भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

( २०१ )

विनाशक गुरुपद होय रहो अश्रुन श्रुन ॥ परस्व परकाशी सब सुखराशी, जीवन मुक्ति करन । सबहिनके सुखदाई पूरन, सहाइ भवभय रोग हरन ॥ २२ ॥

शब्द २३—होय रहु साहब शरण, मन छाड़ि जगतकी आस ॥ टे० ॥ जग आशा औ स्वर्गकी वासा, यही कालकी फाँस ॥ नर नारी औ माल खजाना, छाड़ि आयुर्बेल गाँस ॥ सुन्दर तन अरु सुन्दर जग यह, सब सपनेको भास ॥ पूरण पारस्व जौलौं नहि पावे, तौलौं भरम विलास ॥ २३ ॥

शब्द २४—भजुरे मन सदगुरु कृपालको नाम ॥ टे० ॥ नामप्रताप अटलि तिहुँ लोकमें, सब विधि मङ्गल धाम ॥ और नहीं कहुँ जाऊँ महा प्रभु, लागि रहौं निशिनाम ॥ नाम रटन जिन जगमें कीना, ते पाये विश्राम ॥ नाम असंग सकल सुखदाता, करिहैं पूरण काम ॥ २४ ॥

शब्द २५—( रागपिस्ता ) जायके सनमसे कहियो मेरी बात । वेगि खबरिया लीजै अब जान निकरी जात । जाय सनमसे ॥ टे० ॥ तेरे विरहके मारे मोहिं नौंद न आवे । नयनोंने झरि लाई जीव चैन नहिं पावे । एक राहके दरियावमें बूडा है मेरा मन । एक वक्त गश आवता जाता बिसर तन ॥ सुरता सहेली जायके तूने कहना अहवाल । वेगिते दर्श दीजै दास होत है विहाल ॥ सुख निधान समरथ सब सुराको बीज है । तेरी शरणमें आयके पूरण अजीज है ॥ २५ ॥

शब्द २६—प्रभु विनु दुख नरकको कौन हरे ॥ टे० ॥ जहँ जहँ कष्ट पडत दासनको, तहँ तहँ साहब होत खरे ॥ गर्व करै तो भरी ढरकावे, होत अधीन तो फेरि भरे ॥ भाव भक्तिके सदा समीपी, दम्भ पारखण्डते रहे परे ॥ दीनदयाल विरह है जाको, ताको पूरण ध्यान धरे ॥ २६ ॥