कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मलको बहावे सोई, ध्यानको लहावे उर आवत रकार त्यों । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखो उर राजत अकार त्यों ॥ ७३ ॥
जग सुखदाई भक्ति कारन है आठों याम, मलन विदारन हैं वारन ककार यह । विविधि कुसंग कलि कारन कलेश जेते, तेते अघहरण उधारण वकार यह । निर्मल है भाव जेते रमि २ चावही सो, मुक्तिपर पाव दैदै पायलै रकार यह । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख घट माहिं टनकार यह ॥ ७४ ॥
कमल कलीके मांझ कमलाको कंत वही, वही भगवंत जग ऊपर ककार है । प्रगट विशेष ज्ञान ध्यानके लगायवेको, हरि उर लायवेको राजत वकार है ॥ वही अनुरक्त औ विरक्त सब जक्त माहिं, निगम विहारी जासों कहत रकार है ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मूरि क्यों न देखे तेरे हिये ज्ञनकार है ॥ ७५ ॥
कल्पहीके अंतमें आनन्द है ककार ही को, तीरथ वरतको विलासी सो वकार है । शब्दके स्वरूपमें विराजे अति राजे सोई, मनुष्यमें गाजै ऐसे बाजै सो रकार है ॥ नीके कै विचारै उर धारे संतजन कोई, सोई श्रुति सार कहै लहै वार पार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखि पेखि अति सुखसार है ॥ ७६ ॥
जेते लोक लोकपाल व्योमपाल भौमपाल, कक्काहीको उर माहिं सबहीके जानि लै ॥ भक्ति प्रतिपालक है बालक न बूढो वह, नर है न नारि ताहि वक्वाहीमें मानि लै ॥ पाप अरु पुण्य दुख सुखको विहंडन है, आनन्दको मंडन रकार उर आनि लै । ताहिते