कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
करि ध्यान भयो निर्मल वकारको ॥ अमरहिं लोक अरु अमर है नाम जाको, अमर विहार वन वाही है रकारको। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक मोर हिये भवसागरके पारको ॥ ८६ ॥
करण कहावे वही कारण कहावे वही, करता कहावे वही जानो जो ककार हैं ॥ सुखके समुद्र माहिं करत विहार वही, निराधार औ आधार सोई तो वकार है ॥ पाप ना लगत जासूं जापके करेते नित, अति गति भाव भरयो रहत रकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, याहीकूं निहारि जग झूठो व्यवहार है ॥ ८७ ॥
सांचे सांचे पंथको चलावत है नीकी भांति, झूठे झूठे मारग विदारत ककार यह। अजपा जो जाप ताहि जपि २ आठो याम, थपि २ भावनासो कामना वकार यो ॥ भक्ति अरु मुक्तिके विलास हास जानि मानि मानि सो मनहि मनावत रकार यह। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देख हिये मोतिनको हार यह ॥ ८८ ॥
कपट कपाट तन पटल विडारिवेको, दारिवेको कक्का काम ध्वज शूर वीर है। वेदनके जेते सातो अंग हैं विविधि भांति, तिनके संवारवेको वव्वा रणधीर है ॥ मंगल समूह केते आनंद समूह जेते, धरत रकार सोई हरे पर पीर है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि तौलि खोलि हिये मैं जंजीर है ॥ ८९ ॥
जेते श्रुति सार जेते तत्त्वके विचार जेते, कहै हैं प्रचार सब ककाहीमें मानिलै। अघको हरणहार वेदको धरणहार, भावको भरणहार वव्वाहीको जानिलै। सिद्धनको दाता वही बुद्धिको विधाता वही, सब जग जाना है रकार उर आनिलै। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि जग रीति प्रीति वाहि सो तू ठानिलै ॥ ९० ॥