कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ७
कब तुम मिलिहो कंथ कवीर ।
धर्मदास पर दाय़ा कीजै, हंस लगावो तीर ॥ १ ॥
भक्ति अचल औ हठ वैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।
जती सती संतोषी तुमहीं, सबके दाता धीर ॥ २ ॥
तुम प्रताप परवाह न केहुकी, सागर सलिता नीर ।
एक बुंद दयाल मोहिं दीजै, जाय जीवकी पीर ॥ ३ ॥
महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहिकी भीर ।
कामी कोधी झूठा लंपट, धान्यो अधम शरीर ॥ ४ ॥
सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मतके थीर ।
ज्ञानमंडन, भर्मखंडन, दया सिंधु कवीर ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साहेब बूडत नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम कोधकी लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ, मोरे हिरदे घुमरतु है सागर वार न पारी ॥ १ ॥
कपटकी भँवर परतु है बहुतै, वामैं बेडा अटकारी ।
काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥ २ ॥
धरमदास पर दाय़ा कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।
कहैं कवीर सुनो हो धर्मनि, सतगुरु सरन उबारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ९ ॥
बिन दरसन भइ बावरी, गुरु द्यो दीदार ॥ टेक ॥ ठाढ़ि जोहैं तोरी बाट मैं, साहेब चलि आवो । इतनी दया हम पर करो, निज छबि दरसावो ॥ १ ॥ कोठरी रतन जडाव की, हीरा लगे किंवार । ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो ॥ २ ॥ बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार । धर्मदास अरजी सुनो, भव पार करावो ॥ ३ ॥