कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(११९)
जब टेर कियो है, नाम प्रताप उत्तरचो विषकारी ॥ नाम तुम्हारा अटल प्रभु युग युग, जीवन अधम अनेक उबारी ॥ याहीते निश्चय भयो पूरण अबः करिहौ सुखी सब दुःख विडारी ॥१६॥
शब्द १६-कैसे रहौ जगमाहीं करुणायतन विनु, कैसे रहौ ॥ टे० ॥ जैसे जल विनु मीन दुखित होय, तलफि तलफि मरि जाई ॥ कोइ तो आय ब्रह्म बतावे, सूर प्रभाकी झाई ॥ कोइ तो कहै यह आतम स्वयम्, जल तरंगकी नाई ॥ कोइ तो कहत दूजा है कर्ता, कोइ तो कहत कछु नाई ॥ कोइ तो कहत यह देहही ब्रह्म है, मेरो मन न पतियाई ॥ कोई योग कोई ध्यान बतावे, कोइ कोइ अलख लखाई ॥ कोइ कहै ज्ञान विचार करो फिर, आप ब्रह्म जग भाई ॥ गुरु कवीर पारखकी राशि, सब सुखको सुखदाई ॥ ता पदसे कैसे होय न्यारो, आपहि पूर्ण कहाई ॥१६॥
शब्द १७-क्यों न जपो मन लाई, अक्षर दोष नीको, क्यों न जपो मनलाई ॥ टे० ॥ गुरु गुरु यह महामंत्र है, और मंत्र कछु नाहीं। ब्रह्म जपत अरु विष्णु जपत हैं, और जपत शिवराई ॥ शास्त्र पुराण यह साख बखानत, गुरुते परे कोइ नाहीं ॥ गुरुते सकल सिद्धि रिद्धि होत है, गुरुते परम पद पाई ॥ गुरुते ज्ञान अरु गम्य होत है, गुरु विनु कछु न बसाई ॥ गुरु विनु काहूको काज सेरे नहिं, बहुत भये जगमाहीं ॥ राम कृष्ण तिनहूँ गुरु कीन्हा, सूरख चेतत नाहीं ॥ और मंत्र सब कालस्वरूपी, जीवन देत झुलाई ॥ गुरुमन्त्र यह पूरण कृपा धन, जीवनके सुखदाई ॥१७॥
शब्द १८-गुरुते और नहिं कोई; मन देख विचारि ॥ टेक ॥ ज्ञानी मुनी सब ज्ञान बखानैं, रीते गये सब कोई । गुरुके गुण सब गावहिं, हो गज अन्धकी नाई ॥ टोइ टोइ पार नहिं पावे, मन माने मति भाई ॥ कोइ ब्रह्मा कोइ विष्णु कहै गुरु, कोइ कहै