कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शरणकी अभिलाषा रखते हैं इस कारण हे प्रभु ! आपही सत्यनाथ हो, आपको छोड़ कहाँ जाऊँ ।
हे ज्ञानमय चैतन्य पुरुष ! आपकेही अस्तित्वसे सर्व जड़ चैतन्य भासमान हो रहा है सबकी कुञ्जी आपहीके हाथमें है । कालभी आपके डरसे डरता है । सर्व ब्रह्मांड आपकीही आज्ञा पालन करते हैं । जब आप कालके प्रभु हो तब हमारा आपके अतिरिक्त दूसरा क्या सहारा है ।
हे निर्भय ! जब तक आपका सत्य पारख हृदयमें वास नहीं करता, तबतक हम कालके करतूतोंको जान नहीं सकते जब तक उसे जानकर हम उससे अलग नहीं होते, जबतक आपकी आज्ञाओंका विरोध करते हैं, तभीतक हमको सर्व प्रकारका भय प्राप्त होता है, परन्तु आप जब दया करोगे तभी सर्व भयसे छुड़ाकर निर्भय करदोगे ।
हे आनन्दसिन्धु ! जबतक हमारी ज्ञानशक्तिमें आपके पारखका प्रकाश नहीं होता, तबतक हम आपके सत्यस्वरूपको किस प्रकार जान सकें । जब आप दया करोगे, अपनी सारा सार विचारिणी ज्ञानशक्तिको प्रेरणा कर मुझे अपनी शरणमें लोगे, तभी आपकी आज्ञानुसार कालके जालको परखकर आपकी शरणसे निराश नहीं होंगे ।
हे सत्यसिन्धु ! ऐसी कृपा करो जिससे कि, सर्व असत्यसे छूटकर आपकोही प्राप्त हो जाऊँ ।
हे प्रेममयी ! अपने कृपाकटाक्ष द्वारा ऐसी दया करो कि, आपके सत्य प्रेममें मग्न हो जाऊँ ।
हे अमृतमयी ! ऐसी दया करो जिसमें आपकी अमृतरूपी आज्ञाओं पर चलनेकी हममें शक्ति हो ।