भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२२३)

शब्द ७

कब तुम मिलिहो कंथ कवीर ।

धर्मदास पर दाय़ा कीजै, हंस लगावो तीर ॥ १ ॥

भक्ति अचल औ हठ वैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।

जती सती संतोषी तुमहीं, सबके दाता धीर ॥ २ ॥

तुम प्रताप परवाह न केहुकी, सागर सलिता नीर ।

एक बुंद दयाल मोहिं दीजै, जाय जीवकी पीर ॥ ३ ॥

महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहिकी भीर ।

कामी कोधी झूठा लंपट, धान्यो अधम शरीर ॥ ४ ॥

सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मतके थीर ।

ज्ञानमंडन, भर्मखंडन, दया सिंधु कवीर ॥ ५ ॥

॥ शब्द ८ ॥

साहेब बूडत नाव अब मोरी ॥ टेक ॥

काम कोधकी लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।

लोभ, मोरे हिरदे घुमरतु है सागर वार न पारी ॥ १ ॥

कपटकी भँवर परतु है बहुतै, वामैं बेडा अटकारी ।

काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥ २ ॥

धरमदास पर दाय़ा कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।

कहैं कवीर सुनो हो धर्मनि, सतगुरु सरन उबारी ॥ ३ ॥

॥ शब्द ९ ॥

बिन दरसन भइ बावरी, गुरु द्यो दीदार ॥ टेक ॥ ठाढ़ि जोहैं तोरी बाट मैं, साहेब चलि आवो । इतनी दया हम पर करो, निज छबि दरसावो ॥ १ ॥ कोठरी रतन जडाव की, हीरा लगे किंवार । ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो ॥ २ ॥ बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार । धर्मदास अरजी सुनो, भव पार करावो ॥ ३ ॥