कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
हे अमर ! आप कालके जालसे छुड़ाकर अपने हंसोंको अमर करते हो स्वयम् कालभी आपसे भय करता है ।
हे अचिन्त ! आप शुद्ध आनन्द स्वरूप हो, चिन्ताका आपसे कोई सम्बन्ध नहीं, तथापि हम जैसे दीनोंकी सहायताकी चिन्ता आप सदा ही करते हो ।
हे पुरुष ! आप यद्यपि सर्वत्र एक समान स्थित हो तथापि सच्चे सन्त, सच्चे भक्त, सच्चे हंस और सच्चे पारखियोंके हृदयोंमें आपका विशेष प्रकाश प्रगट होता है ।
हे सुनीन्द्र ! सत्य सुकृत स्वरूपसे आप सदाचारका उपदेश देकर, सुनीन्द्र स्वरूपसे सत्यासत्य सारासारके मननका मार्ग बताते हो, अनेक प्रकारके मनन करने पर भी जब यह जीव कालके जालसे नहीं निकल सकता, तब आप करुणामय स्वरूपसे पारखका मार्ग बतलानेको टकसारकी प्रवृत्ति कराते हो । और जब टकसार द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब आप साक्षात् सत्य कवीरके स्वरूपसे प्रत्यक्ष पारख बतलाकर काल जालसे छुड़ा देते हो ।
हे बन्दीछोर ! आप बारम्बार कहते हो, पुकार २ कर जतलाते हो कि, तुम्हारी शरण विना हमारा ठिकाना कहीं भी नहीं है, जिस समय आपका शरण प्राप्त होता है उसी समय कालसे तिनका टूट जाता है । ऐसी सर्व सुखदाई शरणको भी पाकर हे अधम उधारण ! हम ऐसे अधम हैं कि, आपकी शरण नहीं पकड़ते। वरन केवल सुखसे बाते बनाकर दम्भसे अपनेको आपका दास कहते कहलाते हैं परन्तु, दासपनका नियम तक नहीं जानते॥
हे दीनानाथ ! आपही सबके सहायक हो हम दीन और अनाथ हैं, जिसको नाथ करके पकड़ते हैं वे सभी स्वयम् आपके