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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(२०८)

कवीरपंथी—

हे अमर ! आप कालके जालसे छुड़ाकर अपने हंसोंको अमर करते हो स्वयम् कालभी आपसे भय करता है ।

हे अचिन्त ! आप शुद्ध आनन्द स्वरूप हो, चिन्ताका आपसे कोई सम्बन्ध नहीं, तथापि हम जैसे दीनोंकी सहायताकी चिन्ता आप सदा ही करते हो ।

हे पुरुष ! आप यद्यपि सर्वत्र एक समान स्थित हो तथापि सच्चे सन्त, सच्चे भक्त, सच्चे हंस और सच्चे पारखियोंके हृदयोंमें आपका विशेष प्रकाश प्रगट होता है ।

हे सुनीन्द्र ! सत्य सुकृत स्वरूपसे आप सदाचारका उपदेश देकर, सुनीन्द्र स्वरूपसे सत्यासत्य सारासारके मननका मार्ग बताते हो, अनेक प्रकारके मनन करने पर भी जब यह जीव कालके जालसे नहीं निकल सकता, तब आप करुणामय स्वरूपसे पारखका मार्ग बतलानेको टकसारकी प्रवृत्ति कराते हो । और जब टकसार द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब आप साक्षात् सत्य कवीरके स्वरूपसे प्रत्यक्ष पारख बतलाकर काल जालसे छुड़ा देते हो ।

हे बन्दीछोर ! आप बारम्बार कहते हो, पुकार २ कर जतलाते हो कि, तुम्हारी शरण विना हमारा ठिकाना कहीं भी नहीं है, जिस समय आपका शरण प्राप्त होता है उसी समय कालसे तिनका टूट जाता है । ऐसी सर्व सुखदाई शरणको भी पाकर हे अधम उधारण ! हम ऐसे अधम हैं कि, आपकी शरण नहीं पकड़ते। वरन केवल सुखसे बाते बनाकर दम्भसे अपनेको आपका दास कहते कहलाते हैं परन्तु, दासपनका नियम तक नहीं जानते॥

हे दीनानाथ ! आपही सबके सहायक हो हम दीन और अनाथ हैं, जिसको नाथ करके पकड़ते हैं वे सभी स्वयम् आपके

शब्दावली

(२०९)

शरणकी अभिलाषा रखते हैं इस कारण हे प्रभु ! आपही सत्यनाथ हो, आपको छोड़ कहाँ जाऊँ ।

हे ज्ञानमय चैतन्य पुरुष ! आपकेही अस्तित्वसे सर्व जड़ चैतन्य भासमान हो रहा है सबकी कुञ्जी आपहीके हाथमें है । कालभी आपके डरसे डरता है । सर्व ब्रह्मांड आपकीही आज्ञा पालन करते हैं । जब आप कालके प्रभु हो तब हमारा आपके अतिरिक्त दूसरा क्या सहारा है ।

हे निर्भय ! जब तक आपका सत्य पारख हृदयमें वास नहीं करता, तबतक हम कालके करतूतोंको जान नहीं सकते जब तक उसे जानकर हम उससे अलग नहीं होते, जबतक आपकी आज्ञाओंका विरोध करते हैं, तभीतक हमको सर्व प्रकारका भय प्राप्त होता है, परन्तु आप जब दया करोगे तभी सर्व भयसे छुड़ाकर निर्भय करदोगे ।

हे आनन्दसिन्धु ! जबतक हमारी ज्ञानशक्तिमें आपके पारखका प्रकाश नहीं होता, तबतक हम आपके सत्यस्वरूपको किस प्रकार जान सकें । जब आप दया करोगे, अपनी सारा सार विचारिणी ज्ञानशक्तिको प्रेरणा कर मुझे अपनी शरणमें लोगे, तभी आपकी आज्ञानुसार कालके जालको परखकर आपकी शरणसे निराश नहीं होंगे ।

हे सत्यसिन्धु ! ऐसी कृपा करो जिससे कि, सर्व असत्यसे छूटकर आपकोही प्राप्त हो जाऊँ ।

हे प्रेममयी ! अपने कृपाकटाक्ष द्वारा ऐसी दया करो कि, आपके सत्य प्रेममें मग्न हो जाऊँ ।

हे अमृतमयी ! ऐसी दया करो जिसमें आपकी अमृतरूपी आज्ञाओं पर चलनेकी हममें शक्ति हो ।

(२१०)

कवीरपंथी—

हे शांतिनिकेतन ! आपकी कृपाके अतिरिक्त हम उस सौभाग्यताको कैसे प्राप्त हो सकेंगे, जो आपके सच्चे दासको प्राप्त होता है। हम कैसे भी हैं परन्तु अबतो आपके कहलाते हैं, यदि हमको सत्य शान्ति प्रदान न करोगे तो आपकीही विरद लज्जायमान होगी।

हे पुण्यमयी ! हे सच्चे भ्राता ! हमको ऐसी सुमति दो जिससे परस्परके विद्वेषको त्यागकर आपकी सेवामें लगजावें।

हे हंसननायक ! अपने ऐसे हंसोंकी संगति मुझे प्रदान करो, जिससे आपके अतिरिक्त दूसरेकी वासना हृदयसे उठजावे।

हे सत्य ! असत्यसे बचाकर सर्वदा सत्यकी ओर लेजाओ।

अविश्वासके जालसे निकालकर, विश्वास और श्रद्धाको प्राप्त करादो। अप्रेमसे बचाकर प्रेममयी देशमें पहुँचादो, अपवित्रतासे निकालकर पवित्रताको दिखादो। स्वेच्छाचारीपणासे निकालकर, अत्याचारसे छुडाकर तुम्हारी इच्छा और आज्ञाके अधीन करके स्वतंत्र और सदाचारी बनादो।

हे कल्याणमयी ! अकल्याणके मार्गसे हटाकर कल्याणकी राह दिखादो।

हे सत्यगुरु ! अन्धकारमय देशसे उठाकर प्रकाशमय देशमें डाल दो।

हे सत्याचार्य ! आपके सत्य धर्म, सत्य पंथ और आपके सच्चे संतोंमें ऐसी श्रद्धा दो जिससे अवनतिके भवनसे निकलकर सत्योन्नतिकी सड़कपर चढ़ जाऊँ।

हम लोगोंको ऐसा उत्साह और ऐसी उत्कंठा दो, जिससे आपकी आज्ञाओंको पूर्ण करने, आपके स्थापित सत्यधर्मको

शब्दावली

(२११)

फैलाने, आपके सत्यराजकी महिमा प्रगट कर, अपनी तथा और दुखियोंकी आत्माको कालजालसे बचानेमें समर्थ होंवें। ऊँ शांतिः ! शांतिः !! शांतिः !!! ॥

सत्य कवीरोजयति ॥

निवेदन ।

यह गुरु सहस्रनाम लेखक महाशयोंकी कृपासे अबतक इस अवस्था को पहुँच गया है, जैसा आपके सम्मुख उपस्थित है । कितने कारणोंसे इसके शुद्ध करानेका अवसर नहीं मिला है । यदि कोई विद्वान महात्मागण इसको शुद्ध करके मेरे पास भेज देंगे, तो धन्यवाद पूर्वक इसकी दूसरी आवृत्ति फिरसे छपायी जायेगी ।

इसके अतिरिक्त कितने लोगोंने मुझसे कहा है कि , यदि गुरुसहस्रनामकी हिन्दी हो जावे और वह भी होवे कवितामें, तो संस्कृत न जाननेवाले जिज्ञासुओंका विशेष उपकार हो । इसलिये श्रीयुत शास्त्री विचारदासजी साहब, पण्डित ब्रह्मलीन दासजी, शास्त्री हंसदासजी तथा महंत लक्ष्मणदासजी गुरु श्रीमान् महंत तुरंतदासजी साहेब सुंगाना आदि विद्वानोंसे मेरा विनय है कि, आपलोगोंमेंसे जो महानुभाव इस गुरुसहस्रनामको शुद्धकरके, टीका और इसका हिन्दी कविता-बद्ध अनुवाद भेजनेकी कृपा करेंगे तो बड़ा उपकार करेंगे और मैं बड़े आनन्दके साथ उसे छपाकर प्रकाशित करदूंगा ।

भवदीय—

श्रीयुगलानन्द विहारी

कबीराश्रम खरसिया (विलासपुर सी०)

(२१२)

कवीरपंथी—

श्रीगुरुचे नमः । अथ श्रीगुरु सहस्रनाम प्रारम्भः । न्यास प्रारम्भः ।

ॐ यस्य सद्गुरुदिव्यनामस्तोत्रमन्त्रस्य ॥ शिष्य ऋषिः ॥ मन्त्रछंदः ॥ गुरुदेवता ॥ सोहं बीजं ॥ अहं शक्तिः ॥ गुं अंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ रुं तर्जनीभ्यां नमः ॥ वं मध्यमाभ्यां नमः ॥ नं अनामिकाभ्यां नमः ॥ मं केंनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ सं करंतल- करपुष्पाभ्यां नमः ॥ गुं हृदयाय नमः ॥ रुं शिरसे स्वाहा ॥ वैं शिखायैवषद् ॥ नैं कवचांयहुं ॥ मैं नेत्रत्रैयाय वौषद् ॥ सैं अंखाय फद् । गुरुं प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।

श्लोक-ध्यान × ।

ध्यायेत सद्गुरुश्चेतरूपममलं श्वेतांबरं शोभितम् । कर्णैः कुण्डलश्चेतशुभ्रमुकुटम् हीरामणिमंडितम् ॥ नानामालमुक्तादि शोभितगलं, पद्मासने संस्थितम् । दयाविधधीरं सुप्रसन्न वदनम्

१ यह मंत्र पढ़कर दोनों हाथकी तर्जनी अंगुलीसे, दोनों हाथके अंगूठीको स्पर्श करते हैं । अंगूठे पास जो अंगुली है उसीक। नाम तर्जनी है ।

२ यह मंत्र पढ़कर दोनों अंगूठीसे तर्जनी अंगुलियोंका स्पर्श करते हैं ।

३ इस मंत्रको पढ़ता हुआ दोनों मध्यमा अंगुलियोंका स्पर्श करे ।

४ इसको पढ़कर दोनों अंगूठीसे अनामिकाको स्पर्श करे ।

५ इसको बोलता हुआ दोनों अंगूठीसे दो कनिष्ठिकाको स्पर्श करे ।

६ यह मन्त्र पढ़कर प्रथम दाहिने हाथके नीचे बाया हाथ रखे फिर बायें हाथके नीचे दाहिना हाथ रखे ।

७ यह मन्त्र पढ़कर पांचों अंगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करते हैं ।

८ यह मन्त्र पढ़कर पांचों अंगुलियोंसे शिरका स्पर्श करते हैं ।

९ इस मन्त्रको बोलकर पांचों अंगुलियोंसे शिखाका स्पर्श करते हैं ।

१० यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथसे बायें खवे (कन्धे) का और बायें हाथसे दाहिने (खवे) कन्धे स्पर्श करते हैं ।

११ इसके द्वारा दाहिने हाथसे दोनों नेत्रोंको छूते हैं ।

१२ यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथकी तर्जनी और मध्यमासे बायें हाथकी हवेलीपर मारते हैं ।

१३ यह पढ़कर ऐसा संकल्प करे कि सद्गुरुके प्रसन्न होनेके निमित्त मैं यह पाठ करता हूँ ।

× इसके पश्चात् प्रथम और द्वितीय श्लोकमें लिखे अनुसार सद्गुरुके स्वरूपका मानसिक ध्यान करे और सहस्रनामों द्वारा सद्गुरुकी विभूतिका चिन्तन करता हुआ पाठ करे ।

उपरोक्त करण्यास अंगन्यास तथा ध्यानकी विधि गुप्तसे सीखना चाहिये ।

शब्दावली

(२१३)

सदगुरुं तन्त्रमामि ॥ १ ॥ द्वे पदम् द्वे भुजम्, प्रसन्नवदनम् द्वे नेत्रम् दयालम्। सेलीकण्ठमाल उर्ध्वतिलकम् श्वेताम्बरीमेखला ॥ चक्रांकस्य विचित्र टोपलसितं तेजो मयी विग्रहं । वंदेसदगुरु योगदण्ड सहितं कञ्जीर करुणामयम् ॥२॥ एतानि चतुर्मुखानि, विरूपातानि महास्याः । अज्ञायस्य स्तुतानि साधुभिः शजतुं ( किंवा ) साधुभिः परिगीतानि वक्ष्यामि जीविते यः ॥ ३ ॥ न अंग अंगन्यासं नकरं करन्यासता । स्वयमश्च गुरुमंत्र स्वयं भूत्वा स्वयंजपः ॥४॥ सोमाप सोहं रूपाय सत्यनामाय साक्षिणे । करुणामयकवीराय त्रिपदातीताय नमः ॥ ५ ॥ अमी अमृत नामाय, अजराचिन्तरूपिणे ॥ अमरः सत सुकृताय, दयाब्धि गुरुवे नमः ॥६॥ कृपाल कृपायः सिधुश्च, कृपायोट कृपाधनं ॥ कृपार्णव कृपा वृष्टिः कृपा कर्ता नमोनमः ॥७॥ दयाल धीर्यवंतश्च, दयासिधु दयार्णव ॥ दयाकर्ता दयावन्ता, ज्ञानदाता नमो नमः ॥ ८ ॥ अभयन्निरभयश्चैव, निर्भयपददायकम् । अमहारकनामाय भातारक नमोनमः ॥ ९ ॥ अचल रूपं अचलं चिन्तातीत प्रकाशकम् । दीनानार्थं दीनोद्धारं, दीनवत्सल सुन्दरम् ॥१०॥ अमृत मृत्यु नाशाय, महा अमनिवारणम् । योगजीत अजीताय, ज्ञान वेत्ताय किञ्चन ॥ ११ ॥ निर्मोही मोह नाशाय जगत्याशा विनाशकम् ॥ निर्वैरअमहीनाय, निर्भ्रमाय नमो नमः ॥ १२ ॥ उपदेश कर्ता स्वदेश दाता, उपाधिहीनश्च भय शोक हर्ता ॥ संकष्ट नाशाय सिद्धान्त मूला, स्वयं गुरु सिद्ध अहं नमामि ॥ १३ ॥ हंसाय हंसरूपाय हंस पाल हंस पति ॥ हंसनायक श्वेताय, हंसोद्धारक तारकम् ॥ १४ ॥ जीवोद्धारक शान्ताय, शान्ति रूप अज्ञाश्रिता । शांति कर्ता शांति धर्ता, सर्वे शांति नमो नमः ॥१५॥ हंता नाश दयापाल संशयजाल विखण्डनम् ॥ वपुनाशा

(२१४)

कबीरपंथी—

प्रकाशश्च, वपुर्हर्ता वपुर्हनम् ॥ १६ ॥ परिक्षः परिक्षाश्चैव परिक्षं परीक्षावतम् ॥ परायत्वं अपारायः, सर्वातीत नमो नमः ॥ १७ ॥ पाखण्ड खण्डनम्, अजरूप अजामरः ॥ अन्ननाम जरातीतं, स्वतः सिद्धस्व साक्षिणः ॥ १८ ॥ आदादली आदि रूपं, आदि मूर्ते अनाद्यये ॥ अनादि सिद्ध नामाय, अर्काक्ष अचले प्रिये ॥ १९ ॥ निर्णय निर्णयः कर्ता, नास्ति सिद्धान्त नाशकः ॥ निराधार निराभासः, निर्विग्रश्च निरामयः ॥ २० ॥ सुखाय सुख दाताय, सुखार्णव सुखात्ययम् ॥ नासि सुखमतीताय आस्ति सुख नमो- स्तुते ॥ २१ ॥ अनादि नामश्च अनादि रूपं; आनंद ततिश्व अकंप रूपं ॥ परब्रह्मतीताम् प्रकाशतीतमधिष्ठानतीतं हि नमोनमस्ते ॥ २२ ॥ गुणी पंचगुणातीतं, सर्वातीतं सर्वोत्तमम् । भासप्रपंचा- तीताय; भासकातीतये नमः ॥ २३ ॥ अखिलज्ञम् ज्ञानतीतं, अंधकारनिवारणम् । साक्षातीतं बोधातीतं बोधकर्ता नमो नमः ॥ २४ ॥ विघ्न विघ्वंसनन्नाम सर्वं मंगलदायकम् ॥ वृक्ष राक्षक नामश्च; वृद्धारीवृद्धः प्रिये ॥ २५ ॥ शिष्यपालं, भक्तपालं, दीनपालं दिनप्रिये ॥ दीनोद्धारकसाधाय वंदिमोचनये नमः ॥ २६ ॥ कालसंधि निवार्न च, महासंधि विघ्वंसनम् ॥ भक्तोद्धार जगदोद्धारं असंधी- साधकः प्रिये ॥ २७ ॥ साधुसन्त साधुरूप संतस्थ संतधारना ॥ अविनाशी निर्विनाशं, प्रपंचं हीनम् पुरुषम् ॥ २८ ॥ पुर्षातीतं सुनीन्द्रश्च सारशब्दस्वरूपवाम् ॥ त्रिशब्दातीतस्थिराः स्थिरकर्ता- स्थिरालयन् ॥ २९ ॥ परिणामं वस्थातीतं, भौभे दुःखनिवारणम् ॥ योगसन्तयन्ताय, तरन्तारं नमोस्तुते ॥ ३० ॥ भवान्धि पोतं भवरोगवैद्यं भवार्णवं घोरविनाशनन्दुखः ॥ अशर्णशर्णीय उद्दा- रबुद्धिः, समासमं जीव समेक दृष्टिः ॥ ३१ ॥ मंगलं मंगलः कर्ता, बेर दाता प्रतापवान् ॥ निष्कियः निर्विकारश्च, निर्द्वैद्याय शिष्यः

शब्दावली

(२१५)

प्रिये ॥ ३२ ॥ जीवनं सर्वजीवानां भूषणं ज्ञान चक्षुषा ॥ मुक्ति दाता भक्ति दाता ज्ञान दाता नमो नमः ॥ ३३ ॥ मुक्त पदं मुक्त नामं, सर्वं वंधन मोचनम् ॥ विद्यादाता बुद्धिदाता सर्वज्ञाय नमो नमः ॥ ३४ ॥ परीक्षा प्रेरकन्नाम, समाधाय प्रदानकम् ॥ प्राप्ति कर्ता प्राप्ति रूपं, भक्ति नाथ नमो नमः ॥ ३५ ॥ सगुणं सगुणश्चैव, प्रसन्नं करुणाकरम् ॥ विचारं च प्रमोदारं, सर्वोत्कृष्ट नमो नमः ॥ ३६ ॥ भ्रमसंहारनन्नाम काम संहारनं मसि ॥ क्रोध दमनमक्रोधं, मोह निर्मोह नाशकम् ॥ ३७ ॥ निलौभं सर्वजीताय अजीताय जितेन्द्रियः ॥ सर्वं वस्य अवस्यं च सर्वमान्य अमान्ययोः ॥ ३८ ॥ सर्वं पूज्यं मंत्र मूलं, ध्यान मूलं स्वरूपकम् ॥ ज्ञान विज्ञान मूलाय, हंस मूलं हंसं प्रिये ॥ ३९ ॥ अयोनि संभवकृपा कटाक्षं, अवीर्ये अरेत अकाम रूपम् ॥ अपाप अतात अजा अतीत, अविगत्य रूपं अहं नमामि ॥ ४० ॥ अखिलादिखिलं ज्ञाता, अखिलानंदती- तयोः ॥ सन्त सन्तप्रियो नामं परं स्नेही परावृत्तिः ॥ ४१ ॥ उद्धारं भौहारकं च, निरंजनातीतप्रभु ॥ कर्ममोचनं नामाये निर्भरः शीतलाश्रयः ॥ ४२ ॥ भुंगीनाम अभैनामं, शीलनाम सुखाण्वम् ॥ परमनामाय सुतिंश्च, विजपाय जपातियो ॥ ४३ ॥ अमलत्रिमलश्चैव; हंसज्ञ हंस नायकम् ॥ भक्त सहाय कर्ता च सुखदाता सुखः प्रभु ॥ ४४ ॥ सत्यवक्ता प्रकाशं च, परमं पारखलीलया । अमोल मंगलन्नाम अविचलं, गुरुवे नमः ॥ ४५ ॥ संतोष शक्त बीरं च, साधू कबीर नामयम् । हंस कबीर नामाय, गुरु कबीर नमो नमः ॥ ४६ ॥ परमं गुरु परमं वैद्यं, परमलक्ष पदानये ॥ सिद्ध कबीर नामाय, निरालम्ब कल्पनुमः ॥ ४७ ॥ निर्विघ्न करुणा रूपं, दिव्यनाम अनामयम् ॥ छायातीतं, मायातीतं कायातीतं नमोनमः ॥ ४८ ॥ कालमर्दन कीर्तिं वर्द्धनं, वृक्ष रक्षकं ज्ञान अक्षकम् । सुखः सागरं

( २१६ )

कवीरपंथी—

ज्ञान आगरं, पर्व दायकं सर्वं लायकम् ॥ ४९ ॥ वाच्यं वाच- कातीताय, अनिर्वाच अतीतये ॥ छन्दातीतं वेदातीतं शास्त्रातीतं नमोनमः ॥ ५० ॥ नररूपं नरातीतं नरज्ञ नर नामयोः । यक्षराक्षस तीताय गंधर्वातीतये नमः ॥ ५१ ॥ दैत्यातीतं देवातीतं, त्रिका- लभासकं प्रभु ॥ त्रिदेवातीतायन्नामः त्रिकालज्ञ नमोनमः ॥ ५२ ॥ पंच ब्रह्म अतीताय, पंच मात्रा विवर्जितः ॥ शद्मात्रा विनिर्मुक्तं, पंचस्थान अमानयो ॥ ५३ ॥ पंचअहंकारातीतं पंच देह अतीतयो ॥ पंचतत्त्वं अतीताय पंच विषय नाशकम् ॥ ५४ ॥ चतुर्दश करणैरतीतं, षट्भावविनिर्गतम् । षट् विचार रहीताय, योगातीतं महद्गुरुम् ॥ ५५ ॥ विराग वैराग्यातीतं योगं वियोग वर्जितम् । भोग्य भोगातीश्वैव संयोगातीतायनः ॥ ५६ ॥ विवेक विवेकातीतं, विवेकत्व विवेकिनः ॥ अविवेक नाशनश्वैव, विवेकः स्वरूपं प्रभु ॥ ५७ ॥ वैराग्यजाता गुरु भक्ति ताता, सत्यं दया धीर्यं शीलस्य कर्ता ॥ विचार मूलं ज्ञानस्य जनकं निर्णयस्वरूपं अहं भजामि ॥ ५८ ॥ निर्विन्दं प्रकाशैव स्थिर स्वस्थिति दायकम् ॥ क्षमा मिथ्या त्यागनश्च, निःसन्देह नमोनमः ॥ ५९ ॥ गर्वप्रहारी अद्रोहं, अहंता नाशनं प्रभुः ॥ समदृष्टि सर्वमित्रं भयहरन अभयीवरम् ॥ ६० ॥ अभैराज अभयदाता, सत्यसंग निवासिनम् ॥ अनि- त्यखंडनन्नाम, सदा नित्यं स्वरूपवान् ॥ ६१ ॥ ससर्विदं विभावाय, सर्वानुग्रहकारणम् । बंधनं नाशनं खण्डं, समौपास विनाशकम् ॥ ६२ ॥ दास रक्षा दासपालं सर्वव्याधि प्रशाम्यतम् ॥ परदुःखभंजनन्नाम, भक्तानामनिरंजनम् ॥ ६३ ॥ दुष्टगंजनं नामाय, ज्ञानभंजनं तथैव च ॥ भर्मपातं पवित्रं च, सर्वधात निवारणम् ॥ ६४ ॥ पावनः पावनः कर्ता, भवाधि नौका एव च ॥ कृतातं भयहरं चैव मृत्युभयवि- नाशकम् ॥ ६५ ॥ भूतभय नाशनं चैव, राजभय नाशनं तथा ॥

शब्दावली

( २१७ )

चौरभय नाशनाम, व्याघ्रादिभय विनाशनम् ॥ ६६ ॥ अलक्ष- लक्षायमक्षैस्वरूपं, सिद्धांत दाता ऐश्वर्यऽमूलम् ॥ अनादिदीक्षा निरपक्षरूपं, सजीवनेजीवन सर्वजीवः ॥ ६७ ॥ महासजातीभानं च, गुरुं दाता तथैव च ॥ सर्वसामर्थ्यवानाय, गुरु वर्य नमो नमः ॥ ६८ ॥ साधुगुरुं सत गुरु अग्र नाम तथैव च ॥ अमल अक्षे नामाय, अज्जावन अनामय ॥ ६९ ॥ पतितः पवननाम, दीनोद्धार दिनप्रिये ॥ शरणागत रक्षकाये जह्नोद्धार नमाभ्यहम् ॥ ७० ॥ भूभय निवारणनाम, भूसिन्धु तारकं तथा ॥ दैत्य विध्वंसननाम, कल्पना खण्डनं प्रभू ॥ ७१ ॥ दया धीरं भय हारं ज्ञान विज्ञान कारकम् ॥ सारं च सर्वसारं च स्वप्रकाश सञ्जन प्रिये ॥ ७२ ॥ परक्षवान संयुक्तं सन्ताधारं निराविशम् ॥ अह्निद्र अगाध नामअपार अपरः प्रिये ॥ ७३ ॥ शुकाधि स्वरूपाधिश्च मुक्त नाम मुक्ता दया ॥ नितरूप सुतिनाम, अपार औगाह तीतयोः ॥ ७४ ॥ अमाया अकायाश्चैव, छः संधि विवर्जितः । अप्राह्वं ग्राह्यातीतश्च, अविकार प्रबोधिता ॥ ७५ ॥ प्रबोधकर्ता त्रय ताप हर्ता, हबोदस्या दाता सत्सिद्धि चारी ॥ धैर्यधरं परमोद्धार रूपं, आनंद भेदं अहन्त्रमामि ॥ ७६ ॥ अचलं विगतनाम, अभेदागमलक्षणः ॥ अविनाशा परोक्षं च पुराण पुरुषोत्तमम् ॥ ७७ ॥ आद्यं कुरुते कृतस्य परमसार तथैव च ॥ साधूपति साधुधीशं, सत्य सन्तोषनामयोः ॥ ७८ ॥ साधु स्नेही, संतस्नेही, भक्तस्नेही भक्तप्रिये ॥ परमस्नेही सुतिस्नेही प्रेमस्नेही च स्वस्थिरम् ॥ ७९ ॥ हिरंपरं हिरंबरा, पुष्प दीप विहारि च ॥ सत्यलोक पतिनामं इति अक्षयवृक्ष नमो नमः ॥ इति ॥

इति गुरु सहस्रनाम समाप्तमिदं ॥

(२१८)

कवीरपंथी—

अथ नामलीला ॥

साहेब अबिचल नाम, दया करि पाइये ॥८०॥ प्रथम बन्दों गुरु चरण, सीस संतनको नाऊँ । सतगुरु होयँ दयाल, तो नाम चरित्र सुनाऊँ ॥ सत सुकृत हिरदे बसै, कबहुँ ना आवै हारि । अविगतितसे परिचै भई, तो आवागवन निवारि ॥ १ ॥

कहा आनकी सेव, जीवको भर्म न भाजै । अलख सहूपी आप, तहाँ अनहद धुनि गाजै ॥ यह धुनि सुनि अबिचल रहो, इत उत मन नहिं जाय । अमृत केरी बुन्द है, सो अमृत माहिं समय ॥२॥

प्रथम पुरुष पग धरच्यो सत, सतजुगमें आये । परमारथके काज, जीवकी बन्दि छोड़ाये ॥ कागा तें हंसा किया; जाति बरन कुल खोय । जमसे तिलुका तोरिके, गंज न सकै कोय ॥ ३ ॥

सतजुग गयो व्यतीत, सुनो त्रेताकी बानी । धरच्यो सुनिन्द्रको रूप, आप सतसुकृत ज्ञानी ॥ हंसनको परमोधिके, आप रहो नीनार । नाम प्रतीत बसे जो जिवको, सो जन उतरे पार ॥४॥

त्रेता गयो व्यतीत, सुनो द्वापरकी बानी । करुणामय को रूप धरच्यो, सतसुकृत ज्ञानी ॥ चेतनहारा चेतियो, बहुरि न चेता जाय । सतसुकृत चीन्है बिना, काल सबनको खाय ॥ ५ ॥

कलिजुग प्रगट कबीर, कालको देखा जोरा । किये कासी अस्थान, आप भै बन्दीछोरा ॥ सुनि पंडित सब बादहीं, कोई न पहुँचे ज्ञान । निर्गुन लीला धारिके, आप पुरुष निर्बान ॥६॥

कलिजुग कर्म अपार, जीव कोई कहा न माने । सीखे साखी शब्द, उलटिके बाद बखाने ॥ बाद किये पहुँचे नहीं, मन ममताके जोर । लख चौरासी जिया जोनिमें, भर्म नरक अघोर ॥७॥

कठिन कालको रूप, अंत कोई जान न भाई । जब आवै मृतु अंध, जीव कहँ जाय पराई ॥ नाम बिना बाँचै नहीं, केतो करै उपाय । तीरथ जाय सकल भ्रमि आवै, जमको त्रास न जाय ॥८॥

शब्दावली

(२१९)

बहुत ज्ञान बहु गम्य, बहुत मूरतको पूजे। दीपक बेर अनेक, अंधको आंखि न सूझे। बहुतक जुग भरमत फिरै, कितहुँ न पावे दाद। सात द्वीप नौ खंडमें, सत्य नाम विनु बाद ॥ ९ ॥

सतगुरुका उपदेस, संत कोउ बिरला जानै। करे तत्त्वका खोज, बहुरि संकट नहि आनै॥ ऐसे सुरति लगाइये, जैसे चन्द्र चकोर। कठिन पड़े सुख दुख सहे, प्रीत निभावै और ॥ १० ॥

अविगति अगम अपार, और सब दोसै बाजी। पढ़ि पढ़ि बेद कितेब, भुले पंडिते औ काजी। अगम गम्य जानै नहीं, वीचहिं परे भुलाय। जैसे ज्वारी जुवा खेलिके, सबरसचले गँवाय॥ ११ ॥

नहिं सागर नहिं सिखर, नहीं तहँ पवन न पानी। नहिं धरती आकास, नहीं कछु और निसानी॥ चन्द्र सूर वा घर नहीं, नहीं दिवस नहिं राति। जहाँ पुरुष आपै बसै, तहँ कुल कर्म न पाँति ॥ १२ ॥

वहाँ नहीं तीरथ ब्रत, नहिं तहँ वेद बिचारा। नहिं देवी नहिं देव, नहीं कछु नेम अचारा॥ जरा मरन वा घर नहीं, नहीं लाभ नहिं हान। प्रेम मगन हंसा रहै, सो धरै पुरुषको ध्यान॥ १३ ॥

जहाँ पुरुष रहै आप, तहाँ हंसनको बासा। तहँ नहिं माया मोह, नहीं तहँ तृष्णा आसा। हर्ष शोक वा घर नहीं, नहीं कर्म व्यवहार। हंसा परम अनंद मय, छूटे भ्रम जंजार ॥ १४ ॥

चारों जुगके हंस, सत्य सतलोक सिधाये। भ्रमत फिरै सब काग, दूत बैठे रखवाये॥ सुनि पंडित जोगी जती, धरे कालको ध्यान। तीन लोकके बाहरे, कोई न पाये जान। ॥ १५ ॥

भ्रमत फिरै जुग चारि, रूप कीन्हा विस्तारा। अजहुँ न समुझे अंध, परे जम कालकी धारा॥ बहुत भाँति परमोधिा, कोइ कोइ लीन्हा मान। आदि अंतके हंस हैं, सो प्रगट भये हैं आन ॥ १६ ॥

(२२०)

कबीरपंथी-

अनजानेको दूरि, जानेको निकट बिराजै । शब्द सनेही संत, सोई सब ऊपर छाजै । मगन होय मनको गहै, हंस रूप आनन्द । सुमिरन दीनदयालको, ज्यों उड़गन में चन्द ॥ १७ ॥

बहुत गुरु संसार रहित, घर कोइ न बतावै । आपन स्वारथ लागि, सीस पर भार चढावै ॥ सार शब्द चीन्हे नहीं, बीचहिं परे भुलाय । सत्त सुकृत चीन्हे बिना, सब जग काल चबाय ॥ १८ ॥

यह लीला निर्वान, भेद कोइ बिरला जानै । सब जग भरमे डार, मूल कोइ बिरला माने ॥ मूल नाम एक पुरुष है, पुहुष द्वीपमें बास । सतगुरु मिलै तो पाइये, पूरन प्रेम बिलास ॥ १९ ॥

नाम सनेही होय, दूत जम निकट न आवै । परमतत्त्व पहिचानि, सत्त साहेब गुन गावै ॥ अजर अमर विनसे नहीं, सुखसागरमें बास । केवल नाम कवीर है, गावे धनिधर्मदास ॥ २० ॥

॥ धर्मदासजी रचित ॥

विनती प्रारम्भः ।

॥ शब्द १ ॥

भक्ति दान गुरु दीजिये, देवनके देवा हो । चरन कैवल विसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा हो ॥ १ ॥ तीरथ बरत मैं ना करौं, ना देवल पूजा हो । तुमहिं ओर निरखत गहौं, मेरे और न दूजा हो ॥ २ ॥ आठ सिद्धि नौ निद्धि, हैं वैकुण्ठ निवासा हो । सो मैं ना कछु माँगहुँ, मेरे समरथ दाता हो ॥ ३ ॥ सुख सम्पति परिवार धन, सुन्दर बर नारी हो । सुपनेहु इच्छा ना उठै, गुरु आन तुम्हारी हो ॥ ४ ॥ धरमदासकी बीनती, साहेब सुनि लीजै हो । दरसन देहु पट खोलिकै, आपन करि लीजै हो ॥ ५ ॥

शब्दावली

(२२१)

॥ शब्द २ ॥

साहेब साहेबी तन हेरो ॥ टेक ॥

चञ्च पंख बिन जटा पखेहू, मम गति समझ सवेरो । अब जनितजो मोहिं यह खण्डा, तुम सतलोक बसेरो ॥ १ ॥ निस बासर मोहिं संशय व्यापै, काम क्रोध मद घेरो । यासे नाम लेन नहिं पाऊँ, धिग जीवन जग मेरो ॥ २ ॥ प्रभु पद भिन्न भयो मैं जबसे, देह धरे बहुतेरो । त्रिविधि ताप दुख सहे निरंतर, कबहुँ न भयो सुखेरो ॥ ३ ॥ ममहित जानि प्रान-पति सतगुरु, जुगन जुगन तुम टेरो । मैं अचेत प्रीति मोह बस, तुम तजि भयो अनेरो ॥ ४ ॥ मैं हौं जीव तुम्हार दया-निधि, आदि अंतको चेरो । अब मोहिं लेहु छुडाइ कालसे, औगुन मेटो मेरो ॥ ५ ॥ बंदीछोर सुनो करुना-मय, करो हिये बिच डेरो । धर्मदास पर दाया कीजै, चौरासीसे फेरो ॥ ६ ॥

॥ शब्द ३ ॥

साहेब दीनबंधु हितकारी ॥ टेक ॥

कोटिन औगुन बालककरई, मातपिता चित एक न धारी ॥ १ ॥ तुम गुरु मात पिता जीवनके, मैं अति दीन दुखारी ॥ २ ॥ प्रनत-पाल करुना-निधान प्रभु, हमरी ओर निहारी ॥ ३ ॥ जुगन जुगनसे तुम चलि आये, जीवनके हितकारी ॥ ४ ॥ सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी ॥ ५ ॥ मोरे तुमहीं सत्त सुकृत हो, अंतर और न धारी ॥ ६ ॥ जानत हौं जनके तन मनकी, अब कस मोहिं बिसारी ॥ ७ ॥ जो कहि सकै तुम्हारी महिमा, केहि न दिह्यो पद भारी ॥ ८ ॥ धरमदास पर दाया कीन्ही, सेवक अहौं तुम्हारी ॥ ९ ॥

(२२२)

कवीरपंथी—

॥ शब्द ४ ॥

साहेब मेटो चूक हमारी ॥ टेक ॥ बार बार मोहिं दंड भयो है, चूक भई अति भारी । अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिं निहारी ॥ १ ॥ करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरो । ऐसो बिपति भई मोहिं ऊपर, कोई ना हीतै हमारो ॥ २ ॥ तरसत जीव रहै निस बासर, जानि जनहिं तुम दौरी । अबकी चूक छिमाकर साहेब, अब सन्मुख है हेरो ॥ ३ ॥ तुम सतगुरु सकल सुख दाता, शब्द पान दे तारो । धरमदास बिनवै कर जोरी, करौ बंदगी तेरो ॥ ४ ॥

शब्द ५

सुरति पर सतगुर धरि दियो बाठ ॥ टेक ॥ घरमाँ रहौं रहन नहिं पावौं, घरके लोग मोहिं देहिं निकार ॥ १ ॥ बाहर जावैं डाइन इक लागै, सुनि पावै जिय डारे मार ॥ २ ॥ ऐसी बाठ धरो मोरे साहेब, जहैं मारौं तहैं पछे पार ॥ ३ ॥ धरमदास पर दाय़ा कीजै, साहेब कवीर दुख मेटनहार ॥ ४ ॥

शब्द ६

बंदी-छोर बिनती सुनि लीजै ॥ टेक ॥ कपट कुटिल अपराधी द्रोही, ठहराई मन लीजै । नाम तुम्हारा अधम उधारन, ताकी दिच्छा दीजै ॥ १ ॥ पाप पुत्र नहिं जाँचन कीजै, काटि फंद अब दीजै । माँगूँ अपन सुभाव दयानिधि, सुनि अनुमान न कीजै ॥ २ ॥ बिषे बिनाश रहूँ निसु बासर, यह तन छिन छिन छीजै । साठ जन्मको हौं अपराधी, अबकी छिमा प्रभु कीजै ॥ ३ ॥ सतगुरु नाम मुनींद्र कहाये, साहेब कवीर सुनि लीजै । धरमपास बिनवै कर जोरी, काटि चौरासी दीजै ॥ ४ ॥

१ हितकारी ।

शब्दावली

(२२३)

शब्द ७

कब तुम मिलिहो कंथ कवीर ।

धर्मदास पर दाय़ा कीजै, हंस लगावो तीर ॥ १ ॥

भक्ति अचल औ हठ वैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।

जती सती संतोषी तुमहीं, सबके दाता धीर ॥ २ ॥

तुम प्रताप परवाह न केहुकी, सागर सलिता नीर ।

एक बुंद दयाल मोहिं दीजै, जाय जीवकी पीर ॥ ३ ॥

महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहिकी भीर ।

कामी कोधी झूठा लंपट, धान्यो अधम शरीर ॥ ४ ॥

सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मतके थीर ।

ज्ञानमंडन, भर्मखंडन, दया सिंधु कवीर ॥ ५ ॥

॥ शब्द ८ ॥

साहेब बूडत नाव अब मोरी ॥ टेक ॥

काम कोधकी लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।

लोभ, मोरे हिरदे घुमरतु है सागर वार न पारी ॥ १ ॥

कपटकी भँवर परतु है बहुतै, वामैं बेडा अटकारी ।

काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥ २ ॥

धरमदास पर दाय़ा कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।

कहैं कवीर सुनो हो धर्मनि, सतगुरु सरन उबारी ॥ ३ ॥

॥ शब्द ९ ॥

बिन दरसन भइ बावरी, गुरु द्यो दीदार ॥ टेक ॥ ठाढ़ि जोहैं तोरी बाट मैं, साहेब चलि आवो । इतनी दया हम पर करो, निज छबि दरसावो ॥ १ ॥ कोठरी रतन जडाव की, हीरा लगे किंवार । ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो ॥ २ ॥ बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार । धर्मदास अरजी सुनो, भव पार करावो ॥ ३ ॥

(२२४)

कवीरपंथी—

॥ शब्द १० ॥

दीनानाथ दयाल, भक्तकी पछ क सरन आयेकी लाज, साहेब जनकी करौ ॥ १ ॥ नौ दरवाजे बिकार, धार नौका बंगै। मरी सुरत नहीं ठहराय, लगन कैसे लगै ॥ २ ॥ पाँच तत्त्व गुन तीनका, आदर साजिया। जम राखै बिलमाय, तो फन्द न फँदिया ॥ ३ ॥ तिर्गुन फाँसका फँदा, माया मद जालमें। भवसागरके बीच, महा जंजालमें ॥ ४ ॥ भक्ति मुक्ति देव दान, दया जन पर धरौ। नौका पार लगाय, दास अपनो करौ ॥ ५ ॥ साहेब कवीर बन्दीछोर, अरज यक मानिये। धर्मनि पतित उबारि, सरनमें आनिये ॥ ६ ॥

॥ शब्द ११ ॥

चरन छाड़ि प्रभु जावैं कहाँ, मोरे और न कोई। जगमें आपन कोई नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥ मात पिता हित बन्धु तुम, कासे दुख रोई। सब कुछ तुम्हरे हाथ है, तुम्हरे सुख जोहां ॥ २ ॥ गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुते होई। ओट लई तुम नामकी, राखो पत सोई ॥ ३ ॥ सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई। सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिं कोई ॥ ४ ॥ मैं गरजी अरजी करौं, मरजी जस होई। अरज बिपति लिखौं आपनी, राखौं नहिं गोई ॥ ५ ॥ धरमदास सत साहेबी, घट घटहिं समोई। साहेब कवीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥ ६ ॥

॥ शब्द १२ ॥

साई मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥ काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोहको लग्यो बजारा। कुमति कलोल करै दशाहों दिसि, लोभको डुक्यो नगारा ॥ १ ॥ मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर भँवै' अति भारा। काम कोधकी लहर उठतु है, केहि बिधि

(१) बगद, बेटिकाने बहै।

सत्यनाम

श्री १०८ पं० श्री दयानामसाहेब वचनवंशीय गद्दीके विन्दवंशीयके १३ वें और अन्तिम आचार्य, आपके पश्चात् अब वचनवंशीय नाह वंशकी गद्दी आरम्भ हुई है।

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शब्दावली

(२२५)

होय निवारा ॥ २ ॥ पाँचके ऊपर पचिस महतिया, इन परंपंच पसारा । मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा कर जीव विचारा ॥ ३ ॥ ना मोरी नाव नहिं खेवटिया, डर लागे मोहिं भारी । चौदह लोकमें कोई नहिं दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥ ४ ॥ धरमदास की यही बीनती, उरझेको निर्वारो । साहेब कवीर मिले गुरु समरथ, हमसे अधम उबारो ॥ ५ ॥

॥ शब्द १३ ॥

मैं तो तोरे भजन भरोसे अविनासी ॥ टेक ॥ तीरथ बरत कछू नहिं करहुँ, बेद पढौँ नहिं कासी ॥ १ ॥ जंत्र मंत्र टोटका नहिं जानौँ, निमु दिन फिरत उदासी ॥ २ ॥ यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥ ३ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु चरनन दासी ॥ ४ ॥

॥ शब्द १४ ॥

साहेब बंदीछोर हमारे ॥ टेक ॥ ठाठे बैठे चलत निहारे, जागत साँझ सबारै । करुनासिंधु दयाके आगर, नैननके उजियारे ॥ १ ॥ बोलत बचन मीठ बहु लागे, पूरन पुरुष पियारे । उनकी रहनि गहनि जब पैहौं, होइ रहु सबसे न्यारे ॥ २ ॥ है बहु ज्ञान ध्यान बहुतेरो, खोलो गगन किवारै । दयास्वरूप बसै सिंधूमैं, हीरा लाल निकारे ॥ ३ ॥ साहेब कवीर सदाके सतगुरु, हंसनके रखवारै । धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥ ४ ॥

॥ शब्द १५ ॥

साहेब मोरी ओर निहारो ॥ टेक ॥ परजा पुत्र अहौं मैं साहेब, बहुत बात मैं टारो ॥ १ ॥ हौं मैं कोटि जनमको पापी, मन बच करम असारो । एकौं कर्म छुटे ना कबहुँ, बहु विधि बात बिगारो ॥ २ ॥ हौं अपराधी बहुत जुगनको, नइया मोर उबारो । बंदीछोर

(१) पूर्व । पृष्ठ २२४ पर पढ़ें

कवीरपंथी शब्दावली ८