भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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( १८८ )

कवीरपंथी—

अमरावति नग्र बसो जेहिमें, तेहि दर चार सुधार बनाये । वैराग्य विवेकहुँ ज्ञान गनाय, विचार सो चार गुरु बनि आये ॥ तेहि मध्य सिंहासन आसन तौ, जगे ज्योति सोहंगम चौर दुराये । सोइ द्वार ते जाय सो पाय तुम्हे, डुतिये विधिसे पुनि यों कहि गाये ॥ १५ ॥

पद पाडुक और पद त्रान तेरो, पद धूल पदामृत चार विचारे । पद पाडुक ते मुक भर्म सबै, पदकी पनही धनही जिव तारे ॥ पद धूल हरे तिहुँ शूलनको, चरणामृत कर्महिं धोय पैवारे । गुरु- चारहु जल उबार लियो, यम जीतन नाथ प्रताप तुम्हारे ॥ १६ ॥

गुण सिन्धु यथा तुम आगर हो, तिमि औगुण सागर मो सम नाहीं । दोउ मेल मिले यम जेल ढिले, अस खेल खिले करूणा- मय बाहीं ॥ कण तुच्छ मिला मन अम्बर जो, तब रेणु हिरम्बर वेणु कहाहीं । विषयादि समीर सरीरन छै, भवतीर लगे नहि आवहिं जाही ॥ १७ ॥

दिल देवल देव दया दरिया, थरिया भरिया भरि नैन निहारी । दुख दारिद कम्पत चम्पत भो, सुख संपति संपति सो भरभारी ॥ सुखसाज सघट्ट अघट्ट दर्द, फिर आवैं न हट्ट या पनसारी । बयपार करी बयपार करी, बयपारन संगमें ये बयपारी ॥ १८ ॥

हिरअम्बर चीर कवीर कवी, कविता सविता गुण गावत पायो । न टुटे न फटै न कटै कबहुँ, रुचि राउरकी पहिराउर आयो ॥ जो मुनिन्द्र भरे न सो इन्द्रधरे, भगवान कृपा भग बाँन भगायो । सतनाम निकाम ररो सुधरो, उधरो दृग दिव्य दयाल बतायो ॥ १९ ॥

गज ज्ञान अपानकि पीठ चढे, दल दैत विकार विषय विह- राना । गहि वज्र विवेककी टेक हिये, निज नाम निशानको मारूब्याना ॥ सहस्रश प्रतक्ष स्वरूप लखे, तम भक्ष कृपा भ्रम