कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ताते वेगि सम्हारो॥ तुमरी शरण आयउँ मैं साहब, और न कोई सहारो ॥ साहब कवीर दया अब कीजे, पूरण आइ पुकारो॥४६॥
शब्द ४७-दीननके हो दयाल दया जनपै करो॥ शरण आयेकी लाज गई, प्रभु अस जनि करो॥ दशहुँ द्वार विकार धार नौका बहे, सुरति नाहि ठहराय, लगन कैसे लगे॥ पाँच तत्त्व गुण तीन साज सब सांजिया, याते रहे भुलाय, तो फन्दे फँसे॥ त्रिगुण मायाके फन्द फँदो जिव आइके, गहु साधनको संग गुरुते लौ लायके॥ मोक्ष मुक्ति जब होय दया दिल आवई ॥ परिपूरण करि देव महासुख पावई ॥ साहब कवीर बन्दीछोर अरज एक भाखिये । हमसे अधम उधार शरण प्रभु राखिये ॥ ४७ ॥
आराधना (गद्यमय)
(स्वामी श्रीयुगलानन्द बिहारी इत)
हे सत्यपुरुष ! आपहीकी सत्तासे सर्व जड चैतन्य स्थित है, सर्वके जीवन आपही हो ॥ आपके अतिरिक्त जो कुछ गुप्त परगट है, नाशमान, असत्य और अनित्य है, एक आपही सत्य और अविनाशी हो ।
हे सत्यसुकृत ! आपके अतिरिक्त जितनी कीर्ति है सब क्षणिक और मायिक है । सब कीर्ति आपके अतिरिक्त कालने रचे हैं और काल स्वयम् नाश होनेवाला है, इस कारण आपकीही कीर्ति सत्य और नित्य है ।
हे आदि अदली । आपकाही नियम सत्य और सुखदायक है, आपकाही नियम सर्वसे पूर्व प्रकाशित होता है, उसीके सहारे सत्य आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥
अजर ! आपको जरा नहीं है अर्थात् आप जन्म, मरण और उसके मध्यकी बाल, किशोर, युवा, प्रौढ और वृद्धावस्थासे परे सदा एक समानही रहनेवाले हैं ।