भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१७८)

कवीरपंथी—

कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि स्वास इंगला औ पिगलामें तानि लै ॥ ७७ ॥

द्वैत मत खंडन अद्वैत भाव मण्डन है, सगुन विहंडता बढावत ककार यह ॥ विभव बढावत कढावत भवसागर तैं, सुमति बढावन वकार है सार यह ॥ चित्त चितानन्द भावफन्दको निकन्द दुख, दारिद सुछन्द कन्द आनंद रकार यह । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख कामवनको कुठार यह ॥ ७८ ॥

मन वच कर्मन कषाय मल धोय नीके, जगमाहिं करै नित्य कक्काही सो प्रीति रे । बाहरिके विविधि विहार जानि पीके सति, लोकको विहार वक्वा अंतरमें जीति रे ॥ रति मति गति जगमाहिं जे करत नेक, साँची रति अंतर रकार रस रति रे । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख जिनि वृथा दिन बीति रे ॥ ७९ ॥

कलिके कलेश काटिवेको गाये कक्काहीको, वक्वा है विशेष ज्ञान ध्यान करतार यो ॥ राग अनुराग झूठे जगमाहिं लावे मति, करि साँची रति हिये रटन रकार यो ॥ काहेको झंखत हैं फिरत वापी कूपनको, धायके नहाय घाट गंगाजीकी धार यो ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि देख तेरे हिये ज्ञनकार यो ८०

जान कवि चातुरी ककारहीको नीकी भांति, कहत संयोग औ वियोग सो वकार है । धारिवेको धीरज विदारवेको कामादिक, हृदय विचारवेको नीको सो रकार है ॥ झूठो जग संग करै ध्यान माहिं भंग यातैं, दै दै ज्ञान रंग नीके चित्त निरधार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख सब कटत विकार है ॥ ८१ ॥