कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(१८४)
कवीरपंथी—
उर देवी जाये विविधि उपासना है, सब शिरमौर राख्यौ बीन बीन छानिके ॥ २ ॥
एकोत्तर शतक कह्यो साहब कवीर जू को, सुने तू महातमको नाहीं वार पार है । प्रात उठि पढे जो पै सुने चित लाइ जोई, सोई सांचो साध जो अगाध मतसार है ॥ ज्ञानको उजागरो सो जगको पसारो देखै, लोक तितुका लौं लेखि हियेको विचार है । जायके परमपद फिरि जग आवै नहीं, सही यही बात धार धार निरधार है ॥ ३ ॥
सो०—चन्दचूड निज मूल, रचिपचि कियो कवीर सत । टीका तेहि सम तूल, अखयराम भाषा करी ॥ १ ॥
सम्बत् अठारहसै गियारह मध्य भाषी, कार्तिककी पंचमी सुदीसे रविवार है ॥ नगर भरथपुर ब्रजकी करौट आहि, ताहि माहि बैठार कियो ग्रन्थको प्रकाश है ॥ स्वामी दयानन्द जू के बाल हरि दास भये, ताके श्यामदासको भिखारी दास २ है । साहब कवीर की कृपाते अखैराम कही, भाव दीप दीपिका समुझ गुरु पास है ॥ १ ॥
इति श्रीबहुयामले पातालखंड उमामहेश्वरसंवादे सामवेद शाखावर्णन त्रिपदाक्षरनिर्णय कवीरकोत्तरशतक कवि आखयरामकृत तथा—कवीराश्रमाचार्य स्वामी श्रीयुगलानन्दविहारी द्वारा संयोजित सम्पादित ।
समाप्त मिदं ॥