भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२०३)

जो नहि हमरी वांछा पुराओ, तो हँसिहैं सकलो संसारा ॥ जाके सेवक होत विकल अति, ताके साहब कस कल धारा ॥ पूरण याहि अन्देशा मोही, जानि बूझिके चहत विसारा ॥ २९ ॥

शब्द ३०-तुम विनु अरज करौं केहि आगे । स्वर्ग मृत्यु पाताल लोक लौं, अस को जो मोहि करत सुभागे ॥ टे० ॥ करुणामय कवीर कृपानिधि, साधु सन्त गावत सब जागे ॥ कि प्रभु अजर अमर अविनाशी, सुमिरत जाहि सकल दुख भागे ॥ यहि ते मोहि भरोसा आवत, औ प्रतीति भई बहु जागे ॥ अबकी बार कस विलम्ब कियो है, यह अचरज मनमें अति लागे ॥ तुम सब लायक हो सुख दायक, अचरज करत मोरे मन पागे ॥ चाहो तो अपने टेक निबाहो, नाहीं तो हम बने हैं नागे ॥ पूरण अचरज करत सुख साई, तुम कीरति मोको हित लागे ॥ इतनी विनय मानहु मोरी, जो मम सुरति निझाना दागे ॥ ३० ॥

शब्द ३१-कृपादृष्टि कब हेरो गुरुजी कृपादृष्टि कब हेरो ॥ टे० ॥ तुम अस समरथ शिर पर राजत, दुख पावत है चेरो ॥ सब लायक प्रभु हो सुख दायक मम अपराध घनेरो ॥ क्षमो अपराध दयाके सागर, आय परे शरणों अब तेरो ॥ पूरनकी यह अरज दयानिधि चरणन देहु बसेरो ॥ ३१ ॥

शब्द ३२-कभी तो भी दरस दिखाओ गुरुजी मोको कभी तोभी ॥ टे० ॥ चातकवत मैं पंथ निहारों स्वाती हूँके जुडावो ॥ जिमि चकोर चन्दा तन चितवत, और नहीं चित भावौ ॥ तुम्हरे दरस विनु अति विहाल जिय, मिलत न परख परभावौ ॥ पूरणके साहब सुख दाता, विनवत हौं गहि पावो ॥ ३२ ॥

शब्द ३३-लीला प्रभु तुम्हारी कही न जाय ॥ टे० ॥ राई सों पर्वत करि डारत, पर्वत राई तुल्य दिखाय ॥ सुर नर मुनि सब