कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
मय, काहेको अन्त लेत प्रभु मेरे ॥ तुमही जानक तुमही प्रेरक, तुम कवीर हो सुखके डेरे ॥ ४२ ॥
शब्द ४३—सबके जनैयाको कहा जनैये, जानतही सकलो सुख पैये ॥ टे० ॥ तनकी मनकी सकल लोककी, जाननहारसो कहा छिपैये ॥ निर्मल संगति करहु संतकी, निर्मल होयके निर्मल समुझैये ॥ जो जानत तिहुँ लोक रैन दिन, ता साहबको कहा जनैये । जाग्रत सुषोत्ति तुरिया, तुरियातीत नहि जहँ पैये ॥ वाच्य लक्ष मनको चतुराई, जहाँ नहि तहँ कैसे कि जैये ॥ विनु पारख कछु जानि परे नहि, उनकी कृपा विनु परख न पैये ॥ हौ लाचार सकल विधि साहब, विनय करो तो को चित्त लैये ॥ सुख स्वरूप कवीर कृपानिधि, पूरनको मन ना भगैये ॥ ४३ ॥
शब्द ४४—वेगि खबरिया प्रभु लीजे दीन दयाला ॥ टे० ॥ आनि परचो परदेशमें देरुयो यमको जाला ॥ इहाँ न कोई आपनो, तुम विनु रच्छपाला ॥ मोहि तो आधार तेरे नामको, हौ दासन प्रतिपाला ॥ मोहि कछु बिलम्ब न कीजिये, जीव भये हैं बिहाला ॥ हौ गुणी औगुणी पर, तेरोई कहावत बाला ॥ जो तुम खबरि न लेहु, तौ मम कौन हवाला ॥ साहब कवीर सुखके राशी, हौ करुणाके आला ॥ सुनियो अरज निज दासकी, अब करिये निहाला ॥ ४४ ॥
शब्द ४५—अपने हम भोगे निज भोग ॥ टे० ॥ जानि बूझि कैसे अन्त लेहौ, यह नहि तुमको योग ॥ जगमें दास कहाये तुम्हारे, लागचो भवको रोग ॥ अस समरथके शरण आयके छूटचो नहीं मम सोग ॥ साहब कवीर विरदके पालक, हँसन लैगैगे लोग ॥ ४५ ॥
शब्द ४६—करुणामय नाम तिहारो ॥ टे० ॥ निठुर भये कछु काज न सरिहैं, आवत विरदको हारो ॥ जग हँसिहैं तब कहाँ बढाई,