कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(१११)
षरे तब, आयके तत्क्षण लीन संभारा । बीजकदास यही बर मांगत, नित्त हृदय मांहि रहु ध्यान तुम्हारा ॥ १६ ॥
इन्द्रविजय ।
आपेही आप गोसाईं सु साहेब, होहु दयाल दया करि हेरो । ऐसी कृपा जो करो हम ऊपर, जे विधि होहुँ तुम्हारो हि चेरो ॥ औरहि व्रत मिटायके साहेब, एकही व्रत तुम्हारो हि प्रेरो । शिष्य कहे गुरुदेव सु साहेब, यहि विधि ध्यान तुम्हारो हि मेरो ॥ १ ॥
भांति अनेक करे यह चित्तसो, कर्म विकर्म करे तेहि काजा । तीरथ व्रत करे बहुते विधि, ताहिके काज लगावत साजा ॥ जो गुरु यज्ञ करे किया तप, करे पुनि ध्यान कहे महाराजा । भारि भरोस हिये गुरु आपसो, आप गुसाईं सु हो शिस्तजा ॥ २ ॥
नानाहि भांति विचार करौं बहु, एकहुँ चित्त न आवत मेरो । जाल अनेकन हाल विहालसो, काल कराल करे घनघेरो ॥ जीवन मारि कियो पिसमानसो, कोईके चित्त न आवत हेरो । मोकहँ तो इक आश तुम्हारिहि, भाँति अनेक कहाँ बहुतेरो ॥ ३ ॥
जादिनसे मोहि आप मिले प्रभु, तादिनसे बहु दुःख निवारा । होय अधीन गह्यो शरणागत, भाजि गयो सब भ्रम पसार ॥ आप पर्खाइके भास मिटाइके, जीव छुटाये कियो निस्तारा । शिष्य कहे गुरु देवसु साहेब, मोकहँ तो एक आप अधारा ॥ ४ ॥
ऐसी कृपा जु करी हम ऊपर, होय अधीन गह्यो जब चरना । जन्म रू मर्ण रहे अब कोनको, ये कहि चित्त तुम्हारोहि शरना ॥ सांझ इक संधिक काल सो आसिक, मीटि गयो सब मनको भरना । शिष्य कहे गुरुदेव सुसाहिब, और उपाय नहीं सुहिं तरना ॥ ५ ॥
करुणानिधि आप बनाइ दियो, सकलो संत विवेक की आथी । मेरे हृदयसे दुःखसाल अनेकन्ह, आप मिटाइ कियो सुख साथी ॥
(१९२)
कवीरपंथी—
भास मिटाइके फाँस छुटाइ दियो, प्रभु कालहि तू अब नाथी ॥ ऐसो दयालको छांडिके रे शठ, तू बहुदेय भुले देह भाथी ॥६॥
जो प्रभु आप सहाय करो नहिं, तो यह जीव रहे भव भीरा । अवगुन बापजि माफ करो अब, मैं कछु शील विचार न थीरा ॥ बाल पुकार करे बहुते सर, हे सुख सिंधु करो मन थीरा । साहेब संत समाज मिले जब, आय लगूँ गुरु ज्ञानके तीरा ॥ ७ ॥
तुमही सब लायक जानत हो सद्, वेद पुरान कुरान अनेका । बुद्धि हीन मलीन पुकारत हों, अबहो प्रभु राखहु वेषको टेका ॥ यद्यपि आप विसारहुगे तब, लोक हँसे नरनारि तरेका । ताहिते शिष्यको भाव धरो अब, शिष्य भरौंस करै गुरु देका ॥ ८ ॥
करसे सुत मात ना छांडत है, शिर दुःख हजार परे मन जोखा । जोपै पूत कपूत सही है, जननी न विचार धरे उर धोखा ॥ कवीर गोसाई मेरे शिरताज, दूजा कहाँ जाये करो तन पोखा । विपति शर बान दहैं अतिसय, तुव दास लडे चढ़ि ज्ञान झरोखा ॥९॥
कवित्त ।
बालक ज्यों बोले बात तोतरी बनाय करी, मात पितु वाके सुख माने प्रेम सानिके । ज्यों पै सुत भूल्यो आय जननी पुकारे धाय, मारे सुख वचन कहत सहुँ आनिके ॥ रोदन करत पूत चले जात दूर धाय, झांझाहीं विलाप धारि लोटे बहु ठानके । हाथही अम्बर लेह पोंछि कर उर देह, पीर सब छीन करी गोद लेवे जानके ॥१॥
दोहा—तैसे तुम गुरुदेव प्रभु, लेहु सकल सुख साज ।
भवबन्धन जाते मिटे, सो चाहत मैं आज ॥ १ ॥
पारख शुद्ध विचार करी, ताहि माँहि सुखधाम ।
ताते कहत हूँ आपसो, मोको राखहु ठाम ॥ २ ॥
शब्दावली
(१९३)
सोरठा ।
खबर लीजिये मोर, परख रूप किरपाल प्रभु । तुम तजी अनत न ठौर, अबतो आश तुमार है ॥ १ ॥ तात मातें मित्रादि, नहिं कोइ मेरो जगतमें । तुम सुहिर्द बर आदि, भवनधि तारो नाथ हम ॥ २ ॥ अवगुन देखहु मोर, नहिं कल्यान जु कल्पसुधि । दया दृष्टि कर तोर, अवगुन चित्त न विचारिये ॥ ३ ॥ साहब परम उदार, सुखसागर सुखरूप घन । ताते करत पुकार, जो गुरु होहु सहाय अब ॥ ४ ॥
कवित्त ।
दीनोंके दयाल आप कियो है निहाल मोहिं, करो प्रतिपाल सुख सागर समान हो। नागर विराजमान आगर कहत सब, जनके दयाल मोहिं हियमें सोहात हो ॥ कहत अगम वेद पार नहिं पावत सो, मन भरमात मेरो आप सुख सार हो । शुद्ध बुद्ध ज्ञानभारी सन्तनके रूपधारी, कहे सहदेव भव पारहुके पार हो ॥
आपही पूरन गुरु साहेब कबीरहीसो, तिनको नम्र होय बन्दनी हमारी है । सुखही सरूप रूप ज्ञानही अनूप भूप, परख प्रकाश जहां नसे अन्धकारी है ॥ दरसही पाप टारी झाईं संधि काल जारी, निजपद आप देहीं, बडे उपकारी है। दीनको दयाल प्रभु सन्तनके उरमाल, कहे सहदेव गुरु ऐसो सुखधारी है ॥
छन्द त्रोटक दुइपदी ।
गुणबन्द निधान सर्वज्ञ प्रभुं । त्रियताप निधारण धीर विभुं ॥ कर्णधार उबारन जीवधनी । स्वयंपारख शोद्धच सुवाक्य मणी ॥१॥ त्रिगुणं रहितं सत भाषण हे । नित परख प्रकास सुसासन हे ॥ सुगिरामृतधार प्रवाह सरी । पुट श्रावण पानको प्यास
कबीरपंथी शब्दावली ७
(१९४)
कबीरपंथी—
हरी ॥२॥ मुझ दासको देव तुहि प्रभु हो । दीननाथके नाथ रखो शर्णु हो ॥ ३ ॥
छन्द मुनगी ।
गुरुजी कृपालो बडो तु दयालो । करो प्रतिपालो मिटी दुःखसालो ॥ कहैँ बिनती मैं शिशु जानि तारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ १ ॥
परम सुजान महागुनखान । शीलके निधान सब सुखस्थान । कोईना कोईना कोईना हमारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥२॥
परं विरागी क्षमा उरपागी । मैं तो हूँ अभागी तेरो पाव लागी ॥ हूँ अनारी अनारी मेरो दुःख टारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥३॥
गिराहे तुमारी हरे शूल भारी । माया मोह डारी देही सुख सारी ॥ अनाथा अनाथा हियोहे अधारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥४॥
मेरे तुहीं स्वामी तुहीं अन्तर्यामी । नहिँ काम कामी प्रभुजी अकामी ॥ दयाला दयाला गुरुजी तुं सारों । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ५ ॥
मेरी बात मानी कहैँ सो तुं जानों । तेरो ज्ञान भानो करे अन्ध हानो ॥ डरो अन्ध जारो उजारो उजारो । डरों दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ६ ॥
मेटो भांतिझारी भुमां शोकफारी । ग्रही टेकयारी करी प्रीति भारी ॥ चहुँ साथ तेरो मेरेकुं उबारो । डरों दुःख देखी भवोंके उपारो ॥७॥
अहो देव देव करुं तेरो सेव । अबे गुरुदेव देहु सुख भेव ॥ प्रकाशी प्रकाशी प्रभुजी पुकारों । डरो दुःख देखी भवोंके अपारो ॥ ८ ॥
अथ विनयशब्दावलिल प्रारम्भः ।
श्रीपूर्ण साहब छत.
शब्द १—देखों अति सुन्दर छबि नीकी । मंगलदायक सुख
शब्दावली
(१९५)
लायक, निरखि सकल छबि लागत पीकी ॥ टे० ॥ कृपा करत लखि दीन दयाकर, भ्रांति मिटाव सकलो जीकी ॥ शरण गये सकलो दुःख मेटत, सुख उपजावत देवत सीकी ॥ निज पद माँहि छेत बैठारी, गांठ छुडावत मैं ममतीकी ॥ गुरु सम को उदार जगमाहीं, पूरन कीन्ह परख अति नीकी ॥ १ ॥
शब्द २-शरण तुम्हारी आयोजी गुरु ॥ टे० ॥ त्रिगुण मायाके फन्द़ा परि; युगन २ जहाँडायो ॥ चाह न योगध्यानकी अब मोहि, नाम जगीरी पायो ॥ १ ॥ लोक परलोक कछु नहि चाहों, सगुण निर्गुण नहि भायो ॥ पूरण ज्ञान ज्ञान विज्ञानको, भयो जब पारख थिति पायो ॥ २ ॥
शब्द ३-हौ प्रभु दीन जनन प्रतिपालक ॥ टे० ॥ हौ मति मन्द छन्द विषयनको, महा अज्ञ इन्द्रिकको चालक ॥ औगुन हरन नाम प्रभु तेरो, मैं औगुणी अधम कुल घालक ॥ मैं अति दीन शरण तुव आयो, छवो अपराध जीवनके पालक ॥ ना मोहि योग भोग मद नाहीं, धन मद नाहि बाँह बल बालक ॥ पूरन दासके तुमहि अधारा; और सकल जगमें यम जालक ॥ ३ ॥
शब्द ४-पतित पावनको सुन्दर ध्याना । निरर्त बदन प्रसन्न सुखदायक, देह आदि बिसरत जग भाना ॥ टे० ॥ चक्रांकित शिर टोप विराजे, ता ऊपर दस्तार बखाना । तिलक लिलाट शुभ अति नीको, तुलसीकी माल गले बिच नाना ॥ १ ॥ ज्ञानको अचला मुक्ति मेखला, अष्ट सिद्ध सेली प्रमाना । दया सिंहासन आई बैठे, पूरणदास चरण लपटाना ॥ ४ ॥
शब्द ५-कहाँलो कहौ गुरुप्रद प्रताप ॥ टे० ॥ जो मुख होय जीव दश लाखा, तऊ न बरनि सकत प्रभुजाप । अनेक जन्मको जीव विहाला, तिनको मिटचो महा भ्रम दाप ॥ सङ्कटमें सन्तनको
(१९६)
कबीरपंथी—
तारा, साधुरूप धरे पुनि आप। बादशाहको कसनी दीन्है; सिंहरूप धरे पुनि आप ॥ भेषकी टेक राखि करुणामय, पूरण कहा कीन धौ पाप ॥ ६ ॥
शब्द ६—तेरा दिल चाहे उधरे देख मैं देखूँगा तुझे ॥ टे० ॥ तुमतो मुखतार यार स्वतः सिद्ध आपी आप, और को न जानें एक आशरा तेरा है मुझे ॥ १ ॥ चाहे तो चन्द्रमा चकोरनको त्याग करे, पर चकोरनकी आग कहु चन्द्र बिन कैसे बुझे ॥२॥ चाहे तो प्रकाश सकल नेत्रको त्याग करे, पर विनु प्रकाश नेत्रनको जगमें कहु कैसे सूझे ॥ ३ ॥ सतगुरु दयाल तेरो सेवकहूँ बाल, बाल पूरणको तुमही एक और कोई नहिं दूजे ॥ ४ ॥ ६ ॥
शब्द ७—तेरी खुशी देख या न देख मैं देखूँ तेरे चरणोंमें ॥ टेक ॥ माय बाप सकल टारे, जाति पांति सकल सब विसारे, सकल आस छाड़ि गुरु ! आन पडा शरणोंमें ॥ १ ॥ त्याग दर्ई सकल लाज, काहूसे न राख्यो काज, घर घरके भिखारी हूँ नाम सुना करनोमें ॥२॥ हरदम तेरा आभास और कछु नाही भास, सबसो हौ गयो निराश जो तनही भरनोमें ॥३॥ नाम तेरा है दयाल पूरण फिरत बिहाल, कबधौं करिहौं निहाल, जावे जबरनोमें ॥ ४ ॥ ७ ॥
शब्द ८—मेरी प्रीतके निवाहन हारे, लीजे खबरिया हंस पियारे ॥ टे० ॥ हौं अनाथ कहलावत तेरो, काहे निकारि बाहिर मोहिं डारे ॥ १ ॥ जो दूरिआव मोहिको सतगुरु तोहू न छोड़ो चरण तिहारे ॥ २ ॥ तुम्हारा नाम सुना प्रभु श्रवणन, कि प्रभु पतित अनेक उबारे ॥३॥ करहु दया निज टेक निबाहो, जो तुम बिरद जगतमें धारे ॥४॥ जो कहो मोहि न जगतसे काजा, रहत अलिम सबनसों न्यारे ॥५॥ तो उपदेश कीन गहि बाहों, अब हम जाब
शब्दावली
(१९७)
कौनके द्वारे॥६॥ धारी देह जीवन हितलागी, दै परचे अनेक उबारे॥७॥ तार भार दीन्ह तोहि पूरण क्षमा करो अपराध हमारे॥८॥८॥
शब्द ९-धन सतगुरु तुमरी बलिहारी ॥ मैं मति हीन छीन निज कर्मनि, दीन उधारन लीन उबारी ॥ टे० ॥ जिमि अंकुर तपे विलु बारी, ताकी अम्बुज सिद्ध खरारी ॥ आनिके वेगहिं लीन जगाई, नहीं तो परते भर्म बिगारी ॥ परम दयाल दयाके सागर, महाकष्ट दुख द्रन्द निवारी ॥ सदा रहत दासनके संगा, पूरण परखावत भर्म विकारी ॥ ४ ॥ ९ ॥
शब्द १०-मम बोहित तुम खेवनहारा । जग समुद्र अज्ञान भरचो जल, तृष्णा तरंग करत ललकारा ॥ टे० ॥ काम कोध जलजन्तु अपरबल, बैठा मगर भरि हंकारा॥१॥ मोह भर्म बिच आनि पराहूँ, सूझिपरे नहीं वारो पारा ॥२॥ बूडत नाव उबारो साहब, आदि अन्तके हो कड़िहारा ॥३॥ अशरण शरण विरद सम्भारो, पूरण आयो शरण तुम्हारा ॥ ४ ॥ १० ॥
शब्द ११-तुमीरहि दरसको बना हूँ भिखारी ॥ मधुकर इव सब फिरत जगतमें, कबधौ मिलौगे कमल सुखारी ॥ टेक ॥ काम कोध मद लोभ अपरबल, तृष्णा उठत लहरि अति भारी ॥ मन रात्यो नाना विषयनमें; इन्द्रिन बाट निपट मोरि पारी ॥ चित्त चंचल को समुझावे, खाँड छाड़ि फांकत है छारी ॥ गुरु विचार पर छिनहु रहत नहिं, जग अनित्य मां भई मतवारी ॥ ई नाना औगुन मोमें रहत है, मांगो दर्शन करि ढिठियारी ॥ जेहि हित मुनि जन योग करत हैं, त्यागि राज कुटुंब धन नारी ॥ पूरन एक भरोसो आवत हो प्रभु जीवनके हितकारी ॥ शरण आयको त्यागत नाही, बन्दीछोर विरद अति भारी ॥ ११ ॥
शब्द १२-मुझ लाचारके तुम रखवारी ॥ टे० ॥ नहिं मोहि
(१९८)
कबीरपंथी-
द्रव्य बाहु बल नाहीं, नहिं मोहि विद्या बल अधिकारी ॥ ना मैं सिद्ध न साधनको बल, ना मैं मन्त्री ना व्रतधारी ॥ तपसी हौं ना मैं, हौं दीन परम गुरु, बाँह गहेकी लाज तुम्हारी ॥ बालकके दुलार निरवाहन, तुम विनु कौन पूर्ण सुखकारी ॥ १२ ॥
शब्द १३-परचो है कष्ट अति भारी मोको कष्ट अतिभारी ॥ ॥ टे० ॥ पारखंडिन पाछो बहु कीन्हो, ताते चोट लगत है कारी ॥ दीन जानि उपहास किय चाहै, मैं लाचार गरीब विचारी ॥ ना मुहि सिद्धि न साधनको बल, सुझ कंगालके तुम रखवारी ॥ सगरी जाल तुम्हारी परमगुरु, पूर्ण तुव पद केर भिखारी ॥ १३ ॥
शब्द १४-तुव चरणांमुख बिशद प्रयोगे ॥ टे० ॥ मय मन कठिन भँवर अतिदारुन, कारन कौन तन्त्र नहिं लागे ॥ अब यह मांगों तोहि दयानिधि, कर जोरे प्रेमन बहु पागे ॥ जो रज पावन करत जगतको, सोइ आई मस्तकपर लागे ॥ और इच्छा होय कबहुँ कछु, निशिदिन रहुँ चरणनके आगे ॥ चरण प्रताप होत ज्ञान गम, बहु जीव जाते होत सुभागे ॥ महिमा तुव चरणनकी साहब, विनु जाने सब जीव अभागे ॥ ताते काया रहै जबलौं जग, तौलौं रहौं मैं चरणन लागे ॥ आखिर चरण होय तैं हौं, जैसे सीप बुन्दसों लागे ॥ साहब कवीर सुखरूप कृपाघन, पूर्णदास यही वर मांगे ॥ १४ ॥
शब्द १५-तुम्हरे नामको भरोसो भारी ॥ हो प्रभु सेवकके सुखकारी ॥ टे० ॥ सिद्ध चौरासी बन्दि परे तब, गुरु गुरु करि कीन्ह पुकारी ॥ तुरतहि जाइ छुडायो तिनको, साह सुलतान कीन्ह सुखारी ॥ एक दिना काशीके माहीं, कुछी साह आयो अतिभारी ॥ पद्मनाभने परचे दीन्हा, नाम प्रतापते कष्ट निवारी ॥ नाम लेत तारे बोहित प्रभु, साह दामोदरकी भयहारी ॥ इन्दुमती
शब्दावली
(११९)
जब टेर कियो है, नाम प्रताप उत्तरचो विषकारी ॥ नाम तुम्हारा अटल प्रभु युग युग, जीवन अधम अनेक उबारी ॥ याहीते निश्चय भयो पूरण अबः करिहौ सुखी सब दुःख विडारी ॥१६॥
शब्द १६-कैसे रहौ जगमाहीं करुणायतन विनु, कैसे रहौ ॥ टे० ॥ जैसे जल विनु मीन दुखित होय, तलफि तलफि मरि जाई ॥ कोइ तो आय ब्रह्म बतावे, सूर प्रभाकी झाई ॥ कोइ तो कहै यह आतम स्वयम्, जल तरंगकी नाई ॥ कोइ तो कहत दूजा है कर्ता, कोइ तो कहत कछु नाई ॥ कोइ तो कहत यह देहही ब्रह्म है, मेरो मन न पतियाई ॥ कोई योग कोई ध्यान बतावे, कोइ कोइ अलख लखाई ॥ कोइ कहै ज्ञान विचार करो फिर, आप ब्रह्म जग भाई ॥ गुरु कवीर पारखकी राशि, सब सुखको सुखदाई ॥ ता पदसे कैसे होय न्यारो, आपहि पूर्ण कहाई ॥१६॥
शब्द १७-क्यों न जपो मन लाई, अक्षर दोष नीको, क्यों न जपो मनलाई ॥ टे० ॥ गुरु गुरु यह महामंत्र है, और मंत्र कछु नाहीं। ब्रह्म जपत अरु विष्णु जपत हैं, और जपत शिवराई ॥ शास्त्र पुराण यह साख बखानत, गुरुते परे कोइ नाहीं ॥ गुरुते सकल सिद्धि रिद्धि होत है, गुरुते परम पद पाई ॥ गुरुते ज्ञान अरु गम्य होत है, गुरु विनु कछु न बसाई ॥ गुरु विनु काहूको काज सेरे नहिं, बहुत भये जगमाहीं ॥ राम कृष्ण तिनहूँ गुरु कीन्हा, सूरख चेतत नाहीं ॥ और मंत्र सब कालस्वरूपी, जीवन देत झुलाई ॥ गुरुमन्त्र यह पूरण कृपा धन, जीवनके सुखदाई ॥१७॥
शब्द १८-गुरुते और नहिं कोई; मन देख विचारि ॥ टेक ॥ ज्ञानी मुनी सब ज्ञान बखानैं, रीते गये सब कोई । गुरुके गुण सब गावहिं, हो गज अन्धकी नाई ॥ टोइ टोइ पार नहिं पावे, मन माने मति भाई ॥ कोइ ब्रह्मा कोइ विष्णु कहै गुरु, कोइ कहै
(२००)
कवीरपंथी—
शिवजोई॥ कोइ कहै सतगुरु पार ब्रह्म है, या विधि गैल बिगोई॥ कोइ तो परमगुरु पुरुष बखाने, ईश कहत कोइ लोई॥ कोइ कहै गुरु अन्तर्यामी, सबमें भरचो है सोई॥ कोइ कर्ता कोइ माया कहै गुरु, मति बुद्धि सब गइ खोई॥ पूरण त्रिपद लांचे नाहीं, कसे गुरु पद होई॥ १८॥
शब्द १९—बक बक सब बौराने, गुरु कोइ न जाने। अंधाधुन्ध मत प्रगट कियो है, सब जीवनको ताने॥ टेक॥ घर घर तो सब गुरुआ बने हैं, कौन्हें बहुत बहुत बन्धाने॥ बन्दीछोर विनु नहीं उबारा, ये सब जग मलताने॥ बन्दी छुडावन जगमें निकसे, आइपरे बन्दीखाने॥ जो पूछौ गुरु कासौ कहिये, तौ कहत आनकी आने॥ कोई कहै गुरु सच्चिदानन्द, कोई कहै पुरुष पुराने॥ कोइ मानुष कोइ देव कहत हैं, यहि विधि भरम झुलाने॥ कोई शब्द कोइ वेद कहत हैं, कोई आतम अनुमाने॥ त्रिपद परखाये विनु पूरन, कैसे परे पहिचाने॥ १९॥
शब्द २०—आप न बूझ कहैं और बुझावे, विनु पारख नर भटक़ा खावे॥ टे०॥ ग्रन्थ पुराण बहुत जग बांचे; याते कहैं आवागमन नसावे। रहनी विना सब कहनी कांची, विनु भोजन कभूभूखन जावे॥ बेटी बेटा चेली चेला, मोह जाल कहैं जानिबढावे। घर छोड़े मठकी करै आशा, पूरण व्याधि कहैं सीस चढावे॥२०॥
शब्द २१—गुरुजी तेरो भजन भरोसो भारी॥ टे०॥ शरणागतकी बाँह गहत हौं, भवसे पार उतारी॥ बडे २ अपराधी तारे, हिंदू तुरुक नर नारी॥ गुण औगुण एकौ नहीं जानत, हौं पशु मूरख अनारी॥ जगसे भागि आये तुम शरणा पूरण दीन भिखारी॥२१॥
शब्द २२—मेरो मन बैरागी आज, बसिये साहब चरन॥ टे०॥ चरण प्रताप महा अघ नाशत, मेटत जनम मरन॥ दुख दारिद्र
शब्दावली
( २०१ )
विनाशक गुरुपद होय रहो अश्रुन श्रुन ॥ परस्व परकाशी सब सुखराशी, जीवन मुक्ति करन । सबहिनके सुखदाई पूरन, सहाइ भवभय रोग हरन ॥ २२ ॥
शब्द २३—होय रहु साहब शरण, मन छाड़ि जगतकी आस ॥ टे० ॥ जग आशा औ स्वर्गकी वासा, यही कालकी फाँस ॥ नर नारी औ माल खजाना, छाड़ि आयुर्बेल गाँस ॥ सुन्दर तन अरु सुन्दर जग यह, सब सपनेको भास ॥ पूरण पारस्व जौलौं नहि पावे, तौलौं भरम विलास ॥ २३ ॥
शब्द २४—भजुरे मन सदगुरु कृपालको नाम ॥ टे० ॥ नामप्रताप अटलि तिहुँ लोकमें, सब विधि मङ्गल धाम ॥ और नहीं कहुँ जाऊँ महा प्रभु, लागि रहौं निशिनाम ॥ नाम रटन जिन जगमें कीना, ते पाये विश्राम ॥ नाम असंग सकल सुखदाता, करिहैं पूरण काम ॥ २४ ॥
शब्द २५—( रागपिस्ता ) जायके सनमसे कहियो मेरी बात । वेगि खबरिया लीजै अब जान निकरी जात । जाय सनमसे ॥ टे० ॥ तेरे विरहके मारे मोहिं नौंद न आवे । नयनोंने झरि लाई जीव चैन नहिं पावे । एक राहके दरियावमें बूडा है मेरा मन । एक वक्त गश आवता जाता बिसर तन ॥ सुरता सहेली जायके तूने कहना अहवाल । वेगिते दर्श दीजै दास होत है विहाल ॥ सुख निधान समरथ सब सुराको बीज है । तेरी शरणमें आयके पूरण अजीज है ॥ २५ ॥
शब्द २६—प्रभु विनु दुख नरकको कौन हरे ॥ टे० ॥ जहँ जहँ कष्ट पडत दासनको, तहँ तहँ साहब होत खरे ॥ गर्व करै तो भरी ढरकावे, होत अधीन तो फेरि भरे ॥ भाव भक्तिके सदा समीपी, दम्भ पारखण्डते रहे परे ॥ दीनदयाल विरह है जाको, ताको पूरण ध्यान धरे ॥ २६ ॥
(२०२)
कबीरपंथी—
शब्द २७—सुनिय दयानिधि अरज दासकी । कृपा किये बहु भर्म मिटाये, शंका रही न गरभवासकी ॥ बडे भाग मैं आपन जान्यो, आय परचो प्रभु चरण खासकी ॥ देह अनित्य कहा अब मानो, नाश होयगी रक्त माँसकी ॥ यहि जगतकी मोह कहाँ बढ़ावई, कहा कथा जड वाम मासकी ॥ रिद्धि सिद्धि और मान बड़ाई, मनमें इच्छा नहीं तासुकी ॥ अमृत भोजन पाय अघाय, पुनि कस इच्छा होत घासकी ॥ यह संशय मेरे मन आई, मेटहु साहब कठिन फाँसकी ॥ परख विलासी सब सुखराशी, जानत हो सब जीव पासकी ॥ काह छिपा तुमसे कहे पूरन, टेक निवाहो मोर आसकी ॥ २७ ॥
शब्द २८—तुम विनु समरथ कौन रखवारा । जीवनको दुख मेटनहारा ॥ टेक ॥ जब जब कष्ट परत दासनपर, होत विहाल जीव करत पुकारा ॥ धारि देह तुरत तहाँ प्रगटत, दुख द्रन्दज सब दूरि विडारा ॥ कियऊ सुखी निज दासन लागि, काहे उपेक्षा कीन्ह हमारा ॥ पूत कपूत लाज जनि ताको, शरण परे निर्वाह बिचारा ॥ करुणामय कवीरगोसाई, दीनदयाल विरद अति धारा ॥ दीन जानि अब दाया कीजै, आनि गह्यो अब शरण तुम्हारा ॥ जगमें कछु न मोर अधिकाई, साहब शिर सेवकको भारा ॥ पूरण दुखित होय जो समरथ, तो लाजत सब विरद तुम्हारा ॥ २८ ॥
शब्द २९—याहीते प्रभु नाम दातारा, सेवक आश पुरावनहारा ॥ ॥ टेक ॥ हीन दीन अति दीन भयो तब, याचक आयके कीन्ह पुकारा ॥ जो नहि आश पुराओ ताको, तो लाजत हैं विरद तुम्हारा ॥ हम ऐसे याचक तुम्हरे घनरे, मेरे तो एक तुमहि आधारा ॥ तजब प्रान जो याचत तुमसों, तब हम जाब कवनके द्वारा ॥ हंसन नायक सब सुखदायक, सुनिके अरज भली चित धारा ॥
शब्दावली
(२०३)
जो नहि हमरी वांछा पुराओ, तो हँसिहैं सकलो संसारा ॥ जाके सेवक होत विकल अति, ताके साहब कस कल धारा ॥ पूरण याहि अन्देशा मोही, जानि बूझिके चहत विसारा ॥ २९ ॥
शब्द ३०-तुम विनु अरज करौं केहि आगे । स्वर्ग मृत्यु पाताल लोक लौं, अस को जो मोहि करत सुभागे ॥ टे० ॥ करुणामय कवीर कृपानिधि, साधु सन्त गावत सब जागे ॥ कि प्रभु अजर अमर अविनाशी, सुमिरत जाहि सकल दुख भागे ॥ यहि ते मोहि भरोसा आवत, औ प्रतीति भई बहु जागे ॥ अबकी बार कस विलम्ब कियो है, यह अचरज मनमें अति लागे ॥ तुम सब लायक हो सुख दायक, अचरज करत मोरे मन पागे ॥ चाहो तो अपने टेक निबाहो, नाहीं तो हम बने हैं नागे ॥ पूरण अचरज करत सुख साई, तुम कीरति मोको हित लागे ॥ इतनी विनय मानहु मोरी, जो मम सुरति निझाना दागे ॥ ३० ॥
शब्द ३१-कृपादृष्टि कब हेरो गुरुजी कृपादृष्टि कब हेरो ॥ टे० ॥ तुम अस समरथ शिर पर राजत, दुख पावत है चेरो ॥ सब लायक प्रभु हो सुख दायक मम अपराध घनेरो ॥ क्षमो अपराध दयाके सागर, आय परे शरणों अब तेरो ॥ पूरनकी यह अरज दयानिधि चरणन देहु बसेरो ॥ ३१ ॥
शब्द ३२-कभी तो भी दरस दिखाओ गुरुजी मोको कभी तोभी ॥ टे० ॥ चातकवत मैं पंथ निहारों स्वाती हूँके जुडावो ॥ जिमि चकोर चन्दा तन चितवत, और नहीं चित भावौ ॥ तुम्हरे दरस विनु अति विहाल जिय, मिलत न परख परभावौ ॥ पूरणके साहब सुख दाता, विनवत हौं गहि पावो ॥ ३२ ॥
शब्द ३३-लीला प्रभु तुम्हारी कही न जाय ॥ टे० ॥ राई सों पर्वत करि डारत, पर्वत राई तुल्य दिखाय ॥ सुर नर मुनि सब
(२०४)
कबीरपंथी—
खोजत हारे, कृपा मात्रमें सो परखाय ॥ जो पद इन्द्रादिक नहीं पावत, सो पद माँहिं दास बैठाय ॥ साहब कबीर जीवन सुखदाता, पूरण निज पद माँहिं रहाय ॥ ३३ ॥
शब्द ३४—मिले हैं दयाल कृतार्थ भये हम ॥ टे० ॥ शब्द लखाये कियो प्रभु मेरे, निज करते डारी उरमाल ॥ धोखा द्वन्द्व सवै मिटि गयऊ, दूटि गयो सब जमको जाल ॥ स्वर्ग मोक्षकी आशा नाहीं, पारख पाय भये है निहाल ॥ पूरण प्रकाश और नहीं आशा, सर्वत्र दयाल बन्दीछोर कृपाल ॥ ३४ ॥
शब्द ३५—मन हर लीन्हो सत्य कबीर ॥ मन० ॥ टेक ॥ लोग कहत जग भई है बावरी, कोई न बूझत पीर ॥ गावन नाचन कछुओ नहीं भावे, व्याकुल भये हैं शरीर ॥ बहु विचार केतिक समझाऊँ, जियरा धारत न धीर ॥ पूरन सुख प्रभु आप विराजे पञ्चकोशके तीर ॥ ३५ ॥
शब्द ३६—मन हर लीन्हो दीन दयाल, जीवनके रक्षपाल ॥ टे० ॥ कहौं कहा मोहि कल न परत है, अन्तर होत बिहाल ॥ सुख सम्पति मोहि कछुवो न सुहावै; लोग कुटुम्ब यमजाल ॥ तनकी सुधि बुधि सबही बिसरी, जब दीन्हीं उरमाल ॥ पूरण सुख जे पूर रह्यो है, कहा करे भर्म काल ॥ ३६ ॥
शब्द ३७—गुनी अगुनी हौं तिहारो प्रभुजी ॥ गुनी० ॥ टे० ॥ पुत्र अजान करतु है औगुण, तोहु पिताको प्यारो ॥ जो मम औगुण लखहू साहब, तो सब विधि हम हारो ॥ मिहर करहु जो दास जानिके, तो हम जग निस्तारो ॥ विरदकी लाज राखु प्रभु मोरी, पूरण दीन विचारो ॥ ३७ ॥
शब्द ३८—हमारी लाज तुम्हारे हाथ गुरु नाथके नाथ ॥ ह० टे० ॥ खर्ची खुट गई वर्षा आइ, देश बुरो गुजरात ॥ तुम बिन
शब्दावली
(२०५)
कौन हमारो वाली, जो अब करत सनाथ ॥ तेरे नामको भरोसा मोको और न कोई संग सँघात ॥ लेहु खबरि कवीर कृपानिधि, पूर्ण नावत माथ ॥ ३८ ॥
शब्द ३९-तुम विन कौन हमारो देश, कठिन कालको वेष ॥ टे० ॥ जोरे मिला सो अपनी गरजको, राजा रंक नरेझ ॥ हमरे तो गुरु तुमहिं अधारा, दीन दयाल वरेश ॥ वेग खबरि लेहु प्रभु आई, दुचित भयो जिय रेश ॥ निज दासन प्रतिपालन करत प्रभु, साहब कवीर दुवैश ॥ ३९ ॥
शब्द ४०-गुरु तेरे दर्शनकी बलिहारी ॥ गुरु० ॥ टे० ॥ तुम्हरे दरसते कष्ट हरत है, करम मिटत है भारी ॥ सन्त स्वरूपी आप कृपानिधि, खोलत भरम किवारी ॥ जिन्हें दरस सुख दियो दयानिधि, आवा गमन तिवारी ॥ सुख स्वरूप कवीर कृपानिधि, पूर्ण परख विहारी ॥ ४० ॥
शब्द ४१-तुम विनु कौन खबरिया मोरि लेवे ॥ टे० ॥ देश विरान कोइ नहिं आपन, कौन सेवकको सेवे ॥ मेरे तो सतगुरु एक अधारा, जो चाहौ सो देवे ॥ यह जग सबही द्रन्द पसारा, कैसे नवरिया खेवे ॥ परख विलास कवीर कृपानिधि, पूर्ण जानत भेवे ॥ ४१
राग विलास ।
शब्द ४२-तुमहौ सतगुरु दाता मेरे, मैं अधीन चरनके चरे ॥ टे० ॥ तुमको माँगे तुमको जाचे, निशिदिन रहत चरनके नेरे ॥ चरन छांडि अनते नहिं जाबे, जैसा भँवर कमलको घेरे ॥ तुमरा ज्ञान ध्यान जप तुमरो, तुम तजि और तन नहिं हरे ॥ जिमि पतिव्रता पतिव्रत ठाने, आज्ञा जुगवे सांझ सबेरे ॥ हरि हर ब्रह्मा आदि जे देवा, रिद्धि सिद्धि दातार घनेरे ॥ हमको नहीं इन सबते काजा, एक तुम्हारी दयाके प्रेरे ॥ वेगि खबर लेहु करुणा-
( २०६ )
कबीरपंथी—
मय, काहेको अन्त लेत प्रभु मेरे ॥ तुमही जानक तुमही प्रेरक, तुम कवीर हो सुखके डेरे ॥ ४२ ॥
शब्द ४३—सबके जनैयाको कहा जनैये, जानतही सकलो सुख पैये ॥ टे० ॥ तनकी मनकी सकल लोककी, जाननहारसो कहा छिपैये ॥ निर्मल संगति करहु संतकी, निर्मल होयके निर्मल समुझैये ॥ जो जानत तिहुँ लोक रैन दिन, ता साहबको कहा जनैये । जाग्रत सुषोत्ति तुरिया, तुरियातीत नहि जहँ पैये ॥ वाच्य लक्ष मनको चतुराई, जहाँ नहि तहँ कैसे कि जैये ॥ विनु पारख कछु जानि परे नहि, उनकी कृपा विनु परख न पैये ॥ हौ लाचार सकल विधि साहब, विनय करो तो को चित्त लैये ॥ सुख स्वरूप कवीर कृपानिधि, पूरनको मन ना भगैये ॥ ४३ ॥
शब्द ४४—वेगि खबरिया प्रभु लीजे दीन दयाला ॥ टे० ॥ आनि परचो परदेशमें देरुयो यमको जाला ॥ इहाँ न कोई आपनो, तुम विनु रच्छपाला ॥ मोहि तो आधार तेरे नामको, हौ दासन प्रतिपाला ॥ मोहि कछु बिलम्ब न कीजिये, जीव भये हैं बिहाला ॥ हौ गुणी औगुणी पर, तेरोई कहावत बाला ॥ जो तुम खबरि न लेहु, तौ मम कौन हवाला ॥ साहब कवीर सुखके राशी, हौ करुणाके आला ॥ सुनियो अरज निज दासकी, अब करिये निहाला ॥ ४४ ॥
शब्द ४५—अपने हम भोगे निज भोग ॥ टे० ॥ जानि बूझि कैसे अन्त लेहौ, यह नहि तुमको योग ॥ जगमें दास कहाये तुम्हारे, लागचो भवको रोग ॥ अस समरथके शरण आयके छूटचो नहीं मम सोग ॥ साहब कवीर विरदके पालक, हँसन लैगैगे लोग ॥ ४५ ॥
शब्द ४६—करुणामय नाम तिहारो ॥ टे० ॥ निठुर भये कछु काज न सरिहैं, आवत विरदको हारो ॥ जग हँसिहैं तब कहाँ बढाई,
शब्दावली
(२०७)
ताते वेगि सम्हारो॥ तुमरी शरण आयउँ मैं साहब, और न कोई सहारो ॥ साहब कवीर दया अब कीजे, पूरण आइ पुकारो॥४६॥
शब्द ४७-दीननके हो दयाल दया जनपै करो॥ शरण आयेकी लाज गई, प्रभु अस जनि करो॥ दशहुँ द्वार विकार धार नौका बहे, सुरति नाहि ठहराय, लगन कैसे लगे॥ पाँच तत्त्व गुण तीन साज सब सांजिया, याते रहे भुलाय, तो फन्दे फँसे॥ त्रिगुण मायाके फन्द फँदो जिव आइके, गहु साधनको संग गुरुते लौ लायके॥ मोक्ष मुक्ति जब होय दया दिल आवई ॥ परिपूरण करि देव महासुख पावई ॥ साहब कवीर बन्दीछोर अरज एक भाखिये । हमसे अधम उधार शरण प्रभु राखिये ॥ ४७ ॥
आराधना (गद्यमय)
(स्वामी श्रीयुगलानन्द बिहारी इत)
हे सत्यपुरुष ! आपहीकी सत्तासे सर्व जड चैतन्य स्थित है, सर्वके जीवन आपही हो ॥ आपके अतिरिक्त जो कुछ गुप्त परगट है, नाशमान, असत्य और अनित्य है, एक आपही सत्य और अविनाशी हो ।
हे सत्यसुकृत ! आपके अतिरिक्त जितनी कीर्ति है सब क्षणिक और मायिक है । सब कीर्ति आपके अतिरिक्त कालने रचे हैं और काल स्वयम् नाश होनेवाला है, इस कारण आपकीही कीर्ति सत्य और नित्य है ।
हे आदि अदली । आपकाही नियम सत्य और सुखदायक है, आपकाही नियम सर्वसे पूर्व प्रकाशित होता है, उसीके सहारे सत्य आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥
अजर ! आपको जरा नहीं है अर्थात् आप जन्म, मरण और उसके मध्यकी बाल, किशोर, युवा, प्रौढ और वृद्धावस्थासे परे सदा एक समानही रहनेवाले हैं ।
(२०८)
कवीरपंथी—
हे अमर ! आप कालके जालसे छुड़ाकर अपने हंसोंको अमर करते हो स्वयम् कालभी आपसे भय करता है ।
हे अचिन्त ! आप शुद्ध आनन्द स्वरूप हो, चिन्ताका आपसे कोई सम्बन्ध नहीं, तथापि हम जैसे दीनोंकी सहायताकी चिन्ता आप सदा ही करते हो ।
हे पुरुष ! आप यद्यपि सर्वत्र एक समान स्थित हो तथापि सच्चे सन्त, सच्चे भक्त, सच्चे हंस और सच्चे पारखियोंके हृदयोंमें आपका विशेष प्रकाश प्रगट होता है ।
हे सुनीन्द्र ! सत्य सुकृत स्वरूपसे आप सदाचारका उपदेश देकर, सुनीन्द्र स्वरूपसे सत्यासत्य सारासारके मननका मार्ग बताते हो, अनेक प्रकारके मनन करने पर भी जब यह जीव कालके जालसे नहीं निकल सकता, तब आप करुणामय स्वरूपसे पारखका मार्ग बतलानेको टकसारकी प्रवृत्ति कराते हो । और जब टकसार द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब आप साक्षात् सत्य कवीरके स्वरूपसे प्रत्यक्ष पारख बतलाकर काल जालसे छुड़ा देते हो ।
हे बन्दीछोर ! आप बारम्बार कहते हो, पुकार २ कर जतलाते हो कि, तुम्हारी शरण विना हमारा ठिकाना कहीं भी नहीं है, जिस समय आपका शरण प्राप्त होता है उसी समय कालसे तिनका टूट जाता है । ऐसी सर्व सुखदाई शरणको भी पाकर हे अधम उधारण ! हम ऐसे अधम हैं कि, आपकी शरण नहीं पकड़ते। वरन केवल सुखसे बाते बनाकर दम्भसे अपनेको आपका दास कहते कहलाते हैं परन्तु, दासपनका नियम तक नहीं जानते॥
हे दीनानाथ ! आपही सबके सहायक हो हम दीन और अनाथ हैं, जिसको नाथ करके पकड़ते हैं वे सभी स्वयम् आपके
शब्दावली
(२०९)
शरणकी अभिलाषा रखते हैं इस कारण हे प्रभु ! आपही सत्यनाथ हो, आपको छोड़ कहाँ जाऊँ ।
हे ज्ञानमय चैतन्य पुरुष ! आपकेही अस्तित्वसे सर्व जड़ चैतन्य भासमान हो रहा है सबकी कुञ्जी आपहीके हाथमें है । कालभी आपके डरसे डरता है । सर्व ब्रह्मांड आपकीही आज्ञा पालन करते हैं । जब आप कालके प्रभु हो तब हमारा आपके अतिरिक्त दूसरा क्या सहारा है ।
हे निर्भय ! जब तक आपका सत्य पारख हृदयमें वास नहीं करता, तबतक हम कालके करतूतोंको जान नहीं सकते जब तक उसे जानकर हम उससे अलग नहीं होते, जबतक आपकी आज्ञाओंका विरोध करते हैं, तभीतक हमको सर्व प्रकारका भय प्राप्त होता है, परन्तु आप जब दया करोगे तभी सर्व भयसे छुड़ाकर निर्भय करदोगे ।
हे आनन्दसिन्धु ! जबतक हमारी ज्ञानशक्तिमें आपके पारखका प्रकाश नहीं होता, तबतक हम आपके सत्यस्वरूपको किस प्रकार जान सकें । जब आप दया करोगे, अपनी सारा सार विचारिणी ज्ञानशक्तिको प्रेरणा कर मुझे अपनी शरणमें लोगे, तभी आपकी आज्ञानुसार कालके जालको परखकर आपकी शरणसे निराश नहीं होंगे ।
हे सत्यसिन्धु ! ऐसी कृपा करो जिससे कि, सर्व असत्यसे छूटकर आपकोही प्राप्त हो जाऊँ ।
हे प्रेममयी ! अपने कृपाकटाक्ष द्वारा ऐसी दया करो कि, आपके सत्य प्रेममें मग्न हो जाऊँ ।
हे अमृतमयी ! ऐसी दया करो जिसमें आपकी अमृतरूपी आज्ञाओं पर चलनेकी हममें शक्ति हो ।
(२१०)
कवीरपंथी—
हे शांतिनिकेतन ! आपकी कृपाके अतिरिक्त हम उस सौभाग्यताको कैसे प्राप्त हो सकेंगे, जो आपके सच्चे दासको प्राप्त होता है। हम कैसे भी हैं परन्तु अबतो आपके कहलाते हैं, यदि हमको सत्य शान्ति प्रदान न करोगे तो आपकीही विरद लज्जायमान होगी।
हे पुण्यमयी ! हे सच्चे भ्राता ! हमको ऐसी सुमति दो जिससे परस्परके विद्वेषको त्यागकर आपकी सेवामें लगजावें।
हे हंसननायक ! अपने ऐसे हंसोंकी संगति मुझे प्रदान करो, जिससे आपके अतिरिक्त दूसरेकी वासना हृदयसे उठजावे।
हे सत्य ! असत्यसे बचाकर सर्वदा सत्यकी ओर लेजाओ।
अविश्वासके जालसे निकालकर, विश्वास और श्रद्धाको प्राप्त करादो। अप्रेमसे बचाकर प्रेममयी देशमें पहुँचादो, अपवित्रतासे निकालकर पवित्रताको दिखादो। स्वेच्छाचारीपणासे निकालकर, अत्याचारसे छुडाकर तुम्हारी इच्छा और आज्ञाके अधीन करके स्वतंत्र और सदाचारी बनादो।
हे कल्याणमयी ! अकल्याणके मार्गसे हटाकर कल्याणकी राह दिखादो।
हे सत्यगुरु ! अन्धकारमय देशसे उठाकर प्रकाशमय देशमें डाल दो।
हे सत्याचार्य ! आपके सत्य धर्म, सत्य पंथ और आपके सच्चे संतोंमें ऐसी श्रद्धा दो जिससे अवनतिके भवनसे निकलकर सत्योन्नतिकी सड़कपर चढ़ जाऊँ।
हम लोगोंको ऐसा उत्साह और ऐसी उत्कंठा दो, जिससे आपकी आज्ञाओंको पूर्ण करने, आपके स्थापित सत्यधर्मको