कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(१८६)
कवीरपंथी—
सुख साज घनो गज वाजि घनो, सब शोक समाज घनो जिवकेरो । धन द्रव्य ले नर्कमें गर्क करे, कुल रूप सुजाति कुटुम्ब बडेरो ॥ बर विद्या जहां लंगि चातुरता, जिउँहिं ज्यों जीवमें होय घनेरो । तेवहिंत्यों भक्तिसे दूर करे, मद पूर कहे विषयाबन घेरो ॥४॥
सुख स्वर्ग लहो अपवर्ग लहो, ऋधि सिद्धि सप्तुद्धि जिते जग मांही । जप योग रु युक्ति औ उक्ति सभी, पद इन्द्र उपेन्द्र जहां लंगि आही ॥ जेहि जीव मदे बर वेद वेदे, अभिमान लहे अमकी सब छांही । धन्य धन्य सोई पद लागु जो, गुरु भक्ति समान कहुँ कछु नाहीं ॥ ५ ॥
कर लेकर काह मिले प्रभुसे, कर भेट कहा करदाम न कोई । जहँ झार तपोधनके धनिका, दरबार तुम्हार रहे दग जोई । जिमि हंसनमें बकुला अकुला, देहि देखत मैं अपना सुख जोई । विनती हमरी बुढिया दमरी करुणा कर नाथ कबूलहु सोई ॥ ६ ॥
नहिं सायर हों कुलकायर हों, परि पाय रहो नित नाथ भरोसे । कहुँ मो सम तुच्छ न और कोई, गुण ज्ञान न छूछ बने प्रभु पोसे ॥ करजोरि विनय प्रभु मोर सुनो, जन राखहु पायन पंकज गोसे । यक पूत कपूत प्रसूत प्रसू, जठरा जठरा भरको तजि तोसे ॥७॥
यमदूत कपूत बडे रिसिहा, खिसिहा बसके किसि लीनेहु दण्डी । घिघियात दया किसिबात जिन्हें, अधिको वधिको विधि कूटत मुण्डी ॥ बल वाहन साहस आतुरता, सब चातुरता तहवाँ भइ भुंडी । कोई यार नहीं हथियार नहीं, यक देह रही बिनु शस्त्रके लुण्डी ॥ ८ ॥
नहिं लेश दया हृदया तनिको, जब छेदत है यम बांधि गटैया । इतही उत हेरके टेर सबै, कहु मोर नहीं चहुँ ओर उपैया ॥ परिवार सगे न गोहार लगे, तजि भौन भगे दुख कौन