भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१११)

षरे तब, आयके तत्क्षण लीन संभारा । बीजकदास यही बर मांगत, नित्त हृदय मांहि रहु ध्यान तुम्हारा ॥ १६ ॥

इन्द्रविजय ।

आपेही आप गोसाईं सु साहेब, होहु दयाल दया करि हेरो । ऐसी कृपा जो करो हम ऊपर, जे विधि होहुँ तुम्हारो हि चेरो ॥ औरहि व्रत मिटायके साहेब, एकही व्रत तुम्हारो हि प्रेरो । शिष्य कहे गुरुदेव सु साहेब, यहि विधि ध्यान तुम्हारो हि मेरो ॥ १ ॥

भांति अनेक करे यह चित्तसो, कर्म विकर्म करे तेहि काजा । तीरथ व्रत करे बहुते विधि, ताहिके काज लगावत साजा ॥ जो गुरु यज्ञ करे किया तप, करे पुनि ध्यान कहे महाराजा । भारि भरोस हिये गुरु आपसो, आप गुसाईं सु हो शिस्तजा ॥ २ ॥

नानाहि भांति विचार करौं बहु, एकहुँ चित्त न आवत मेरो । जाल अनेकन हाल विहालसो, काल कराल करे घनघेरो ॥ जीवन मारि कियो पिसमानसो, कोईके चित्त न आवत हेरो । मोकहँ तो इक आश तुम्हारिहि, भाँति अनेक कहाँ बहुतेरो ॥ ३ ॥

जादिनसे मोहि आप मिले प्रभु, तादिनसे बहु दुःख निवारा । होय अधीन गह्यो शरणागत, भाजि गयो सब भ्रम पसार ॥ आप पर्खाइके भास मिटाइके, जीव छुटाये कियो निस्तारा । शिष्य कहे गुरु देवसु साहेब, मोकहँ तो एक आप अधारा ॥ ४ ॥

ऐसी कृपा जु करी हम ऊपर, होय अधीन गह्यो जब चरना । जन्म रू मर्ण रहे अब कोनको, ये कहि चित्त तुम्हारोहि शरना ॥ सांझ इक संधिक काल सो आसिक, मीटि गयो सब मनको भरना । शिष्य कहे गुरुदेव सुसाहिब, और उपाय नहीं सुहिं तरना ॥ ५ ॥

करुणानिधि आप बनाइ दियो, सकलो संत विवेक की आथी । मेरे हृदयसे दुःखसाल अनेकन्ह, आप मिटाइ कियो सुख साथी ॥