कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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घटैया ॥ सुनि आवत वैन पुकारत आय, सहायक राम है बंदि कटैया ॥ ९ ॥
भवपाट महा अतिपीन जहाँ, किमि दीन पपीलहिं पार करीजे। बल भंग मतंग भयो जिहिमें, गुरु संग विना तेहि माँह मरीजे ॥ कह मुक्ति कोई जग युक्ति लोई; नहिं नाथ जो साथ तो पाथमें छीजे। भवसेत अभय पद देत तुही, प्रभु आस यही कर दास गहीजे ॥ १० ॥
भव सिन्धु अगाह न थाह कहैं, मम नाथ तरी यक गाथ निहोरे। झर झोर झकोर न ठौर कहैं, भल भायचरी यक नाथ निहोरे। मद मोह तरंग तुरंग रहे, बड़ भाग भरी यक नाथ निहोरे। महिखेस चले मम केस गहे, कर धाय धरी यक नाथ निहोरे ॥ ११ ॥
जेहि सिन्धुमें पौन प्रचंडचरे, पलमें शतखंड करे तृणतूरी। खगराजहुके बलको दलजो, हमरो बन वाहन पाहन पूरी ॥ हम थूल थरा जहैं झूल नरा, दुर्गम्य दुकूल परा अति दूरी ॥ शरणा- गत हूँ शरणागत हूँ, शरणागत नाथ हरो भय भूरी ॥ १२ ॥
समरत्थने हथ गहीर गही, जल रत्थ मेरी गुरु सत्यतरी है। समवाय वहाय सहाय करी, बल पाय हरी थल धाय धरी है। मम पोत टुटी गुणसो न जुटी, जेहि कोट दरार करार करी है। बिनु सत्यकवीरको पीर हरे, भवभौर भयावन भीर परी है ॥ १३ ॥
कलिकाल विहाल किया जिवको, पिवको पदसो केहि भांति सो पावे। जहैं जाप नहीं जहैं ताप नहीं, जिव पाप महों दिन रैन गमावे ॥ अति बुद्धि मलीन जो लीन विषय, नहिं शुद्ध सतो छण एकहु आवे। यमफन्दपरे नहिं द्रन्दटरै, उबरे जब सत्य कवीर बचावे ॥ १४ ॥