भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

शिवजोई॥ कोइ कहै सतगुरु पार ब्रह्म है, या विधि गैल बिगोई॥ कोइ तो परमगुरु पुरुष बखाने, ईश कहत कोइ लोई॥ कोइ कहै गुरु अन्तर्यामी, सबमें भरचो है सोई॥ कोइ कर्ता कोइ माया कहै गुरु, मति बुद्धि सब गइ खोई॥ पूरण त्रिपद लांचे नाहीं, कसे गुरु पद होई॥ १८॥

शब्द १९—बक बक सब बौराने, गुरु कोइ न जाने। अंधाधुन्ध मत प्रगट कियो है, सब जीवनको ताने॥ टेक॥ घर घर तो सब गुरुआ बने हैं, कौन्हें बहुत बहुत बन्धाने॥ बन्दीछोर विनु नहीं उबारा, ये सब जग मलताने॥ बन्दी छुडावन जगमें निकसे, आइपरे बन्दीखाने॥ जो पूछौ गुरु कासौ कहिये, तौ कहत आनकी आने॥ कोई कहै गुरु सच्चिदानन्द, कोई कहै पुरुष पुराने॥ कोइ मानुष कोइ देव कहत हैं, यहि विधि भरम झुलाने॥ कोई शब्द कोइ वेद कहत हैं, कोई आतम अनुमाने॥ त्रिपद परखाये विनु पूरन, कैसे परे पहिचाने॥ १९॥

शब्द २०—आप न बूझ कहैं और बुझावे, विनु पारख नर भटक़ा खावे॥ टे०॥ ग्रन्थ पुराण बहुत जग बांचे; याते कहैं आवागमन नसावे। रहनी विना सब कहनी कांची, विनु भोजन कभूभूखन जावे॥ बेटी बेटा चेली चेला, मोह जाल कहैं जानिबढावे। घर छोड़े मठकी करै आशा, पूरण व्याधि कहैं सीस चढावे॥२०॥

शब्द २१—गुरुजी तेरो भजन भरोसो भारी॥ टे०॥ शरणागतकी बाँह गहत हौं, भवसे पार उतारी॥ बडे २ अपराधी तारे, हिंदू तुरुक नर नारी॥ गुण औगुण एकौ नहीं जानत, हौं पशु मूरख अनारी॥ जगसे भागि आये तुम शरणा पूरण दीन भिखारी॥२१॥

शब्द २२—मेरो मन बैरागी आज, बसिये साहब चरन॥ टे०॥ चरण प्रताप महा अघ नाशत, मेटत जनम मरन॥ दुख दारिद्र