । विविधि प्रकारके विकार खंड खंड करि, डारे अघ देखतही प्रगट वकार यो ॥ निरंजन भौन माहि चितवत संत जाहि, धरे धाय धाय ध्यान रंचक रकार यो । ताहिते कहत हैं कबीर तीन अंक जोरि, मोरि उर देखो तेरे हिये मांझ सार यो ॥ ६६ ॥

जेते अभिलाष जग बासना विलाश वाहि, करि कक्का मांहि वास होये जग पार त्यो । मोहसे नृपतिको विदारवेको अह्व यह, शस्त्र काम जारिवेको धरिलै वकार त्यो ॥ दूरेते विराज सब जीवनसे आठों याम, करिले प्रकाश गुरु ज्ञानसो रकार त्यो । ताहिते कहत हैं कबीर तीनि अंक जोरि, मोरि उर देख नेक कटै जग भार त्यो ॥ ६७ ॥

कौन जाके तुल्य थिर चरमैं विशेष वही, युक्ति अनयुक्तिमें विचारिलै वकार है । जाको विस्तार सब लोकन पसारो पन्यो, रचि रचि धन्यो भाव भन्यो सो वकार है ॥ अतिरमणीय सब गुणनको ज्ञाता वही, दाता सो विज्ञानको प्रधान यो रकार है । ताहिते कहत हैं कबीर तीनि अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो सब जगमें विहार है ॥ ६८ ॥

कलह की खानि कलि कंटक विकंट वही, बंक उर अंक सोई कक्काको विचारि ले । विषमको भाव तामें लेशहु न नेक कहैं,

(१७६)

कवीरपंथी—

कामना अकामना सो वक्वा उर धारि लै ॥ जानत हैं नवो रस भावना सो नीकी भांति, भाव उर धारिकै रकार मन मारिलै । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ स्वांस बंकनालमे संभारि लै ॥ ६९ ॥

कायाहीको पालै निश्चिदिन दयापाल वही, कहूणाको सिंधु अरु बिन्दुसो ककार यह । शील गति मिल्यो सनतोष झिलमिल्यो काम, कोध तिलमिल्यो विलविल्यो सो वकार यह । अच्छे शुभ करम भरम धर्म काँचे तहाँ, सब गुण साँचे रंग राचे त्यों रकार यह । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि वही देखि तौसूँ कही बार बार यह ॥ ७० ॥

कंठहिके पंथमें विमान बैठि ऊँचे चढ़ि, दृष्टि गुण मढ़ि बढि कक्काहीके धामको । वही सांचो लोक तामें करै जो विहार सदा, वाके वंकनाल विच्छ धनिंधर बामको ॥ करनी करम सब वरुनी उठाय डारी, मारीके कुबुद्धि चित्त लायो नाम रामको । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देख वाहि तजि और कामको ॥ ७१ ॥

तुरिया जोमोदताको कारणकरनहार, दुखको हरणहार जानिले ककारको । वेद भेद करि करि विधि सो बतायो ज्ञान, विविधि विज्ञान ताहि मानिले वकारको ॥ शुभको करैया वाहि अशुभ हरेया जान, भावको भरेया लखि लीजियो रकारको । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखो हिय सिरज- नहारको ॥ ७२ ॥

जपि २ आपसों विलास करि लेत नीके, जैसे वह भुंगी कीट करत ककार त्यों । बोध करे जीवको सुबोध सब जग माहिं, वधि २ नामसो निधान वो वकार त्यों ॥ निर्मल कहावे धोय

शब्दावली

( १७७ )

मलको बहावे सोई, ध्यानको लहावे उर आवत रकार त्यों । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखो उर राजत अकार त्यों ॥ ७३ ॥

जग सुखदाई भक्ति कारन है आठों याम, मलन विदारन हैं वारन ककार यह । विविधि कुसंग कलि कारन कलेश जेते, तेते अघहरण उधारण वकार यह । निर्मल है भाव जेते रमि २ चावही सो, मुक्तिपर पाव दैदै पायलै रकार यह । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख घट माहिं टनकार यह ॥ ७४ ॥

कमल कलीके मांझ कमलाको कंत वही, वही भगवंत जग ऊपर ककार है । प्रगट विशेष ज्ञान ध्यानके लगायवेको, हरि उर लायवेको राजत वकार है ॥ वही अनुरक्त औ विरक्त सब जक्त माहिं, निगम विहारी जासों कहत रकार है ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मूरि क्यों न देखे तेरे हिये ज्ञनकार है ॥ ७५ ॥

कल्पहीके अंतमें आनन्द है ककार ही को, तीरथ वरतको विलासी सो वकार है । शब्दके स्वरूपमें विराजे अति राजे सोई, मनुष्यमें गाजै ऐसे बाजै सो रकार है ॥ नीके कै विचारै उर धारे संतजन कोई, सोई श्रुति सार कहै लहै वार पार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखि पेखि अति सुखसार है ॥ ७६ ॥

जेते लोक लोकपाल व्योमपाल भौमपाल, कक्काहीको उर माहिं सबहीके जानि लै ॥ भक्ति प्रतिपालक है बालक न बूढो वह, नर है न नारि ताहि वक्वाहीमें मानि लै ॥ पाप अरु पुण्य दुख सुखको विहंडन है, आनन्दको मंडन रकार उर आनि लै । ताहिते

(१७८)

कवीरपंथी—

कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि स्वास इंगला औ पिगलामें तानि लै ॥ ७७ ॥

द्वैत मत खंडन अद्वैत भाव मण्डन है, सगुन विहंडता बढावत ककार यह ॥ विभव बढावत कढावत भवसागर तैं, सुमति बढावन वकार है सार यह ॥ चित्त चितानन्द भावफन्दको निकन्द दुख, दारिद सुछन्द कन्द आनंद रकार यह । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख कामवनको कुठार यह ॥ ७८ ॥

मन वच कर्मन कषाय मल धोय नीके, जगमाहिं करै नित्य कक्काही सो प्रीति रे । बाहरिके विविधि विहार जानि पीके सति, लोकको विहार वक्वा अंतरमें जीति रे ॥ रति मति गति जगमाहिं जे करत नेक, साँची रति अंतर रकार रस रति रे । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख जिनि वृथा दिन बीति रे ॥ ७९ ॥

कलिके कलेश काटिवेको गाये कक्काहीको, वक्वा है विशेष ज्ञान ध्यान करतार यो ॥ राग अनुराग झूठे जगमाहिं लावे मति, करि साँची रति हिये रटन रकार यो ॥ काहेको झंखत हैं फिरत वापी कूपनको, धायके नहाय घाट गंगाजीकी धार यो ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि देख तेरे हिये ज्ञनकार यो ८०

जान कवि चातुरी ककारहीको नीकी भांति, कहत संयोग औ वियोग सो वकार है । धारिवेको धीरज विदारवेको कामादिक, हृदय विचारवेको नीको सो रकार है ॥ झूठो जग संग करै ध्यान माहिं भंग यातैं, दै दै ज्ञान रंग नीके चित्त निरधार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख सब कटत विकार है ॥ ८१ ॥

शब्दावली

(१७९)

जिते जगमाहि किते पापके पूर भरे, करे चूर चूर नेक कक्काके लगाये ते । चित्तकी विपत्ति केती फोरि डारी छिन माहिं, धरि धरि ध्यान वाहि वक्वा उर लाये ते ॥ फूलत कमल दल लोचन छिनक माहिं, रटि रटि राग त्यों रकार गुण गायेते । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, होय भव पार पूरो गुरु हूँठ पायेते ॥ ८२ ॥

जानिवे जो चाहे तोपै जान एको कक्काहीको, भयो जो विशेष चाहे वक्वा उर धारिलै । छुटो चाहे माया ते निहाल हैकै जगमाहिं, करि करि ध्यान त्यों रकार पन पारि लै ॥ जोपै जग माहिं आय युग २ जीवो चाहे, काम कोध मद मोहको विदारिलै । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ स्वास नादबिन्दुको सँभारि लै ॥ ८३ ॥

केवल आनन्दको समूह सोई कक्का यह, योग औ वियोगको विहारी सो वकार है । जेते जगमाहिं सब रोगनकी जाति पांति, होय खण्ड खण्ड ध्यान धरत रकार है ॥ आसन विचारो पान भोजन विचारो सैन, जाग्रत विचारो जग विविधि विकार है । ताहिंते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखे हिये झूठो संसार है ॥ ८४ ॥

काल रूपी व्याल ताने केतिक विनाश डारे, सुरनर मुनि गंध-रवको ककार यो । वही निज मंत्र तंत्र वेदनमें गाय गाय, धाय धाय लागे जासो सोई है वकार यो ॥ वही दिन रात मास पच्छ घटिकाका भाग, वही सूर चन्द्र तारा गणमें प्रकार यो ॥ ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि क्यों न देखो तेरे हिये नतकार यो ॥ ८५ ॥

विन पग धावै विना यंत्रही बजावे तार, गिरा बिन गावे सो लहावे करतारको । तीषनाके विविधि पहारन को फोरि डारे, सब

(१८०)

कवीरपंथी-

करि ध्यान भयो निर्मल वकारको ॥ अमरहिं लोक अरु अमर है नाम जाको, अमर विहार वन वाही है रकारको। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोर हिये भवसागरके पारको ॥ ८६ ॥

करण कहावे वही कारण कहावे वही, करता कहावे वही जानो जो ककार हैं ॥ सुखके समुद्र माहिं करत विहार वही, निराधार औ आधार सोई तो वकार है ॥ पाप ना लगत जासूं जापके करेते नित, अति गति भाव भरयो रहत रकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, याहीकूं निहारि जग झूठो व्यवहार है ॥ ८७ ॥

सांचे सांचे पंथको चलावत है नीकी भांति, झूठे झूठे मारग विदारत ककार यह। अजपा जो जाप ताहि जपि २ आठो याम, थपि २ भावनासो कामना वकार यो ॥ भक्ति अरु मुक्तिके विलास हास जानि मानि मानि सो मनहि मनावत रकार यह। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देख हिये मोतिनको हार यह ॥ ८८ ॥

कपट कपाट तन पटल विडारिवेको, दारिवेको कक्का काम ध्वज शूर वीर है। वेदनके जेते सातो अंग हैं विविधि भांति, तिनके संवारवेको वव्वा रणधीर है ॥ मंगल समूह केते आनंद समूह जेते, धरत रकार सोई हरे पर पीर है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि तौलि खोलि हिये मैं जंजीर है ॥ ८९ ॥

जेते श्रुति सार जेते तत्त्वके विचार जेते, कहै हैं प्रचार सब ककाहीमें मानिलै। अघको हरणहार वेदको धरणहार, भावको भरणहार वव्वाहीको जानिलै। सिद्धनको दाता वही बुद्धिको विधाता वही, सब जग जाना है रकार उर आनिलै। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि जग रीति प्रीति वाहि सो तू ठानिलै ॥ ९० ॥

शब्दावली

(१८१)

कायाहीकी सिद्धि सो ककार मांझ जानि लीजै, दयाहूकी सिद्धि सो वकार माहि जानिये । भक्तिका बढौनि ज्ञान ध्यानको बढौनि चित्त, चेतन चढौनि सो रकारहीमें मानिये ॥ दया उर धारि काहू जीव ना विदारि हरे, हरे पग धारि पूरा गुरु चित्त आनिये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि स्वांस त्रिकुटीको ताकि तानिये ॥ ९१ ॥

लोक सुखदाई दुखदाई है न आठों याम, संतनको भाई गुण सोई है ककार यो । सदाही प्रसन्न वह जगकी हस्तपीर, नेक न अधीर शूर वीर सो वकार यो ॥ भक्तनकी दाम रचि उर लावे आप हरे, जगहीके पात चित्त चेत निरकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देखै सोई होय भव पार यो ॥ ९२ ॥

जेते गुण ज्ञान ध्यान दाता है ककार कवि, कहत विज्ञान तासों प्रवर वकार है । परम पवित्र जासू कहत है धाम कवि, होत पूरो काम नाम लियेते रकार है ॥ गाफिल न होय जग डारे अघ धोय सब, लैलै वाहि नाम केते भये भवपार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देख गाय गाय गुण सार है ॥ ९३ ॥

कविके कवित्त माहि राजत है नीकी भाँति, गाजत पुराण माहि कका करतार है ॥ देह विन डोले देहवान सो दिखाई देइ, चित हरि लेइ चाय चाय सो वकार है । योगी यती जंगम औ सेवरा कहे हैं जेते, केतक गुरुको रूप जानिलै रकार है ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख तोपै दीखै वार पार हैं ॥ ९४ ॥

यज्ञमें वही है सांचे भावमें वही है अति, श्रेष्ठमें वही है जासु कहत ककार है । चित्र औ विचित्र रमि रह्यो यत्र तत्र वही, जासो परमहंस कहै सोई जो वकार है । शोकको हरनहार रोषको हरनहार,

(१८२)

कवीरपंथो-

दोषको हरनहार जानिलै रकार है ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, मोरि मोरि देख धाय धाय धार धार है ॥ ९५ ॥

सिद्धिनको राजा सब रिद्धिनको राजा, नव निद्धिनको राजा राजै प्रगट ककार जू ॥ ज्ञान औ विज्ञान औ विवेककूँ बढावन है, ध्यानको बढावन है वावन वकार जू ॥ रवि की सो तेज निशि- दिन जगमगै जागै, रगमगै जगमाहि रंजित रकार जू । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, मोरि मोरि देखि याहि होय भवपार जू ॥ ९६ ॥

दूर जनि जानो युग कोस है प्रमानौ धाम, एक कहै योजन विराज सो ककार यो ॥ एक कहै देश वाको न्यारोही विराजै सदा, एक कहै एक देश विविधि वकार यो ॥ हनुक झुनुक झनकार रहै आठो याम, सोई निज धाम जासो कहत रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, नेक मोरि मोरि देख हिये होत किलकार यो ॥ ९७ ॥

वाही तेज पुंज कंज कंष करै आठो याम, हरै अघ पक न कलंक है ककार मांझ । विविध वकारको विदारि डारै क्षण माहि, दिन माहि रैन माहि बंकित वकार मांझ ॥ जेते ऋषि सुनी यती योगी हैं जगत मांझ, तिनको परमधाम जानिलै रकार मांझ ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, मोरि मोरि देखि ढकि डुरि अकार मांझ ॥ ९८ ॥

अति घनघोर सोर घनसो गरजि रहै, चन्दसो दरजि रहै रंजित ककार यो । आधिको विनाशै सब व्याधिको विनाशै काम,

शब्दावली

(१८३)

क्रोध अघ फाँसे सोई विविधि वकार यो ॥ रविकोसो मंडल है तेज पुंज खण्डल है, विद्युत विहंडल है डंडल रकार यो। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देख हिये हाजिर अकार यो ॥ ९९ ॥

कूरम वही है शेषनागसो वही है धरा, धरसो वही है जासो कहत ककार है। शेष अवशेष वन वीहड नदी हैं जेति, सातहु समुद्र तिने जानिलै वकार है ॥ वही निराधार और अधार सब जीवनको, विविधि विहार करै जगमें रकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देखि सोई राजत लिलार है ॥ १०० ॥

कवि है जेतेक जग माहि बड़े बुद्धिमान, तिनको अधीस ईस जानियो ककार है। धाता जो है पिता माता जो वही है, बुद्धि आता हू यही है जासो कहत वकार है ॥ जगको जानेता सब अघको हनेता काम, क्रोधको हरेता जग राजत तकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखि निशिदिन झनकार है ॥ १०१ ॥

इति कवीर एकोत्तर शतक ।

तीनों जे अंक ते निशंक है सुनाये शिव, आपने त्रियाको निज हित चित्त जानिकै। न्यारे २ अंक तेऊ एककै दिखाय दिये, गाये सामवेद मांझ दिनसांझ आनिकै ॥ गुप्तमें गुपुतसो प्रगटकै बतायो रुद्र, गायो युग संत साखी मनमानिकै। धन्यो

(१८४)

कवीरपंथी—

उर देवी जाये विविधि उपासना है, सब शिरमौर राख्यौ बीन बीन छानिके ॥ २ ॥

एकोत्तर शतक कह्यो साहब कवीर जू को, सुने तू महातमको नाहीं वार पार है । प्रात उठि पढे जो पै सुने चित लाइ जोई, सोई सांचो साध जो अगाध मतसार है ॥ ज्ञानको उजागरो सो जगको पसारो देखै, लोक तितुका लौं लेखि हियेको विचार है । जायके परमपद फिरि जग आवै नहीं, सही यही बात धार धार निरधार है ॥ ३ ॥

सो०—चन्दचूड निज मूल, रचिपचि कियो कवीर सत । टीका तेहि सम तूल, अखयराम भाषा करी ॥ १ ॥

सम्बत् अठारहसै गियारह मध्य भाषी, कार्तिककी पंचमी सुदीसे रविवार है ॥ नगर भरथपुर ब्रजकी करौट आहि, ताहि माहि बैठार कियो ग्रन्थको प्रकाश है ॥ स्वामी दयानन्द जू के बाल हरि दास भये, ताके श्यामदासको भिखारी दास २ है । साहब कवीर की कृपाते अखैराम कही, भाव दीप दीपिका समुझ गुरु पास है ॥ १ ॥

इति श्रीबहुयामले पातालखंड उमामहेश्वरसंवादे सामवेद शाखावर्णन त्रिपदाक्षरनिर्णय कवीरकोत्तरशतक कवि आखयरामकृत तथा—कवीराश्रमाचार्य स्वामी श्रीयुगलानन्दविहारी द्वारा संयोजित सम्पादित ।

समाप्त मिदं ॥

विनय रत्नावली प्रारम्भः । स्वामी परमानन्दजी विरचित ।

दोहा-सत्य कबीर कृपायतन, तन धरि जिवके काज । मो सम वायस मलिन भव, तव पद नलिन जहाज ॥१॥ भक्ति गरीबी दीजिये, नाथ कीजिये नेह । और दौर मन चूर भय, होस रही यक एह ॥२॥ तुम बिन जिव विलकत फिरे, खिलकत भई विहाल । चिलकत प्रभु जग यम भजे, ढिलकत बन्धन माल ॥३॥

सर्वथा ।

जगमें बहु सूर सती जपिया, तपिया सो पिया पद पावत नीके । हमतो सबही विधि हीन महा, शुभ धर्म कहा गुण ज्ञानन फीके ॥ नहीं उपाय सहाय करो यक, आश किये करुणामय जीके । कछु जोर नहीं दृग कोर लखो, दलिहों दुविधा चलिहों गुरुलीके ॥ १ ॥

मोहिंसो नहिं हीन मलीन कहूँ, गुरु धर्म न जो शुभ कर्महिं जानी । दम संथम नेम न क्षेम किया, भव भोग प्रिया नहिं योग निशानी ॥ पति राखिलियो पति राखिलियो, जगमें मम लाज इलाज लहानी । अब किंकर काल दयाल मिले, निज किंकरको महि किंकर मानी ॥ २ ॥

कोइ माँगत मुक्ति है युक्ति कोई, कोई चाहत है युगही युग जीजै । कोइ देवसे स्वर्गकी ठेव धरे, उधरा धन धान्य धरा धरि लीजै ॥ तव दासन आस वही सबही, पदही सदही लदही रति कीजै । जेहि चाह न अन्य है धन्य वही, गुरु भक्ति अनन्य दया कर दीजै ॥ ३ ॥

(१८६)

कवीरपंथी—

सुख साज घनो गज वाजि घनो, सब शोक समाज घनो जिवकेरो । धन द्रव्य ले नर्कमें गर्क करे, कुल रूप सुजाति कुटुम्ब बडेरो ॥ बर विद्या जहां लंगि चातुरता, जिउँहिं ज्यों जीवमें होय घनेरो । तेवहिंत्यों भक्तिसे दूर करे, मद पूर कहे विषयाबन घेरो ॥४॥

सुख स्वर्ग लहो अपवर्ग लहो, ऋधि सिद्धि सप्तुद्धि जिते जग मांही । जप योग रु युक्ति औ उक्ति सभी, पद इन्द्र उपेन्द्र जहां लंगि आही ॥ जेहि जीव मदे बर वेद वेदे, अभिमान लहे अमकी सब छांही । धन्य धन्य सोई पद लागु जो, गुरु भक्ति समान कहुँ कछु नाहीं ॥ ५ ॥

कर लेकर काह मिले प्रभुसे, कर भेट कहा करदाम न कोई । जहँ झार तपोधनके धनिका, दरबार तुम्हार रहे दग जोई । जिमि हंसनमें बकुला अकुला, देहि देखत मैं अपना सुख जोई । विनती हमरी बुढिया दमरी करुणा कर नाथ कबूलहु सोई ॥ ६ ॥

नहिं सायर हों कुलकायर हों, परि पाय रहो नित नाथ भरोसे । कहुँ मो सम तुच्छ न और कोई, गुण ज्ञान न छूछ बने प्रभु पोसे ॥ करजोरि विनय प्रभु मोर सुनो, जन राखहु पायन पंकज गोसे । यक पूत कपूत प्रसूत प्रसू, जठरा जठरा भरको तजि तोसे ॥७॥

यमदूत कपूत बडे रिसिहा, खिसिहा बसके किसि लीनेहु दण्डी । घिघियात दया किसिबात जिन्हें, अधिको वधिको विधि कूटत मुण्डी ॥ बल वाहन साहस आतुरता, सब चातुरता तहवाँ भइ भुंडी । कोई यार नहीं हथियार नहीं, यक देह रही बिनु शस्त्रके लुण्डी ॥ ८ ॥

नहिं लेश दया हृदया तनिको, जब छेदत है यम बांधि गटैया । इतही उत हेरके टेर सबै, कहु मोर नहीं चहुँ ओर उपैया ॥ परिवार सगे न गोहार लगे, तजि भौन भगे दुख कौन

शब्दावली

(१८७)

घटैया ॥ सुनि आवत वैन पुकारत आय, सहायक राम है बंदि कटैया ॥ ९ ॥

भवपाट महा अतिपीन जहाँ, किमि दीन पपीलहिं पार करीजे। बल भंग मतंग भयो जिहिमें, गुरु संग विना तेहि माँह मरीजे ॥ कह मुक्ति कोई जग युक्ति लोई; नहिं नाथ जो साथ तो पाथमें छीजे। भवसेत अभय पद देत तुही, प्रभु आस यही कर दास गहीजे ॥ १० ॥

भव सिन्धु अगाह न थाह कहैं, मम नाथ तरी यक गाथ निहोरे। झर झोर झकोर न ठौर कहैं, भल भायचरी यक नाथ निहोरे। मद मोह तरंग तुरंग रहे, बड़ भाग भरी यक नाथ निहोरे। महिखेस चले मम केस गहे, कर धाय धरी यक नाथ निहोरे ॥ ११ ॥

जेहि सिन्धुमें पौन प्रचंडचरे, पलमें शतखंड करे तृणतूरी। खगराजहुके बलको दलजो, हमरो बन वाहन पाहन पूरी ॥ हम थूल थरा जहैं झूल नरा, दुर्गम्य दुकूल परा अति दूरी ॥ शरणा- गत हूँ शरणागत हूँ, शरणागत नाथ हरो भय भूरी ॥ १२ ॥

समरत्थने हथ गहीर गही, जल रत्थ मेरी गुरु सत्यतरी है। समवाय वहाय सहाय करी, बल पाय हरी थल धाय धरी है। मम पोत टुटी गुणसो न जुटी, जेहि कोट दरार करार करी है। बिनु सत्यकवीरको पीर हरे, भवभौर भयावन भीर परी है ॥ १३ ॥

कलिकाल विहाल किया जिवको, पिवको पदसो केहि भांति सो पावे। जहैं जाप नहीं जहैं ताप नहीं, जिव पाप महों दिन रैन गमावे ॥ अति बुद्धि मलीन जो लीन विषय, नहिं शुद्ध सतो छण एकहु आवे। यमफन्दपरे नहिं द्रन्दटरै, उबरे जब सत्य कवीर बचावे ॥ १४ ॥

( १८८ )

कवीरपंथी—

अमरावति नग्र बसो जेहिमें, तेहि दर चार सुधार बनाये । वैराग्य विवेकहुँ ज्ञान गनाय, विचार सो चार गुरु बनि आये ॥ तेहि मध्य सिंहासन आसन तौ, जगे ज्योति सोहंगम चौर दुराये । सोइ द्वार ते जाय सो पाय तुम्हे, डुतिये विधिसे पुनि यों कहि गाये ॥ १५ ॥

पद पाडुक और पद त्रान तेरो, पद धूल पदामृत चार विचारे । पद पाडुक ते मुक भर्म सबै, पदकी पनही धनही जिव तारे ॥ पद धूल हरे तिहुँ शूलनको, चरणामृत कर्महिं धोय पैवारे । गुरु- चारहु जल उबार लियो, यम जीतन नाथ प्रताप तुम्हारे ॥ १६ ॥

गुण सिन्धु यथा तुम आगर हो, तिमि औगुण सागर मो सम नाहीं । दोउ मेल मिले यम जेल ढिले, अस खेल खिले करूणा- मय बाहीं ॥ कण तुच्छ मिला मन अम्बर जो, तब रेणु हिरम्बर वेणु कहाहीं । विषयादि समीर सरीरन छै, भवतीर लगे नहि आवहिं जाही ॥ १७ ॥

दिल देवल देव दया दरिया, थरिया भरिया भरि नैन निहारी । दुख दारिद कम्पत चम्पत भो, सुख संपति संपति सो भरभारी ॥ सुखसाज सघट्ट अघट्ट दर्द, फिर आवैं न हट्ट या पनसारी । बयपार करी बयपार करी, बयपारन संगमें ये बयपारी ॥ १८ ॥

हिरअम्बर चीर कवीर कवी, कविता सविता गुण गावत पायो । न टुटे न फटै न कटै कबहुँ, रुचि राउरकी पहिराउर आयो ॥ जो मुनिन्द्र भरे न सो इन्द्रधरे, भगवान कृपा भग बाँन भगायो । सतनाम निकाम ररो सुधरो, उधरो दृग दिव्य दयाल बतायो ॥ १९ ॥

गज ज्ञान अपानकि पीठ चढे, दल दैत विकार विषय विह- राना । गहि वज्र विवेककी टेक हिये, निज नाम निशानको मारूब्याना ॥ सहस्रश प्रतक्ष स्वरूप लखे, तम भक्ष कृपा भ्रम

शब्दावली

(१८९)

कूप बिहाना । जन राउर यद्यपि बाउर है, पद पंकज पास कियो निज थाना ॥ २० ॥ इति ।

कवोर भानु प्रकाशसे ॥

कवित्त ।

पावन पतित जीवनके हित प्रभु, तूही गुरु पुरुष कहलायो घूँ और है । कहत कवीर धर्म धरत न धीर, करे अचल शरीर न लगे हिम जोर है ॥ पशुपंछी तारत है निगम पुकारत है, आरतको देखिके निहार हगको रहै । पीरो पयम्बर है धीर जो दिगम्बर है, वेद वाणी हूँ बिरह बन्दीछोर है ॥ १ ॥

तजत न वानी सुर सुनिन बखानी प्रभु, शरणमें आनी जो करत निहोर है । तीन लोक हूँठ जाये दूसरे कहुँ न पाये, लग सो चरण दुख हरण जो शोर है ॥ नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है, उस गुरु शरनी है कलिकाल घोर है । अधम उधारनको जगत सुधारनको, भक्ति मुक्ति धारन कवीर बन्दीछोर है ॥ २ ॥

बूडे बड ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी, बिनु नाम सहिदानी जिन्हें आशा न तोर है । बल बीज चूसत है सिद्ध साधु दूसत है, निसिदिन मूसत है अनचिन्ह चोर है ॥ जीवको है ठौर नहीं सुर सुनी दौर नहीं, परमानन्द पौर नहीं पावन जो दोड है । बन्दीछोर बन्दीछोर एक भजु साहब कवीर टेक सोई बन्दीछोर है ॥ ३ ॥

अर्जोनामा ।

महंत बीजक दास कृत,

ज्ञान सरूप अनूपम पूरन, पूर रहो जडचेतन माहीं । तीरथ वर्त रु कर्म करे बहु, अन्ध भयो शठ सूझत नाही ॥ १ ॥ काल महाबलवंत बडो रिपु, डारत ले भवसागर माहीं । ताहिंते सुदि भयो मोहिको अब, आइ रहो तुव चरनन माहीं ॥२॥ कहा कलु केवल नाम कवीरहि, जीव रटे सब चातिक सोई । सर्वमें व्यापक

(१९०)

कवीरपंथी—

आप कवीरहि स्थावर जंगममें पुनि वोई ॥ ३ ॥ रँग रटना सब लागरही घट, ताहि बिना नहीं औरहि भासे ॥ नित अहे हमरे उर अन्तर, सु तारक बुद्धि सोई प्रकासे ॥ ४ ॥ जौन प्रकार कटे रजनी तम, सोइ उपाय कहो निरधारा । काम रु कोध रु लोभ भ्रमावत, ताहिसे दास जो कीन्ह पुकारा ॥ ५ ॥ आप विना नहीं कोउ हमारे, जो पुत्र कलत्र पितु परिवारा । अब मोहि तुमही सहाय करो प्रभु, बूडतहुँ भवसागर धारा ॥ ६ ॥ मातकूँ बालक जो दुख देत सो, जननी नहीं सोच विचारा ॥ खैंचत केस करे नख घात जो, तोहू न छोडस गोदमें धारा ॥ ७ ॥ त्यों जननी सम गुरु देव कवीरहि, शिष्य समान जो बालक होई । डूबत बांह गहो गुरु देव जु, आप दयाल दयानिधि सोई ॥ ८ ॥ आप कृपा विन भाग जगे नहिं, आप कृपा बिन पातक लागे । आप कृपा बिन शुद्ध हिरदे नहिं, आप कृपा बिन मोक्ष न आगे ॥ ९ ॥ आप कृपाविन डूब मरे भव, जीव अनेक पडे जम त्रासा । ऐसि कृपा जो करा हम ऊपर, पारख बुद्धि सदा जु प्रकाशा ॥ १० ॥ योग रु यज्ञ करे विधि नाना, कायाहु कष्ट करे बहुतेरा । आँखहु मुन्दत कानहु रुंधत, प्रान चढ़ाय गगनहिं घेरा ॥ ११ ॥ नेती धोती कर्म करे बहु, ध्यान धरे पुनि काहु न हेरा । शुद्ध स्वरूपको ज्ञान विना शठ, मेटत नाहिं चोरासीकी फेरा ॥ १२ ॥ मै अपराध कियो बहुते गुरु, सो अपराध कह्यो न जाई । आप दयाल दयानिधि साहब, मम अपराध क्षमा करो साई ॥ १३ ॥ अन्तर्यामी जु जानत हो सब, कहा कहूँ मुख बारम्बारा । भूल मिटाये परखाई दियो सब, संधिक झाई जु काल पसारा ॥ १४ ॥ जा दिन बन्ध छुडाइ दियो सब, ता दिन नाम पडयो बंदीछोरा । तैसेही बन्धन मोर छोडावहु, बारम्बार कहूँ जी निहोरा ॥ १५ ॥ दासको संकट आय

शब्दावली

(१११)

षरे तब, आयके तत्क्षण लीन संभारा । बीजकदास यही बर मांगत, नित्त हृदय मांहि रहु ध्यान तुम्हारा ॥ १६ ॥

इन्द्रविजय ।

आपेही आप गोसाईं सु साहेब, होहु दयाल दया करि हेरो । ऐसी कृपा जो करो हम ऊपर, जे विधि होहुँ तुम्हारो हि चेरो ॥ औरहि व्रत मिटायके साहेब, एकही व्रत तुम्हारो हि प्रेरो । शिष्य कहे गुरुदेव सु साहेब, यहि विधि ध्यान तुम्हारो हि मेरो ॥ १ ॥

भांति अनेक करे यह चित्तसो, कर्म विकर्म करे तेहि काजा । तीरथ व्रत करे बहुते विधि, ताहिके काज लगावत साजा ॥ जो गुरु यज्ञ करे किया तप, करे पुनि ध्यान कहे महाराजा । भारि भरोस हिये गुरु आपसो, आप गुसाईं सु हो शिस्तजा ॥ २ ॥

नानाहि भांति विचार करौं बहु, एकहुँ चित्त न आवत मेरो । जाल अनेकन हाल विहालसो, काल कराल करे घनघेरो ॥ जीवन मारि कियो पिसमानसो, कोईके चित्त न आवत हेरो । मोकहँ तो इक आश तुम्हारिहि, भाँति अनेक कहाँ बहुतेरो ॥ ३ ॥

जादिनसे मोहि आप मिले प्रभु, तादिनसे बहु दुःख निवारा । होय अधीन गह्यो शरणागत, भाजि गयो सब भ्रम पसार ॥ आप पर्खाइके भास मिटाइके, जीव छुटाये कियो निस्तारा । शिष्य कहे गुरु देवसु साहेब, मोकहँ तो एक आप अधारा ॥ ४ ॥

ऐसी कृपा जु करी हम ऊपर, होय अधीन गह्यो जब चरना । जन्म रू मर्ण रहे अब कोनको, ये कहि चित्त तुम्हारोहि शरना ॥ सांझ इक संधिक काल सो आसिक, मीटि गयो सब मनको भरना । शिष्य कहे गुरुदेव सुसाहिब, और उपाय नहीं सुहिं तरना ॥ ५ ॥

करुणानिधि आप बनाइ दियो, सकलो संत विवेक की आथी । मेरे हृदयसे दुःखसाल अनेकन्ह, आप मिटाइ कियो सुख साथी ॥

(१९२)

कवीरपंथी—

भास मिटाइके फाँस छुटाइ दियो, प्रभु कालहि तू अब नाथी ॥ ऐसो दयालको छांडिके रे शठ, तू बहुदेय भुले देह भाथी ॥६॥

जो प्रभु आप सहाय करो नहिं, तो यह जीव रहे भव भीरा । अवगुन बापजि माफ करो अब, मैं कछु शील विचार न थीरा ॥ बाल पुकार करे बहुते सर, हे सुख सिंधु करो मन थीरा । साहेब संत समाज मिले जब, आय लगूँ गुरु ज्ञानके तीरा ॥ ७ ॥

तुमही सब लायक जानत हो सद्, वेद पुरान कुरान अनेका । बुद्धि हीन मलीन पुकारत हों, अबहो प्रभु राखहु वेषको टेका ॥ यद्यपि आप विसारहुगे तब, लोक हँसे नरनारि तरेका । ताहिते शिष्यको भाव धरो अब, शिष्य भरौंस करै गुरु देका ॥ ८ ॥

करसे सुत मात ना छांडत है, शिर दुःख हजार परे मन जोखा । जोपै पूत कपूत सही है, जननी न विचार धरे उर धोखा ॥ कवीर गोसाई मेरे शिरताज, दूजा कहाँ जाये करो तन पोखा । विपति शर बान दहैं अतिसय, तुव दास लडे चढ़ि ज्ञान झरोखा ॥९॥

कवित्त ।

बालक ज्यों बोले बात तोतरी बनाय करी, मात पितु वाके सुख माने प्रेम सानिके । ज्यों पै सुत भूल्यो आय जननी पुकारे धाय, मारे सुख वचन कहत सहुँ आनिके ॥ रोदन करत पूत चले जात दूर धाय, झांझाहीं विलाप धारि लोटे बहु ठानके । हाथही अम्बर लेह पोंछि कर उर देह, पीर सब छीन करी गोद लेवे जानके ॥१॥

दोहा—तैसे तुम गुरुदेव प्रभु, लेहु सकल सुख साज ।

भवबन्धन जाते मिटे, सो चाहत मैं आज ॥ १ ॥

पारख शुद्ध विचार करी, ताहि माँहि सुखधाम ।

ताते कहत हूँ आपसो, मोको राखहु ठाम ॥ २ ॥

शब्दावली

(१९३)

सोरठा ।

खबर लीजिये मोर, परख रूप किरपाल प्रभु । तुम तजी अनत न ठौर, अबतो आश तुमार है ॥ १ ॥ तात मातें मित्रादि, नहिं कोइ मेरो जगतमें । तुम सुहिर्द बर आदि, भवनधि तारो नाथ हम ॥ २ ॥ अवगुन देखहु मोर, नहिं कल्यान जु कल्पसुधि । दया दृष्टि कर तोर, अवगुन चित्त न विचारिये ॥ ३ ॥ साहब परम उदार, सुखसागर सुखरूप घन । ताते करत पुकार, जो गुरु होहु सहाय अब ॥ ४ ॥

कवित्त ।

दीनोंके दयाल आप कियो है निहाल मोहिं, करो प्रतिपाल सुख सागर समान हो। नागर विराजमान आगर कहत सब, जनके दयाल मोहिं हियमें सोहात हो ॥ कहत अगम वेद पार नहिं पावत सो, मन भरमात मेरो आप सुख सार हो । शुद्ध बुद्ध ज्ञानभारी सन्तनके रूपधारी, कहे सहदेव भव पारहुके पार हो ॥

आपही पूरन गुरु साहेब कबीरहीसो, तिनको नम्र होय बन्दनी हमारी है । सुखही सरूप रूप ज्ञानही अनूप भूप, परख प्रकाश जहां नसे अन्धकारी है ॥ दरसही पाप टारी झाईं संधि काल जारी, निजपद आप देहीं, बडे उपकारी है। दीनको दयाल प्रभु सन्तनके उरमाल, कहे सहदेव गुरु ऐसो सुखधारी है ॥

छन्द त्रोटक दुइपदी ।

गुणबन्द निधान सर्वज्ञ प्रभुं । त्रियताप निधारण धीर विभुं ॥ कर्णधार उबारन जीवधनी । स्वयंपारख शोद्धच सुवाक्य मणी ॥१॥ त्रिगुणं रहितं सत भाषण हे । नित परख प्रकास सुसासन हे ॥ सुगिरामृतधार प्रवाह सरी । पुट श्रावण पानको प्यास

कबीरपंथी शब्दावली ७