कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(२२३)
शब्द ७
कब तुम मिलिहो कंथ कवीर ।
धर्मदास पर दाय़ा कीजै, हंस लगावो तीर ॥ १ ॥
भक्ति अचल औ हठ वैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।
जती सती संतोषी तुमहीं, सबके दाता धीर ॥ २ ॥
तुम प्रताप परवाह न केहुकी, सागर सलिता नीर ।
एक बुंद दयाल मोहिं दीजै, जाय जीवकी पीर ॥ ३ ॥
महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहिकी भीर ।
कामी कोधी झूठा लंपट, धान्यो अधम शरीर ॥ ४ ॥
सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मतके थीर ।
ज्ञानमंडन, भर्मखंडन, दया सिंधु कवीर ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साहेब बूडत नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम कोधकी लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ, मोरे हिरदे घुमरतु है सागर वार न पारी ॥ १ ॥
कपटकी भँवर परतु है बहुतै, वामैं बेडा अटकारी ।
काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥ २ ॥
धरमदास पर दाय़ा कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।
कहैं कवीर सुनो हो धर्मनि, सतगुरु सरन उबारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ९ ॥
बिन दरसन भइ बावरी, गुरु द्यो दीदार ॥ टेक ॥ ठाढ़ि जोहैं तोरी बाट मैं, साहेब चलि आवो । इतनी दया हम पर करो, निज छबि दरसावो ॥ १ ॥ कोठरी रतन जडाव की, हीरा लगे किंवार । ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो ॥ २ ॥ बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार । धर्मदास अरजी सुनो, भव पार करावो ॥ ३ ॥
(२२४)
कवीरपंथी—
॥ शब्द १० ॥
दीनानाथ दयाल, भक्तकी पछ क सरन आयेकी लाज, साहेब जनकी करौ ॥ १ ॥ नौ दरवाजे बिकार, धार नौका बंगै। मरी सुरत नहीं ठहराय, लगन कैसे लगै ॥ २ ॥ पाँच तत्त्व गुन तीनका, आदर साजिया। जम राखै बिलमाय, तो फन्द न फँदिया ॥ ३ ॥ तिर्गुन फाँसका फँदा, माया मद जालमें। भवसागरके बीच, महा जंजालमें ॥ ४ ॥ भक्ति मुक्ति देव दान, दया जन पर धरौ। नौका पार लगाय, दास अपनो करौ ॥ ५ ॥ साहेब कवीर बन्दीछोर, अरज यक मानिये। धर्मनि पतित उबारि, सरनमें आनिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द ११ ॥
चरन छाड़ि प्रभु जावैं कहाँ, मोरे और न कोई। जगमें आपन कोई नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥ मात पिता हित बन्धु तुम, कासे दुख रोई। सब कुछ तुम्हरे हाथ है, तुम्हरे सुख जोहां ॥ २ ॥ गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुते होई। ओट लई तुम नामकी, राखो पत सोई ॥ ३ ॥ सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई। सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिं कोई ॥ ४ ॥ मैं गरजी अरजी करौं, मरजी जस होई। अरज बिपति लिखौं आपनी, राखौं नहिं गोई ॥ ५ ॥ धरमदास सत साहेबी, घट घटहिं समोई। साहेब कवीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥ ६ ॥
॥ शब्द १२ ॥
साई मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥ काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोहको लग्यो बजारा। कुमति कलोल करै दशाहों दिसि, लोभको डुक्यो नगारा ॥ १ ॥ मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर भँवै' अति भारा। काम कोधकी लहर उठतु है, केहि बिधि
(१) बगद, बेटिकाने बहै।
सत्यनाम
श्री १०८ पं० श्री दयानामसाहेब वचनवंशीय गद्दीके विन्दवंशीयके १३ वें और अन्तिम आचार्य, आपके पश्चात् अब वचनवंशीय नाह वंशकी गद्दी आरम्भ हुई है।
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शब्दावली
(२२५)
होय निवारा ॥ २ ॥ पाँचके ऊपर पचिस महतिया, इन परंपंच पसारा । मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा कर जीव विचारा ॥ ३ ॥ ना मोरी नाव नहिं खेवटिया, डर लागे मोहिं भारी । चौदह लोकमें कोई नहिं दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥ ४ ॥ धरमदास की यही बीनती, उरझेको निर्वारो । साहेब कवीर मिले गुरु समरथ, हमसे अधम उबारो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मैं तो तोरे भजन भरोसे अविनासी ॥ टेक ॥ तीरथ बरत कछू नहिं करहुँ, बेद पढौँ नहिं कासी ॥ १ ॥ जंत्र मंत्र टोटका नहिं जानौँ, निमु दिन फिरत उदासी ॥ २ ॥ यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥ ३ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु चरनन दासी ॥ ४ ॥
॥ शब्द १४ ॥
साहेब बंदीछोर हमारे ॥ टेक ॥ ठाठे बैठे चलत निहारे, जागत साँझ सबारै । करुनासिंधु दयाके आगर, नैननके उजियारे ॥ १ ॥ बोलत बचन मीठ बहु लागे, पूरन पुरुष पियारे । उनकी रहनि गहनि जब पैहौं, होइ रहु सबसे न्यारे ॥ २ ॥ है बहु ज्ञान ध्यान बहुतेरो, खोलो गगन किवारै । दयास्वरूप बसै सिंधूमैं, हीरा लाल निकारे ॥ ३ ॥ साहेब कवीर सदाके सतगुरु, हंसनके रखवारै । धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब मोरी ओर निहारो ॥ टेक ॥ परजा पुत्र अहौं मैं साहेब, बहुत बात मैं टारो ॥ १ ॥ हौं मैं कोटि जनमको पापी, मन बच करम असारो । एकौं कर्म छुटे ना कबहुँ, बहु विधि बात बिगारो ॥ २ ॥ हौं अपराधी बहुत जुगनको, नइया मोर उबारो । बंदीछोर
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कवीरपंथी शब्दावली ८
(२२६)
कवीरपंथी-
सकल सुखदाता, करूनामय करत पुकारों ॥ ३ ॥ सीस चढ़ाइ पापकी मोटरी, आयो तुम्हरे द्वारो । को अस हमरे भाव उतारे, तुमहीं हेतु हमारो ॥ ४ ॥ धरमदास यह बिनती बिनवै, सतगुरु मो को तारो । साहेब कवीर हंसके राजा, अमर लोक लै धारो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
साहेब मोरी बहियाँ सम्हारि गही ॥ टेक ॥ गहिरी नदिया नाव झाँझरी, बोझा अधिक भई । मोह लोभकी लहर उठत है, नदिया झकोर बही ॥ १ ॥ तुमहिं बिगारो तुमहिं सँवारो, तुमहिं भँडार भरी । जब चाहो तब पार लगावो, नहिं तो जात बही ॥ २ ॥ कुमति काटिके सुमति बढावो, बल बुधि ज्ञान दर्ई । मैं पापी बहु बेरी चूकूँ, तुम मेरी चूक सही ॥ ३ ॥ धरमदास सरन सतगुरुके, अब धुनि लाग रही । अमर लोकमें डेरा परिगै, समरथनाम सही ॥ ४ ॥
॥ शब्द १७ ॥
साहेब कौन कमी घर तेरो ॥ टेक ॥ भूखे अन्न पियासे पानी, कपडासे तन चेरो । जो कछु न्यामत सबै महल में, खरच खजाना ढेरो ॥ १ ॥ खाकसे पाक कियो पल माहीं, हे समरथ बल तेरो । भवसे काठि कियो तँरनी पर, खेइ लगावो सवेरी ॥ २ ॥ रहे न घाम छौंह दुनियामें, रहे न जमको चेरो । रावसे रंक रंकसे राजा, छिनमें होवत हेरो ॥ ३ ॥ मानो सत् झूठ जनि जानो, सत् बचन है सूरो । धर्मदास चरनन पर बिनवै, तुम गति सब भरपूरों ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
साहेब खेइ लगावो पारा ॥ टेक ॥ असी कोसमें झील अरू झाँकर, असी कोस अंधियारा । असी कोस बैतरनी नदिया, जहाँवाँ हंस उतारा ॥ १ ॥ बड़े बड़े सिकारी जोधा, आगेहीं पग डारा । खाल खैँचि जम भुसा भरावै, ऐँचि लेहि जस आरा ॥ २ ॥
१ हितकरी ।
२ नाव ।
शब्दावली
(२२७)
लेखा माँगे जम फुरमावै, तीन लोक ले डारा । उपजत विनसत जनम बीतिगै, चौरासीकी धारा ॥ ३ ॥ गगन मैदिलमें सतगुरु बोले, सुनि ले शब्द सम्हारा । धरमदास चरनन पर विनवै, अबकी अरज हमारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
अब मोहिं दरसन देहु कवीर ॥ टेक ॥ तुम्हरे दरससे पाप कटत है, निरमल होत सरीर ॥ १ ॥ अमृत भोजन हंसा पावै, शब्द धुननकी खीर ॥ २ ॥ जहँ देखों जहँ पाट पटंबर, ओढन अंबर चीर ॥ ३ ॥ धरमदासकी अरज गोसाँई, हंस लगावो तीर ॥ ४ ॥
॥ शब्द २० ॥
साहेब मोहिं दरसन दीजे हो । कहना निधि मेहर करीजे हो । पपिहाके चित स्वाति बसै, भावै नहिं जल दूजा हो । जैसे काग जहाज चढे, वाको और न सूझा हो ॥ १ ॥ बार बार विनती कहै, मेरी अरज सुनीजे हो । भवसागरसे काठिके, अपना करि लीजे हो ॥ २ ॥ सत् लोक से सुरत करी, तब जगमें आये हो । जमसे जीव छोडाइके, धर्मनि मन भाये हो ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
मोर मन लागा साहेबसे, बन्दीछोर कवीरा ॥ टेक ॥ सतगुरु सरनै मैं गई, सब दुख हरि लीन्हा । करम भरम सब मेटिके, निरमल करि दीन्हा ॥ १ ॥ तीन लोकके बीचमें, जम कातर चीन्हा । तासे मोहिं छुडाइके, आपन करि लीन्हा ॥ २ ॥ सतगुरु शब्द सुनाइके, पारस करि दीन्हा । कागा बरन मिटाइके, हंसा करि लीन्हा ॥ ३ ॥ काम क्रोध सब त्यागिके, बन हंस गँभीरा । शब्द हमारा मानि ले, गुरु कहत कवीरा ॥ ४ ॥ धरमदासकी बीनती, संतन महँ हेरा । जाति बरन कुल त्यागिके, सत् लोक बसेरा ॥ ५ ॥
(२२८)
कवीरपंथी—
॥ शब्द २२ ॥
साहेब कौन देस मोहिं डारा ॥ टेक ॥ वह तो देस अमर हंसनको, यहि जग काल पसारा ॥ १ ॥ देवहु शब्द अजर हंसनको, बहुरि न है अवतारा ॥ २ ॥ निरगुन सरगुन दुंद पसारा, परि गइ कालकी धारा ॥ ३ ॥ जहाँ देस है सत्त पुरुषका, अजर अमी आहारा ॥ ४ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, अबकी अरज हमारा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २३ ॥
साहेब लेइ चलो देस अपना ॥ टेक ॥ जमकी त्रास सही नहिं जाई, केहि विधि धरौं मैं ध्याना ॥ १ ॥ माया मोह भरमकी मोटरी, यह सब काल कल्पना ॥ २ ॥ माया मोह भरम सब काटो, दीजै पद निरवाना ॥ ३ ॥ अमर लोक वह देस सुहेला, हंसा कीन्ह पयाना ॥ ४ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, आवागवन नसाना ॥ ५ ॥
॥ शब्द २४ ॥
तुम सतगुरु हम सेवक तुम्हरे ॥ टेक ॥ जो कोइ मारै औ गरियावै, दाद फिरियाद करब तुमहींसे ॥ १ ॥ सोवत जागतके रछपाला, तुमहीं छोंड़ि भजौं नहिं औरै ॥ २ ॥ तुम धरनीधर शब्द अनाहद, अमृत भाव करो प्रभु सगरे ॥ ३ ॥ तुम्हरी बिनय कहाँ लगि बरनौं, धरमदास पद गहे है तुम्हरे ॥ ४ ॥
॥ शब्द २५ ॥
जमुनियाँकी डारि सोरी तोड़ देव हो ॥ टेक ॥ एक जमुनियाँके चौदह डारि, सार शब्द लेके मोड़ देव हो ॥ १ ॥ काया कंचन अजब पियाला, नाम बूटी रस घोर देव हो ॥ २ ॥ सुरत सुहागिन गजब पियासी, अमृत रसमें बोरे देव हो ॥ ३ ॥ सतगुरु हमरे ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ जोरि देव हो ॥ ४ ॥ धरमदासकी अरज गुसाई, जीवनकी बंदी छोर देव हो ॥ ५ ॥
शब्दावली
(२२९)
॥ शब्द २६ ॥
मिहरवान है साहब मेरा । दिलभर दूरसन पाऊँ तेरा ॥ १ ॥ तुम दाता मैं सदा भिखारी । देव दीदार जाऊँ बलिहारी ॥ २ ॥ कहूँ बंदगी खिजमत दीजै । बकसो चूक दया बहु कीजै ॥ ३ ॥ सेवक ते बिगरे सौ बारा । सतगुरु साहेब लेह उबारा ॥ ४ ॥ औगुन सेवक साहेब जाने । साहेब मनमें ना गिलाने ॥ ५ ॥ धर्मदास लइ तुम्हरि पनाह । अगले पछिले बकसु गुनाह ॥ ६ ॥
स्तोत्र उर्दूभाषा ।
(स्वामी परमानन्दजी विरचित कबीर मन्त्रसे ॥ )
किया सब जानपर रहमत जहाँदार । तू पुरुष सत शब्द सतके अमाँदार ॥ पड़े हम भूल भवसागरमें आकर । न जाना भेद सत्पुरुष निराकार ॥ कहीं तीरथ कहीं मूरत पुजाया । कहीं खूनकतलका जारी हुआ कार ॥ कहीं हनुमानो भैरव भूत पूजा । कहीं शिवलिङ्ग औ चण्डी गर्मबाजार ॥ कहीं खञ्जर कहीं छूरी चलाया । कहीं मुजेंबह पै छूटीं खून पिचकार ॥ कहीं गरदन मरोड़ी झटका पटका । कहीं आतिशमें जलते बलते जाँदार ॥ कहीं है चक्र भैरवका तमाशा । कहीं बकरे पै घूँसोंकी पड़ी मार ॥ कहीं रोजः कहीं मैं भङ्ग बूजः । कहीं गलकट बरहमनबैठे खूँवार ॥ कहीं सुर्गा है बिस्मिल हाथ कस्साब । कहीं चीखें सुअर कालीके दरबार ॥ कहीं है ढोल बजता ओ नकारः । कहीं मजमः है मर्दोजन जनाकार ॥ कहीं अश्वमेध गोमैध हो अजामेध । कहीं अहरमन बरहमन मर्दुमाजार ॥ कहीं मुछा व काजी ले छुरा हाथ । कहीं गरदन कुशीको तेज तलवार । कहीं रहमत कहीं जहमत दिखाया । पड़े सब जीव धोखे धंधेके गार ॥ भरमका धर्म आलममें चलाया ।
१ जबह करनेकी जगह-कसाइखाना ।
(२३०)
कवीरपंथी—
कहीं नेक और कहीं है बद ब किरदार ॥ हरी हर हर हरी हर कोई बोले । कोई कहता अहं ब्रह्म सबका सरदार ॥ कहांतक सो बयाँ कीजे सरापा । निरञ्जन खेलका नहिं वार औ पार ॥ यह तीनों देव देवी सबके दाता । इन्हींके मर्दोजन फरमान बरदार ॥ फँसे वेद और शरणमें जीव सारे । नहीं महरम न ढूँढे कोई शब्द सार ॥ दो लोक और वेद सूलीके सते हैं । लटकते उसके ऊपर जीव जम द्वारा ॥ कि ज्यों सावनके घासोंसे छिपे राह । पुरुष सत्पंथ यों रोके हैं मक्कार ॥ हमें रख लीजिये खुद जा पनहमें । तु बंदीछोड़ सब जीवनको आधार । बजुज सत्गुरु हमारे कौन दे दाद । तुही है बरतरी सब सिद्ध सालार ॥ तुही सत्पुरुष खुद धर देह आया । शरण अपनीमें रखिये हमको इसबार ॥ किया तदवीर सदहा योग जप हम । न छुटकारा हुआ अज दस्ते जन्वार । सिवा साया कदम तेरे न जाये । नहीं चारा कोई सूझे है नाचार ॥ तुही बन्दः नेवाजः बन्दः परवर । सिवा तेरे न रह कोई है जिनहार ॥ जियारत आपसे, यह संगे सोजा । हुआ हम सबके खातिर भिस्ल गुलजार ॥ बचालीजे बचालीजे बचाले । हम आजिज कालके फँदे गिरफ्तार ॥ कि सुन सत्गुरुका कलमः आब हैवाँ । हुए हैं जिन्दः हम सब जीव सुर्दार ॥ हुई शादी कदम कादिरकै देखे । बहर रूख होरही रहमत नमूदार ॥ कि जर्ः खाक पाये परतव अफगन । हुए जाहिर व बाहर इल्म आसार ॥ न तुझ-सा और कोई हर दो जहाँ में । तु आदमकी मुसीबतमें मददगार ॥ हुआ बद हाल मुतगैय्यर हमारा । खबर लेनेको आये आप करतार ॥ हुए हम भूलके मुजरिम तुम्हारे । गुनह वरुशो गुनह बखशिन्दः गफ्तार ॥ सुबुक कीजे हमें इस बोझसे अब । हमारे सिर गुनाहोंका है ँबार ॥ हमारे परदःको ढक मेह करके । तेराही नाम है मशहूर सत्तार ॥ हम आजिज खाक हैं पा पाक तेरे । गुरुकी मेह पावैं अस्ल इसरार ॥
शब्दावली
(२३१)
ऋषीश्वरोंका वचन
रामानन्दजी वचन (रामानन्दगोष्ठीसे)
कर्ता तुम ही साधु हो, सत कवीर हो देव । तनमन तुमको अरपिहौं, कुलदिशा मोहि देव ॥
धर्मदास वचन ।
बाजा बाजे रहितका, परा नगरमें झोर । सद्गुरु खसम कवीर है, नजर न आवे और ॥
गोरखनाथ वचन ॥
नौनाथ चौरासी सिद्ध, इनका अनहद ज्ञान । अविचल घर कबीरका, यह गति विरला जान ॥ झोरी झण्डा कूबरी, सेली टोपी साथ । दया भइ जब कवीरकी, चढायी गोरखनाथ ॥
नाभाजी वचन ।
वानी अरब व खरब हैं, ग्रंथों कोट हजार । कर्ता पुरुष कवीर है, नामे किया विचार ॥
नानकसाह वचन राग महलापहला । ×
यक अर्ज गुफतम पेश तू दर गोश कुन करतार । हक्का कवीर करीम तू ऐब परवरदिगार ॥ दुनियाँ मुकाम फानी तहकीक दिलदानी । मन सर मूए इजराईल गिरफत दिल हेच न दानी ॥ जन पिसर बेरादर कस नेस्त दस्तम गीर । आखिर बयफतम कस नदारम चैशन्द तकबीर ॥ शबोरोज गशतम दरहवा करदेम बदी खयाल । गाहे न नेकी कार करदम ई चुनी अहवाल ॥ बदबरक्त हमचू बखील गाफिल बेनजर बेबाक । नानक बगोयद जी तोरा तिरा चाकरा पाखाक ॥
मल्लकवासजी वचन शब्द ।
जपोरे भाई साहब नाम कवीर । एक समय गुरु बंसी बजाई,
× नोट-इसका अर्थ परिशिष्ट में देखो ॥
(२३२)
कवीरपंथी-
कालिन्दीके तीर। सुरनर सुनि सब छकित भये हैं, अरु यमुनाजीको नीर ॥ काशी तजि गुरु मगहर आये, दोउ दीनको पीर। कोई गाडे कोई अग्नि जलावे, नेक न धरते धीर ॥ चार दागसे सद्गुरु न्यारा, अजरो अमर शरीर। जगन्नाथको मन्दिर थाप्यो, हटाके सायर नीर ॥ आसा रोप समुद्र हटाये, ऐसे गुरु गम्भीर। दास मलूक सलूक कहत है, कहो जो खसम कवीर ॥
दादुराम वचन साचके अङ्गको साखियां
जै जै शरण कवीरके, तरगये अनन्त अपार। दादूगुण कीता कहै, कहत न आवै पार ॥ १ ॥ कवीर कर्ता आप है, दूजा नाही कोय। दादू पूरन जगतको, भक्ति हटावन सोय ॥ २ ॥ ठीका पूरन होय जब, सब कोइ तजै शरीर। दादूकाल गँजे नहीं, जपै जो नाम कवीर ॥ ३ ॥ आदमकी आयू घुटै, तब जम घेरै आय। सुमिरन किये कवीरका, दादू लियो बचाय ॥ ४ ॥ मेट दिया अपराध सब, आय मिले छनमाँह। दादूको सँग ले चले, कवीर चरणकी छाँह ॥ ५ ॥ सेव देव निज चरणकी, दादू अपना जान। भृङ्गी सत्यकवीरके, कीन्हा आप समान ॥ ६ ॥ दादू अधम अनेक हैं, भगत दानपत हीन। साहब कवीर सहजमें, ताहि अपन करलीन ॥ ७ ॥ दादू अन्तरगत सदा, छिन छिन सुमिरन ध्यान। वाहँ नाम कवीर पर, पल पल मेरा प्रान ॥ ८ ॥ सुन सुन साखि कवीरकी, मग्न भया मन मोर। दादू थाके खोजके, जैसे चन्द्र चकोर ॥ ९ ॥ सुन सुन साखि कवीरकी, काल नवावे माथ। धन्य धन्य तिन लोकमें, दादू जोड़ै हाथ ॥ १० ॥ केहरि नाम कवीरका, विषम काल गजराज। दादू भजन प्रतापते, भाजे सुनत अवाज ॥ ११ ॥ पलहिँ नाम कवीरका, दादू मन चित लाय। हस्तीके असवारको, थान काल नहि खाय ॥ १२ ॥ सुमिरत नाम
शब्दावली
(२२३)
कवीरका, कटै कालकी पीर । दादू दिन दिन ऊपजे, परमानंद सुख सीर ॥ १३ ॥ दादू नाम कवीरका, जो कोइ लेय ओट । तिनको कबहुँ न लागई, काल वज्रकी चोट ॥ १४ ॥ और सन्त सब कूप हैं, केते सरिता नीर । दादू अगम अपार है, दरिया सत्यकवीर ॥ १५ ॥ हिन्दू अपनी हृद चले, मुसलमान हृद माँहि । दादू चाल कवीरकी, दोउ दीनमें नाहि ॥ १६ ॥ हिन्दूके सद्गुरु सही, मुसलमानके पीर । दादू दोनों दीनमें, अदली नाम कवीर ॥ १७ ॥ अबही तेरी सब मिटै, जन्म मरनकी पीर । सास उसासा सुमिरले, दादू नाम कवीर ॥ १८ ॥ कोई रीझा सगुनमें, कोइ निर्गुन ठहराय । दादू गति कवीरकी, मोते कही न जाय ॥ १९ ॥ भवजलतारन जीवको, खेवट आय कवीर । अनन्त कोट सुख भावसे, दादू उतरे तीर ॥ २० ॥
सुखसे ज्ञान कवीरका, कोई कह ससुझाय । दादू वाको चरणरज, लइहो शीश चढाय ॥ २१ ॥ नाम कवीर जो नर जपै, मैं बलिहारी ताहि । तन मन वारुँ तासु पर, दादू प्रान लगाय ॥ २२ ॥ सुमिरत नाम कवीरका, जिह्वा मोर सुखाय । विरह अग्नि तनमें तपै, दादू कौन बुझाय ॥ २३ ॥ दादू नाम कवीर का सुनिके काँपे काल । नाम भरोसे नर चले, बङ्ग न होवे बाल ॥ २४ ॥ जिन मोको निज नाम दर्ई, सद्गुरु सोइ हमार । दादू दूसर कौन है, कवीर सिरजनहार ॥ २५ ॥ कवीर साहब कह गये, ढोल बजाय बजाय । दादू दुनियाँ बावरी, ताके सङ्ग न जाय ॥ २६ ॥ दादू बैठि जहाज पर, गये समुद्र तीर । जलमें मच्छी जो रहैं, कहैं कवीर कवीर ॥ २७ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, सुरति जो सीप विचार । दादू तन मन जोड़के, लेत बूँद अनुसार ॥ २८ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, चात्रक मन बहु आस । दादू और पिवै नहीं, स्वाति बूँदकी प्यास ॥ २९ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, सो हम पिया अघाय । मनकी
(२३४)
कवीरपंथी—
प्यासा सब मिटी, दाढ़ रहे समय ॥३०॥ जैसे मिरगा नाद सुन, तन मन भूले प्रान । दाढ़ भूले देह गुन, सुनि कवीरको ज्ञान ॥३१॥ केवल नैन कवीरका, उज्ज्वल रूप अनूप । दाढ़ अन्तर निर्मला, देखे सहज सरूप ॥३२॥ शोभा देखि कवीरकी, नैन रहे ललचाय । कहा कहूँ छबि रूपकी, दाढ़ कही न जाय ॥ ३३ ॥ एकै रोम कवीरका, कोटिभानु छबि छाय । दाढ़ कौतुक चन्द ते, शीतलता अधिकाय ॥३४॥ बन्दौँ चरण कवीरके, कोटि बार पल माँहि । दाढ़ हवस मनमें रही, कोटिक रसना नाँहि ॥ ३५ ॥ कोटि कर्म पलमें कटैँ, नाम कवीर जो लेइ । दाढ़ सच्चे होत है, सुफल मनोरथ देइ ॥३६॥ परमारथके कारनै, आप स्वार्थी नाँहि । कवीर आये भगति लै, दाढ़ भवजल माँहि ॥ ३७ ॥ भगति करै संसारमें, युग युग नाम धराय । दाढ़ तारन जीवको, काशी प्रगटै आय ॥ ३८ ॥ बहुत जीव अटके रहे, बिन सदगुरु भव माँहि । दाढ़ नाम कवीर बिन, छूटे एको नाँहि ॥ ३९ ॥ सदगुरु बहियाँ जीवको, मंझधार भवसिन्ध । दाढ़ नाम कवीरका, छोड़ आवे भवफंद ॥४०॥ साचा शब्द कवीरका, मीठा लगै मोय । दाढ़ सन्ता परम सुख, कीता आनंद होय ॥ ४१ ॥ साचा शब्द कवीरका, सब सुखदाई सोय । दाढ़ गुरु परतापते, कित्ता भरोसा होय ॥४२॥ साचा शब्द कवीरका, सन्त सुनो चित लाय । दाढ़ भ्रम सब मिट गया, कर्मकाल नहिँ खाय ॥४३॥ साचा शब्द कवीरका, सबको होय सहाय । रोग दुःख त्रिताप सब, दाढ़ दूर पराय ॥ ४४ ॥ साचा शब्द कवीरका, तोल मोलमें नाँहि । दाढ़ दूसर ना मिलै, जो खोजे घट माँहि ॥ ४५ ॥ साचा शब्द कवीरका, युग युग अटल अभूल । दाढ़ पावे पारखू, परम पुरुष निजमूल ॥ ४६ ॥
शब्दावली
(२३५)
गरीबदासजीकी साखियाँ
नमो नमो सत्पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन । सुरनर मुनि जन साधुवा, सन्तों सर्वश दीन ॥ १ ॥ पुर पट्टन सतलोक है, अदली सदगुरु सार । भगति हेत सो उत्तरे, पाया हम दीदार ॥ २ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुन्न विदेशी आप । रोम रोम परकाश है, दीना अजपा जाप ॥ ३ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके सेन । उर अन्तर परकाशिया, अजब सुनाये वैन ॥ ४ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके नाल । गोन किया सतलोकसे, अनल पंखकी चाल ॥ ५ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके तीर । सब संतन शिरताज है, सदगुरु अटल कवीर ॥ ६ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, वे परवाह अबंध । परम हंस पूरन पुरुष, रोम रोम रविचंद ॥ ७ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, है जिन्दा जगदीश । सुन्न विदेशी मिल गया, छत्र सुकूट है शीश ॥ ८ ॥ जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक सुरशिद पीव । कालकरम लागै नहीं, संका नाहीं झीव ॥ ९ ॥ जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक सुरशिद पीर । दुहुँ गरीब झगरा पडा, पाया नहीं शरीर ॥ १० ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, तेज पुंजको अङ्ग । झिलमिल नूर जहूर है, रूप रेख नहि रङ्ग ॥ ११ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, खोले वज्रकपाट । अगम भूमिकी गम करे, उत्तरे औघट घाट ॥ १२ ॥ सदगुरु मारचो बान कसि, गहवर गाँसी स्वींच । करम भरम सबही लिये, ज्ञानीको बुधि ईंच ॥ १३ ॥ सदगुरु आय दया करि, ऐसे दीन दयाल । बन्दीछोर विरद किया, जठरअग्नि प्रतिपाल ॥ १४ ॥ यम जोरा जासे डरे, धरमराय धर धीर । ऐसा सदगुरु एक है, अदली अदल कवीर ॥ १५ ॥ यम जोरा जासे डरे, मिटे करमको रेख । अदली अदल कवीर है, कुलका सदगुरु एक ॥ १६ ॥
( २३६ )
कवीरपंथी—
ऐसा सदगुरु हम मिला, भवसागरके बीच । खेवट सबको खेवता, क्या उत्तम क्या नीच ॥ १७ ॥ मायाको रस पीयके, डूब गये दो दीन । ऐसा सदगुरु हम मिला, ज्ञान योग परवीन ॥ १८ ॥ साहबसे सदगुरु भये, सदगुरुसे भय साथ । ये तीनों एक अङ्ग हैं, गति कुछ अगम अगाध ॥ १९ ॥ अंधे गूँगे गुरु घने, लोभी लँगडे लाख । साहबसे परिचय नहीं, काहि बनावैं साख ॥ २० ॥ ऐसा सदगुरु सेविये, शब्द समाना होय । भौसागरमें डूबते, पार लँघावैं सोय ॥ २१ ॥ सदगुरु पूर्ण ब्रह्म है, सदगुरु आप अलेख । सदगुरु रमता राम है, यामें मीन न मेख ॥ २२ ॥ बङ्गनालके अन्तरे, तिरवेणीके तीर । जहाँ सुहि सदगुरु ले गया, बन्दीछोड कवीर ॥ २३ ॥ शून्यमण्डल अनुराग है, शून्यमण्डल रह थीर । दास गरीब उधारिया, बन्दीछोड कवीर ॥ २४ ॥ या सुखते सुख संख गुण, ब्रह्म शब्दके माँहि । सदगुरु मिले कवीरसे सत्यलोक ले जाँहि ॥ २५ ॥ जैसे बादल गगनमें, चलते हैं बिन पाँय । ऐसे पुरुष कवीर हैं, शून्यमें रहे समय ॥ २६ ॥ गगनमण्डलसे ऊतरे, साहब पुरुष कवीर । चोला धरा खवासका, तोडे यम जञ्जीर ॥ २७ ॥ आदौ आदि कवीर है, चौदह भुवन विशाल । हीरे मोती बहुत हैं, कवीर लालनके लाल ॥ २८ ॥ ऐसा निर्मल ज्ञान है, निर्मल करे शरीर । और ज्ञान मण्डल सबै, चक्के ज्ञान कवीर ॥ २९ ॥
चौपाई ।
दास गरीब कवीर को चेरा । सत्य लोक अमरपुर डेरा । अमृत पान अमिय रस चोखा । पीवे हंसा नाही धोखा ॥
गोसाई गरीब दासजीकी श्रुतवेदी ।
नमो नमो सत पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन्ह । सुरनर सुनिजन
शब्दावली ।
(२३७)
साधवा, संतो सर्वस दीन्ह ॥ अनंत कोट ब्रह्माण्डमें, बन्दीछोर कहाय । सो तो पुरुष कवीर है, जननी जनी न माय ॥
ब्रह्म वेदी ।
गैबी ख्याल विशाल सतगुरु, अचल दिगम्बर थीर है । भक्त हेत काया धरि आये, अविचल सत्य कवीर है ॥ १ ॥ नानक दाढ़ अगम अगाधू, तरे जहाज खेवट सही । सुख सागरके हंस आये, भक्त हिरम्बर उर गही ॥ २ ॥ कोटि भान परकाश पूरन, हम हमकी लार है । अचल अभंगी है सत्संगी, अविगतका दीदार है ॥ ३ ॥ धन सतगुरु उपदेश देवा, चौगसी भ्रम भेटई । तेज पुंज तन देह धरिके, इस विधि हमको भेटई ॥ ४ ॥ सबद निवास अकास वानी, यह सतगुरुका रूप है । चन्द सूर नहि पवन पानी, ना जहैं छाया धूप है ॥ ५ ॥ रहिता रमिता राम साहब, अविचल अलह अलेख है । भूले पंथ विटम्बवादी, कुलका खाविंद एक है ॥ ६ ॥ रोम रोममें जाप जपिले, अष्ट कमल दल मेल है । सुरत निरतके कमल बैठो, जहाँ दीपक बिन तेल है ॥ ७ ॥ हरदम खोज हनोज हाजिर, तिरखेनीके तीर है । दास गरीब तबीन सतगुरु, बन्दीछोर कवीर है ॥ ८ ॥
गरीबदासजीकी पारखमझकी कुछ साखियाँ ।
काशीपुरको कस्द किया, उतरे अघर अधार । मोमिनका मुजरा हुआ, जंगलमें दीदार ॥ १ ॥ कोटि किरन शशि भानु सुधि, आसन अघर विमान । परसत पूरण ब्रह्मको, शीतल पिण्ड औ प्रान ॥ २ ॥ गोद लिया सुख चूमके, हेम रूप झलकन्त । जगर मगर काया करे, दमके पद्म अनन्त ॥ ३ ॥ काशी उमडी गुल भया, मोमिनका घर घेर । कोई कह ब्रह्मा विष्णु है, कोई कह इन्द्र कुबेर ॥ ४ ॥ कोई कह वरुण धरमराय है, कोइ कोइ कहता
(२३८)
कवीरपंथी—
ईश । सोलह कला सुभान गति, कोई कहे जगदीश ॥ ५ ॥ भगति सुक्ति ले ऊतरे, मेटन तीनों ताप । मोमिन घर डेरा लिया, कहे कवीरा बाप ॥ ६ ॥ दूध न पीवे नहीं अन्न भस्वे, नहीं पलने झूलन्त । अघर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलन्त ॥ ७ ॥ कोई कहे छल, ईश्वर नहीं, कोई किन्नर कहलाय । कोई कहे गुण ईशका, ज्यों ज्यों मारे साय ॥ ८ ॥ काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द । ऐसे दुल्हा ऊतरे, ज्यों कन्या बरविन्द ॥ ९ ॥ खलक मुलक देखन गया, राजा परजा रीति । जम्बूद्वीप जहानमें, उतरे शब्द अतीति ॥ १० ॥ दुनी कहे यह देव है, देव कहे यह ईश । ईश कहे परब्रह्म है, पूरन विस्वेवीस ॥ ११ ॥ काजी गये कुरान ले, घर लडकेको नाँउ । अच्छर अच्छरमें फुरे, धन्य कवीर बल जाउँ ॥ १२ ॥ सकल कुरान कवीर है, हरफ लिखे जो लेख । काशीके काजी कहें, गयी दीनकी टेक ॥ १३ ॥ शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत वदन विनोद । महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥ १४ ॥ नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परनाम । धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशीनिष्काम ॥ १५ ॥ सात बार चर्चा करे बोले बालक बैन । शिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक घेनु ॥ १६ ॥ अनव्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल । पियो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥ १७ ॥ षष्ठ मासके जब भये, नित दुनिया वर देहि । चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥ १८ ॥
रामानन्द स्वामी और कवीर साहबकी वार्तालापका वृत्तान्त ।
भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं यकर रख । ऊत भूतको ध्यावना, पारखण्ड और परपञ्च ॥ १९ ॥ रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार । देश द्राविड छाडिके, आये पुरी विचार ॥ २० ॥ योग युक्ति
शब्दावली
(२३९)
प्राणायाम करि, जीता सकल शरीर । तिरवेणीके घाटमें, अटक रहै बलबीर ॥ २१ ॥ तीरथ वरत इकादशी, गंगोदक अस्नान । पूजा विधि विधानसो, सर्व कलासों गान ॥ २२ ॥ करे मानसी सेव नित, आत्मतत्त्वको ध्यान । षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥ २३ ॥ चौदह सौ चेले किये, काशीनगर मैझार । चार सम्प्रदा चलत हैं, औरो बावन द्वार ॥ २४ ॥ पांच बरसके जब भये, काशी माहिं कवीर । दास गरीब अजीब कला, ज्ञान ध्यान गुण थीर ॥ २५ ॥ गुल काशीपुरिमें भया, अटपट वैन विहंग । दास गरीब गुणी थके, सुनि जोलहा परसंग ॥ २६ ॥ रामानन्द अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश । दास गरीब विलंबना, ताहि नवावत शीश ॥ २७ ॥ रामानन्दको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाय । दास गरीब दरस भये, पैयन लगी जो लाय ॥ २८ ॥ पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन । दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये परवीन ॥ २९ ॥ आडा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त । दास गरीब उलंग छबि, अधर डाक कूदन्त ॥ ३० ॥ कौन जाति कुल पन्थ है, कौन तुम्हारा नाउँ । दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाउँ ॥ ३१ ॥ जाति हमारी जगदगुरु, परमेश्वर पद पन्थ । दास गरीब लिखत परे, नाम निरञ्जन कन्थ ॥ ३२ ॥ रे बालक दुर्बुद्धि सुनु, घट मठ तन आकार । दास गरीब दर दर लगे, बोले सिरजनहार ॥ ३३ ॥ तू मोमिनके पालुवा, जुलहेके घर बास । दास गरीब अज्ञान गति, एता हठ विश्वास ॥ ३४ ॥ मान बढाई छाड़िके, बोलौ बालक बैन । दास गरीब अधम सुखी, इतना तुम घर फैन ॥ ३५ ॥ कलियुग क्षेतरपाल है, क्या भैरो कोई भूत । दास गरीब विडंबना, गया जगत सब ऊत ॥ ३६ ॥ मनी मगज माया तजो, तजिये मान गुमान । दास गरीब सो बात कहि
( २४० )
कवीरपंथी—
नहीं पावेगो जान ॥ ३७ ॥ हे बालक बुधि तोरि गति, कौडी साखन भौड । दास गरीबहि हदेसकरि, नहीं लेवेंगे डाँड ॥ ३८ ॥ शाह सिकन्दरके बघे, पग ऊपर तर शीश । दास गरीब अगाध गति, तोर कहा जगदीश ॥ ३९ ॥ कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच । दास गरीब जहानमें, तुम सर जोरा मीच ॥ ४० ॥ मरत मरत सब जग सुवा, लखै न इस्थिर ठौर । दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न और ॥ ४१ ॥ नादविन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन । दास गरीब पलक फना, जैसे बुद बुद लीन ॥ ४२ ॥ तिर कतलोंसे बोलते, रामानन्द सुजान । दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥ ४३ ॥ नीच मीचसे ना डरे, काल कुल्हाड अशीश । दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा जगदीश ॥ ४४ ॥ जड़िहों हाथ हथकडी, गले तौक जझीर । दास गरीब परख विना, यह वाणी गुणगीर ॥ ४५ ॥ परख निरख नहीं तोहिको, नीच कुलीन कुजात । दास गरीब अकल विना, वू जो कह यह बात ॥ ४६ ॥ हे बालक नीची कला, तुमही बोलो ऊँच । दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥ ४७ ॥ महुँके वरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन । दास गरीब मनी मरी, मैं आजिज आधीन ॥ ४८ ॥ मैं अविगत गतिसे परे, चारवेदसो दूर । दास गरीब दशो दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥ ४९ ॥ सकल सिंधु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ । दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥ ५० ॥ जात पाँत मेरे नहीं, नहीं बस्ती नहीं गाउँ । दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥ ५१ ॥ नाद विन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहीं गात । दास गरीब शबद सजग, नहीं किसीका साथ ॥ ५२ ॥ सब सङ्ग विछुरू नहीं, आदि अन्त बहु जाँहि । दास गरीब सकल बसौं, बाहर भीतर