भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१८१)

कायाहीकी सिद्धि सो ककार मांझ जानि लीजै, दयाहूकी सिद्धि सो वकार माहि जानिये । भक्तिका बढौनि ज्ञान ध्यानको बढौनि चित्त, चेतन चढौनि सो रकारहीमें मानिये ॥ दया उर धारि काहू जीव ना विदारि हरे, हरे पग धारि पूरा गुरु चित्त आनिये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि स्वांस त्रिकुटीको ताकि तानिये ॥ ९१ ॥

लोक सुखदाई दुखदाई है न आठों याम, संतनको भाई गुण सोई है ककार यो । सदाही प्रसन्न वह जगकी हस्तपीर, नेक न अधीर शूर वीर सो वकार यो ॥ भक्तनकी दाम रचि उर लावे आप हरे, जगहीके पात चित्त चेत निरकार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देखै सोई होय भव पार यो ॥ ९२ ॥

जेते गुण ज्ञान ध्यान दाता है ककार कवि, कहत विज्ञान तासों प्रवर वकार है । परम पवित्र जासू कहत है धाम कवि, होत पूरो काम नाम लियेते रकार है ॥ गाफिल न होय जग डारे अघ धोय सब, लैलै वाहि नाम केते भये भवपार है । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देख गाय गाय गुण सार है ॥ ९३ ॥

कविके कवित्त माहि राजत है नीकी भाँति, गाजत पुराण माहि कका करतार है ॥ देह विन डोले देहवान सो दिखाई देइ, चित हरि लेइ चाय चाय सो वकार है । योगी यती जंगम औ सेवरा कहे हैं जेते, केतक गुरुको रूप जानिलै रकार है ॥ ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोरि देख तोपै दीखै वार पार हैं ॥ ९४ ॥

यज्ञमें वही है सांचे भावमें वही है अति, श्रेष्ठमें वही है जासु कहत ककार है । चित्र औ विचित्र रमि रह्यो यत्र तत्र वही, जासो परमहंस कहै सोई जो वकार है । शोकको हरनहार रोषको हरनहार,

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