कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
शब्द २७—सुनिय दयानिधि अरज दासकी । कृपा किये बहु भर्म मिटाये, शंका रही न गरभवासकी ॥ बडे भाग मैं आपन जान्यो, आय परचो प्रभु चरण खासकी ॥ देह अनित्य कहा अब मानो, नाश होयगी रक्त माँसकी ॥ यहि जगतकी मोह कहाँ बढ़ावई, कहा कथा जड वाम मासकी ॥ रिद्धि सिद्धि और मान बड़ाई, मनमें इच्छा नहीं तासुकी ॥ अमृत भोजन पाय अघाय, पुनि कस इच्छा होत घासकी ॥ यह संशय मेरे मन आई, मेटहु साहब कठिन फाँसकी ॥ परख विलासी सब सुखराशी, जानत हो सब जीव पासकी ॥ काह छिपा तुमसे कहे पूरन, टेक निवाहो मोर आसकी ॥ २७ ॥
शब्द २८—तुम विनु समरथ कौन रखवारा । जीवनको दुख मेटनहारा ॥ टेक ॥ जब जब कष्ट परत दासनपर, होत विहाल जीव करत पुकारा ॥ धारि देह तुरत तहाँ प्रगटत, दुख द्रन्दज सब दूरि विडारा ॥ कियऊ सुखी निज दासन लागि, काहे उपेक्षा कीन्ह हमारा ॥ पूत कपूत लाज जनि ताको, शरण परे निर्वाह बिचारा ॥ करुणामय कवीरगोसाई, दीनदयाल विरद अति धारा ॥ दीन जानि अब दाया कीजै, आनि गह्यो अब शरण तुम्हारा ॥ जगमें कछु न मोर अधिकाई, साहब शिर सेवकको भारा ॥ पूरण दुखित होय जो समरथ, तो लाजत सब विरद तुम्हारा ॥ २८ ॥
शब्द २९—याहीते प्रभु नाम दातारा, सेवक आश पुरावनहारा ॥ ॥ टेक ॥ हीन दीन अति दीन भयो तब, याचक आयके कीन्ह पुकारा ॥ जो नहि आश पुराओ ताको, तो लाजत हैं विरद तुम्हारा ॥ हम ऐसे याचक तुम्हरे घनरे, मेरे तो एक तुमहि आधारा ॥ तजब प्रान जो याचत तुमसों, तब हम जाब कवनके द्वारा ॥ हंसन नायक सब सुखदायक, सुनिके अरज भली चित धारा ॥