भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१८३)

क्रोध अघ फाँसे सोई विविधि वकार यो ॥ रविकोसो मंडल है तेज पुंज खण्डल है, विद्युत विहंडल है डंडल रकार यो। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देख हिये हाजिर अकार यो ॥ ९९ ॥

कूरम वही है शेषनागसो वही है धरा, धरसो वही है जासो कहत ककार है। शेष अवशेष वन वीहड नदी हैं जेति, सातहु समुद्र तिने जानिलै वकार है ॥ वही निराधार और अधार सब जीवनको, विविधि विहार करै जगमें रकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, नेक सुरि देखि सोई राजत लिलार है ॥ १०० ॥

कवि है जेतेक जग माहि बड़े बुद्धिमान, तिनको अधीस ईस जानियो ककार है। धाता जो है पिता माता जो वही है, बुद्धि आता हू यही है जासो कहत वकार है ॥ जगको जानेता सब अघको हनेता काम, क्रोधको हरेता जग राजत तकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि देखि निशिदिन झनकार है ॥ १०१ ॥

इति कवीर एकोत्तर शतक ।

तीनों जे अंक ते निशंक है सुनाये शिव, आपने त्रियाको निज हित चित्त जानिकै। न्यारे २ अंक तेऊ एककै दिखाय दिये, गाये सामवेद मांझ दिनसांझ आनिकै ॥ गुप्तमें गुपुतसो प्रगटकै बतायो रुद्र, गायो युग संत साखी मनमानिकै। धन्यो