कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कूप बिहाना । जन राउर यद्यपि बाउर है, पद पंकज पास कियो निज थाना ॥ २० ॥ इति ।
कवोर भानु प्रकाशसे ॥
कवित्त ।
पावन पतित जीवनके हित प्रभु, तूही गुरु पुरुष कहलायो घूँ और है । कहत कवीर धर्म धरत न धीर, करे अचल शरीर न लगे हिम जोर है ॥ पशुपंछी तारत है निगम पुकारत है, आरतको देखिके निहार हगको रहै । पीरो पयम्बर है धीर जो दिगम्बर है, वेद वाणी हूँ बिरह बन्दीछोर है ॥ १ ॥
तजत न वानी सुर सुनिन बखानी प्रभु, शरणमें आनी जो करत निहोर है । तीन लोक हूँठ जाये दूसरे कहुँ न पाये, लग सो चरण दुख हरण जो शोर है ॥ नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है, उस गुरु शरनी है कलिकाल घोर है । अधम उधारनको जगत सुधारनको, भक्ति मुक्ति धारन कवीर बन्दीछोर है ॥ २ ॥
बूडे बड ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी, बिनु नाम सहिदानी जिन्हें आशा न तोर है । बल बीज चूसत है सिद्ध साधु दूसत है, निसिदिन मूसत है अनचिन्ह चोर है ॥ जीवको है ठौर नहीं सुर सुनी दौर नहीं, परमानन्द पौर नहीं पावन जो दोड है । बन्दीछोर बन्दीछोर एक भजु साहब कवीर टेक सोई बन्दीछोर है ॥ ३ ॥
अर्जोनामा ।
महंत बीजक दास कृत,
ज्ञान सरूप अनूपम पूरन, पूर रहो जडचेतन माहीं । तीरथ वर्त रु कर्म करे बहु, अन्ध भयो शठ सूझत नाही ॥ १ ॥ काल महाबलवंत बडो रिपु, डारत ले भवसागर माहीं । ताहिंते सुदि भयो मोहिको अब, आइ रहो तुव चरनन माहीं ॥२॥ कहा कलु केवल नाम कवीरहि, जीव रटे सब चातिक सोई । सर्वमें व्यापक