भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१८२)

कवीरपंथो-

दोषको हरनहार जानिलै रकार है ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, मोरि मोरि देख धाय धाय धार धार है ॥ ९५ ॥

सिद्धिनको राजा सब रिद्धिनको राजा, नव निद्धिनको राजा राजै प्रगट ककार जू ॥ ज्ञान औ विज्ञान औ विवेककूँ बढावन है, ध्यानको बढावन है वावन वकार जू ॥ रवि की सो तेज निशि- दिन जगमगै जागै, रगमगै जगमाहि रंजित रकार जू । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, मोरि मोरि देखि याहि होय भवपार जू ॥ ९६ ॥

दूर जनि जानो युग कोस है प्रमानौ धाम, एक कहै योजन विराज सो ककार यो ॥ एक कहै देश वाको न्यारोही विराजै सदा, एक कहै एक देश विविधि वकार यो ॥ हनुक झुनुक झनकार रहै आठो याम, सोई निज धाम जासो कहत रकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, नेक मोरि मोरि देख हिये होत किलकार यो ॥ ९७ ॥

वाही तेज पुंज कंज कंष करै आठो याम, हरै अघ पक न कलंक है ककार मांझ । विविध वकारको विदारि डारै क्षण माहि, दिन माहि रैन माहि बंकित वकार मांझ ॥ जेते ऋषि सुनी यती योगी हैं जगत मांझ, तिनको परमधाम जानिलै रकार मांझ ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, मोरि मोरि देखि ढकि डुरि अकार मांझ ॥ ९८ ॥

अति घनघोर सोर घनसो गरजि रहै, चन्दसो दरजि रहै रंजित ककार यो । आधिको विनाशै सब व्याधिको विनाशै काम,