कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कौन हमारो वाली, जो अब करत सनाथ ॥ तेरे नामको भरोसा मोको और न कोई संग सँघात ॥ लेहु खबरि कवीर कृपानिधि, पूर्ण नावत माथ ॥ ३८ ॥
शब्द ३९-तुम विन कौन हमारो देश, कठिन कालको वेष ॥ टे० ॥ जोरे मिला सो अपनी गरजको, राजा रंक नरेझ ॥ हमरे तो गुरु तुमहिं अधारा, दीन दयाल वरेश ॥ वेग खबरि लेहु प्रभु आई, दुचित भयो जिय रेश ॥ निज दासन प्रतिपालन करत प्रभु, साहब कवीर दुवैश ॥ ३९ ॥
शब्द ४०-गुरु तेरे दर्शनकी बलिहारी ॥ गुरु० ॥ टे० ॥ तुम्हरे दरसते कष्ट हरत है, करम मिटत है भारी ॥ सन्त स्वरूपी आप कृपानिधि, खोलत भरम किवारी ॥ जिन्हें दरस सुख दियो दयानिधि, आवा गमन तिवारी ॥ सुख स्वरूप कवीर कृपानिधि, पूर्ण परख विहारी ॥ ४० ॥
शब्द ४१-तुम विनु कौन खबरिया मोरि लेवे ॥ टे० ॥ देश विरान कोइ नहिं आपन, कौन सेवकको सेवे ॥ मेरे तो सतगुरु एक अधारा, जो चाहौ सो देवे ॥ यह जग सबही द्रन्द पसारा, कैसे नवरिया खेवे ॥ परख विलास कवीर कृपानिधि, पूर्ण जानत भेवे ॥ ४१
राग विलास ।
शब्द ४२-तुमहौ सतगुरु दाता मेरे, मैं अधीन चरनके चरे ॥ टे० ॥ तुमको माँगे तुमको जाचे, निशिदिन रहत चरनके नेरे ॥ चरन छांडि अनते नहिं जाबे, जैसा भँवर कमलको घेरे ॥ तुमरा ज्ञान ध्यान जप तुमरो, तुम तजि और तन नहिं हरे ॥ जिमि पतिव्रता पतिव्रत ठाने, आज्ञा जुगवे सांझ सबेरे ॥ हरि हर ब्रह्मा आदि जे देवा, रिद्धि सिद्धि दातार घनेरे ॥ हमको नहीं इन सबते काजा, एक तुम्हारी दयाके प्रेरे ॥ वेगि खबर लेहु करुणा-