कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(२४१)
माँहि॥५३॥ हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीर। दास गरीब अधर बसुँ, अविगत पुरुष कवीर॥५४॥ अनन्त कोटि सलिता बड़ो, अनन्त कोटि घर ऊँच। दास गरीब सदा रहँ, नहीं हमारे कूँच॥५५॥ पुहमी धरनी अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर। दास गरीब न दूसरा, हम समतूल नहिँ और॥५६॥ मैं माया मैं काल हूँ, मैं हँसा मैं वंस। दास गरीब दयाल हेम, हमहीं करे विध्वंस॥५७॥ ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव। दास गरीब प्राण पद, हम दासातन पीव॥५८॥ हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम। दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम॥५९॥ हम मौला सब मुल्कमें, मुल्क हमारे माँहि। दास गरीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाहिँ॥६०॥ हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश। दास गरीब हम नित रहँ, हम तजि जात हमेश॥६१॥ हमहीं लाल गुलाल हैं, हम पारस पद सार। दास गरीब अदालतंग, हम राजा संसार॥६२॥ हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश। दास गरीब तत्त्वपंजमें, हमहीं शब्द निवास॥६३॥ सुन स्वामी सत भाषहँ, झूठ न हमरो रक्ष। दास गरीब हम रूप विन, और सकल परपक्ष॥६४॥ हम रोवत हैं सृष्टिको, जो रोवति है मोहिँ। दास गरीब वियोगको, और न बूझै कोइ॥६५॥ मैं बूझूँ मैंही कहूँ, मैंही किया वियोग। गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग॥६६॥ चारो रूकुनमें हम फिरें, नहिँ आवें नहिँ जावैं। गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठावैं॥६७॥ रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह। गरीबदास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन॥६८॥ लगी महम गनीम पर, काल कटक कटकन्त। गरीबदास निर्भय कहैं, जो कोइ नाम जपन्त॥६९॥ मैं बालक मैं बृद्ध हूँ, मैंही
(२४२)
कबीरपंथी—
जवान जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥७०॥ गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह । गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥ ७१ ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीष । गरीबदास जल तरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥ ७२ ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैट्टू पाताल । गरीबदास दूँदत फिहूँ, हीरे माणिक लाल ॥ ७३ ॥ इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहि ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥ ७४ ॥ बोले रामानन्दजी हम घर बड़ा सुकाल । गरीबदास पूजा करें, सुकुट फई जद माल ॥ ७५ ॥ सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ज्ञान । गरीबदास सिरधर सुकुट, माला अटकी जान ॥ ७६ ॥ स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गर डार । गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥ ७७ ॥ क्योटी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥ ७८ ॥ मनकी पूजा तुम लखी, सुकुट माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ ७९ ॥ यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ ८० ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गको, छाडो आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥ ८१ ॥ सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाई रीत । गरीबदास गुदडी लगी, जन्म जात है बीत ॥ ८२ ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह । गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊँ थाह ॥ ८३ ॥ हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ । गरीबदास वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥ ८४ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन सुरारि । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥ ८५ ॥ दूधोंकी नदियाँ बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर सुकुट,
शब्दावली
(२४३)
स्वर्गपुरी अस्थान ॥ ८६ ॥ रतन जडाऊ मनुष सब, गण गंधर्व सब देव । गरीबदास उस धामकी, कैसे छाँहूँ सेव ॥ ८७ ॥ चारवेद गावैं उसे, सुरनर मुनी मिलाप । गरीबदास ध्रुव पुर जस, मिटिगये तीनों ताप ॥ ८८ ॥ नारद ब्रह्मा यश रटें, गावैं शेष गणेश । गरीबदास वैकुण्ठसे, और परे को देश ॥ ८९ ॥ सुनु स्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊँ तोय । गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोय ॥ ९० ॥ तीनलोकके जीव सब, विषय वासना भाय । गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥ ९१ ॥ कृष्ण विष्णु भगवानके, जहाँ गये हैं जीव । गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥ ९२ ॥ सुनु स्वामी तो सौ कहूँ, अगम द्वीपकी सैल । गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥ ९३ ॥ कहु स्वामी कहैं रहोगे, चौदह भुवन बिहण्ड । गरीबदास बीजक कहाँ, चलत प्राण औ पिण्ड ॥ ९४ ॥ बोलत रामानन्दजी, सुन कवीर करतार । गरीबदास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ॥ ९५ ॥ तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सदगुरु हम हंस । गरीबदास तुम रूप बिनु, और न दूजो बंस ॥ ९६ ॥ मैं भक्ता सुक्ता भया, किया कर्म कुलनाश । गरीबदास अविगत मिले, मेटी मनकी प्यास ॥ ९७ ॥ दोनहु ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय । गरीबदास हम कारने, उतरे मगहर जोय ॥ ९८ ॥ बोले रामानन्दजी, सुन कवीर सुजान । गरीबदास मुक्त भयो, उधरे पिंड औ प्रान ॥ ९९ ॥ गुष्ठी रामानन्दसे, काशी नगर मैझार । गरीबदास जिंद पीरकी, हम पाये दीदार ॥ १००
कवीर उक्ति धर्मदासप्रति ।
(गो. गरीबदास वचन ।)
हम साहब सतपुरुष हैं, यह सब रूप हमार । जिन्द कहें धर्मदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥ १०१ ॥ सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूँ सब जात अजात । गरीबदास जिन्दा कहे, मेरे दिवस
(२४४)
कवीरपंथी-
न रात ॥ १०२ ॥ बोले जिन्द कवीरजी, सुनु वानी धर्मदास । हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकास ॥ १०३ ॥ गरुडबोध बेदी रची, रामकृष्ण हैरान । लंकापर धाये जबे, तबका कहूँ बखान ॥ १०४ ॥ दुर्वास सुनि इन्द्रको, हुआ ज्ञान सम्वाद । दत्त तत्त्वमें मिल गये, जाघर वेद न वाद ॥ १०५ ॥ सिखबन्दी सतगुरुसही, चकवेज्ञानअमान । शीशकटा मन्सूरका, फेर दिया जिवदान ॥ १०६ ॥ नाभाको सतगुरु मिले, देवल नेका फेर । पिंडा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेरे ॥ १०७ ॥ रवी रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त । चलत बार पाये नहीं, धन सतगुरु भगवन्त ॥ १०८ ॥ ऐसी संगति जो मिले, भक्ति गही प्रह्लाद । नारदसे सतगुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥ १०९ ॥ चार मुक्ति वैकुंठ बट, सप्तपुरी सैलान । आगे धाम कवीरका, हंस न पावें जान ॥ ११० ॥ काया काशी मन मगहर, दोउके मध्य कवीर । काशी तज मगहर गये, पाया नहीं शरीर ॥ १११ ॥ काया काशी मन मगहर, दोउके वीच मुकाम । जहाँ जुलहदी घर किया, आदि अंत विसराम ॥ ११२ ॥ नौलख नानक नादमें, दसलख गोरख तीर । लाख दत्त संगत सदा, चरनो चरच कवीर ॥ ११३ ॥ नौलख नानक नादमें, दसलख गोरख पास । अनंत संत पदमें मिले, कोटि तैरे रैदास ॥ ११४ ॥ रामानन्दसे लक्ष गुरु, तारे शिष्यके भाय । चेलाकी गिन्ती नहीं, पदमें रहे समाय ॥ ११५ ॥ खोजी खालकमें मिले, ज्ञानीके उपदेश । सतगुरु पीर कवीर है, सब काहू परवेश ॥ ११६ ॥ मीरा बाई पद मिली, सतगुरु पीर कवीर । देहछताँ लौलीनहुइ, पाया नहीं शरीर ॥ ११७ ॥
शब्दावली
(२४५)
सद्गुरुकी स्तुति ।
मुसद्दस ।
मालूम हुआ वेद व कुरआँकी रकमसे । जाहिर है तेरी हमद वसना अहले कलमसे॥ क्या किलक लिखे हीमःगो वागे अरमसे । दुनियामें न कोई वाकिफ है वस्ले सनमसे॥ जो कुछ नजर आता है सो तेरेही करमसे । सब इल्मो अमल बरकत सद्गुरुके कदमसे १
जुजसायःकदम तेरे न इनसाँ का गुजारा । तदबीर नहीं तेरे शरणका है सहारा ॥ लिखते तेरी औसाफ लगे वहा किनारा । दिलदिदः रौशन करे मजम्हू हमारा ॥ पैदा कलम हरकत तुझ दीदः दमसे । सब इल्म व अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे॥२॥
है कौनसा बाजार तेरा इश्क जहां है । है कौन फिरोशिन्दः खरिदार कहाँ है ॥ हमराज कोई आशिके जाँबाज वहां है । जिस रम्ज की फहमीदको सर सिदकः शहाँ है ॥ सो हाथ लगे कोई न दीनार दिरम है । सब इल्मो अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥ ३ ॥
आई है जहां जेठ सो खुरशैद झलक है । सब तार फना जर्ः पा नूर झलक है॥ उमीद न कुछ आदम और जिन्नो मलिक है । है जाँ अमाँ बरुश तुही फितनः फलक है ॥ जुज तेरे न महरम कोई इन्सानके धरमसे । सब इल्मों अमल बरकत सद्गुरु की कदमसे ॥ ४ ॥ तू रहबर हो जिसकी करे रहनुमाई । फिलफौर सोई खुदमें लिया देख खुदाई ॥ हरजा तू है तुही है तुही अर्ज समावी । सदहा खाते गोता न इसरार सो पाई ॥ है फजल तेरा आजिजकी दीदः नम से । सब इल्म व अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥ ५ ॥
( २४६ )
कवीरपंथी—
गजल प्रारम्भः ।
बुल बुल्लों सुजदए बहार आया । इसके साथही पयाम यार आया ॥ आह व नालेके दिन गये हैं गुजर । दिल परागन्दा बरकरार आया ॥ खुल्द और जन्नते जिन्नों क्या जान । दिन बशाशतका बेशुमार आया ॥ शोर बरूतीके दिन गये हैं गुजर । नेकबरूतीका रोजगार आया ॥ मिहर सुरझद कवीर जिस पर हो । उसको है भेद वार पार आया ॥ फिर न कोई दवा दविश आजिज । हाथमें अपने जब शिकार आया ॥ १ ॥
नखले मुहब्बतका समर मुझको दिखा ऐ बागवाँ । तेरे बागमें उल्फते शिजर मुझको दिखा ऐ बागवाँ ॥ शफ़कत किया जो निहाल पर ताजा किया तो पालकर । भूला करम क्यों टालकर मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ सब खारो खसको खींचकर पाला है तूने सींचकर । बैठो क्यों आंखे मींचकर मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ खुद बागमें शामिल किया और पालकर कामिल किया । फिर काटना क्यों दिल दिया मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ आजिज पडा आजिज पडा ऊँधा हुआ पानी घडा । तुझ बिन भरे फिर कौन आ मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ २ ॥
बागवाँ बाग कुहनमें तेरे अशजार जिते । कोई है समर बरूश हैं पुर खार किते ॥ तुही खालिक तुही मालिक सभी तहरीक तेरी । तू शाहनशाह जहाँ फौजके सरदार किते ॥ सभी महकूम तेरे हाकिमे आला है तूही । तुही सरकार बडा छोटे हैं सरकार किते ॥ है हयात अबदी उनको जिसे तू बरूश अमाँ । जिन्दा है कोई कोई और हैं मुरदान किते ॥ आलमोंका तु खुदाबन्द फिक् सबकी तुझे । सबका दिलवर है तुही और हैं दिलदार किते ॥ नाम लेते हैं बहुत लोग तेरी दुनियामें । हंस है कोई कोई और
शब्दावली
(२४७)
बूतेमार किते ॥ आसमाँ और जमीँ काँपते कवीर कहे । आशि- कको खबर गो कि खबरदार किते ॥ पेशकश हाथ सर अपना ले गली यारमें आ । बेकीमतके वस्ल खरीदार किते ॥ जिस्को तू अमल बरुश है अलमस्त सोई । बे नशः के छूटे हैं सरशार किते ॥ सबका है खुदा तुही खुदाबन्दा नेक । बे बहा तू है समर बरुश समर बार किते ॥ आजिजको चखा लज्जते उल्फत ऐ गुल । गोबुलबुलो सद जानिवे हरचार किते ॥ ३ ॥
बुलबुलो खिजाँ गया अब आया है दिन बहार । गा गीत चहचहे सदा कर लै लोनेहार ॥ गुल्शनमें जाके मगज मुअत्तर कर अपनेको । क्या क्या है हुस्न खूब खिले गुल हैं पुर कत्तार ॥ कह जाग बूम झूम से अब दूर भागजा । खूबोंकी खूबियाँ तेरी आँखोंमें लगते खार ॥ वह वक्त क्या सुवारक व सायत सईद है । खुद वक्त बरुश आशिको माशूक दर किनार ॥ साहब कवीर होवे मिहबाँ जिस ऊपर । बे मिहनत सो आजिज हो दरिया पार ॥ ४ ॥
तुम साहब रहमान हो अगली मिहर मत छोड़िये । दया धरमके खान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ हम तो हैं दायम पुर खता इल्मो अमल कीजे अता । दुनियाँ व दीन सुल्तान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ हम इल्मो अकुमें हेच हैं जम कालके दर पेच हैं । तुम जछेआलीशान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ जान बरुश मुर्दा लाशका पर्दः ढकें कल्लाशका । तुम आलमीं खाकान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ नाचार आजिज जिऊ हम सामाँ नहीं कोई बहम । तुम साहबे सामान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ ५ ॥
दुशमन दिले शहजोर है छलबल भरा सो चोर है । निस दिन
(२४८)
कवीरपंथी
भरोसा तोर है सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जब गिरियः और जारी हुई जम जातना भारी हुई । तब आपकी यारी हुई सदा शुक्र बन्दीछोरका ॥ दारा सिकन्दर कुट गये सूफी कलन्दर लुट गये । कोई हंस तुझसे जुट गये सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ दरियाय दिलकी लहरमें सब बह गये इस बहरमें । पहुँचे कोई तेरे शहरमें सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जिसक यह तीनों भौन है उससे बचे कह कवन है । तूही सकल दुख दवन है सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जग जीवको मारा झुला जाहिद व आबिद सब भुला । अब मुक्तिका द्वारा खुला सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ अगला न रिश्ताः तोड़िये अपने कदमसे जोड़िये । आजिजका हाथ न छोड़िये सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ ६ ॥
सामा न सरे देखिये इस अहद हमारे । सब फितनः भरे देखिये इस अहद हमारे ॥ कोई न सुने पन्द न पहचान न देखे । अन्धे भरे देखिये इस अहद हमारे ॥ इल्म न अमल सब है अबस बादफरोशी । गोया घिरे देखिये इस अदह हमारे ॥ है कौन गुरु और कहाँ धर्म खुदा है । कोई न डरे देखिदे इस अहद हमारे ॥ नेकीसे भगे सारे है बेपार बदीका । जम सबको घेरे देखिये इस अहद हमारे ॥ इस अहदके आदमके अमल पर जो नजर कर । कोई न तरे देखिये इस अदद हमारे ॥ आई जो खिजा बाद गुलिस्तां में सब गुल । पजमुर्दा पड़े देखिये इस अहद हमारे ॥ जब आकर अब्र तेरी बारिशे बारों । सूखे लहर देखिये इस अहद हमारे । आजिजको बशारत हैं यह सतगुरुके शब्दसाख । सब खुशक हरे देखिये इस अहद हमारे ॥ ७ ॥
शम्बरवल्ली
(२४९)
मुबन्धनस
जुज मिहर तुम्हारी कहीं आराम न होवे । इस द्वार फना नेक सरन्जाम न होवे ॥ तदबीर व तकदीरसे कुछ काम न होवे । जिस जायमें इकता वह गुलन्दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ १ ॥ जब किशबरे हस्तीसे चले हन्स अदमको । किस शान व शौकतसे लिये शब्द अलमको ॥ तब ब्रह्म विचारा फिर जा चूम कदमको । बाजारमें आकरके जो पहचान सनमको ॥ फिर आशिके सौदा यह कभीखाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ २ ॥ बहदत है तुझे और नहीं कोई है सानी । सब ओर भ्रम लअवत इस देर दुखानी । गह खुशक गहे सञ्ज गहे सुबक गिरानी । वे वर्गसमर बाम चले बाद खिजानी ॥ पुर खार वह गुल्शन जहाँ गुल्फाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ३ ॥
गलतान सदहा बिसमिले नखचीरमें देखे । सुरगां बकफस जेरके जंजीरमें देखे ॥ जर्ब व जखम व कारी इस तीरमें देखे । तासीर अजब जालिमें रहगीरमें देखे ॥ वह राह था मुझको जहाँ दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ४ ॥
ऐ मेरे खिजर हाथ पकड़ आन हमारा । जुज तेरे करम फजल नहीं हमको सहारा ॥ है तेरी पनह आजिजे मिसकी विचारा । दिन गुजर गया यों है न कुछ काम सिधारा ॥ रुख अपना दिखा जल्दतर शाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ५ ॥
अव नसियां करम तेरे असर है कि नहीं । सदफे बाहर तेरे कोई गोहर है कि नहीं ॥ बागबां बागमें उल्फत का शजर है कि नहीं । कोई नखले मुहब्बतमें समर है कि नहीं ॥ मन मिस की तरफ तेरी नजर है कि नहीं ॥ १ ॥
( २५० )
कवीरपंथी—
टूँढे मुल्क आदम और जिन्नो परी । तुझ बिन नहीं चैन सद आफत भरी ॥ शबे फुरकत न कटी हाय कटी उग्र मेरी । बस्लकी रात की हयहात न तू बातकरी ॥ इस शबे हिजका आखिर को तो सेहू है कि नहीं ॥ २ ॥
गौवास जो सद गीतः लगातेही सुआ । मुहरा हाथ लगा और न कुछ काम हुआ ॥ जब बहर करम लुत्फ तेरा मौजमें आया । बैठेही साहिल पर न सो नअम इनआम दिया ॥ दिल दरियामें तेरे कोई लहर है कि नहीं ॥ ३ ॥
ऐबरुत बरुखाव होवे बेदार कभी । मुझगहगारको हो यार की दीदार कभी ऐ परदःनशी राज कर अफशार कभी निगह नेक होवे सोई गिरफ्तार कभी ॥ इस बन्देपर अगली सी मिहर है कि नहीं ॥ ४ ॥
दरपेशा सफर मुझको वफाकेश जता । शाफी मेरे हामी मेरे कर इल्म अता ॥ मुजरिम हूँ तेरा गरक गुनहगार खता । ऐ चश्मए फैज व रहमत मुझको बता ॥ आजिजका तेरी राहमें गुजर है कि नहीं ॥ ५ ॥
तरकीबबन्द ।
जबान मेरी बयान नुत्क असरदे । बदीद जाहिर व वातिन बसर दे ॥ न भूलूँ एक पल तुझ रह तेरी याद । शबो रोज हर शमो सहरदे ॥ जो नेमत दो जहां सो सब खदफ कर दिल सदफ नाम गोहरदे ॥ न सदीं दिनबदिन गर्मी तरकी। मुहब्बत मुर्शिदे अब्दुल देहदे ॥ खुदीको भूलकर बाखुद हूँ सरमस्त । शराबे इश्कका अपने खुमरदे । न जाहिर जिलवः दिखलाता परीह । उठाता इश्क आतश बोल परदे ॥ रुख खुर छिप रहा है अब कन्दर । खुश आँ वकतेके बुरकःदौर दिहरदे । न मुझसा
शब्दावली
(२५१)
और नालायक व नादार। तु सब लायक है खाली पूर करदे ॥ हमारे बद अमल पर मत नजर कर। सरन और नाम अपनेका अजरदे ॥ बहुत दिनका सगे दर हूँ मैं तेरा। न दुर दुर कर न दुर कर पेट भरदे ॥ ना जाऊँ दर बदर इक दरे उम्मीद। बचाले जान और जिवदान बरदे। मिहरकी बहर तू बेहद न पायान। मिहर कीजे मिहर कीजे अपनी लहरदे ॥ सगे दरको फिरा हरगिज न दर दर। मिहर कीजे मिहर कीजे मिहरकर॥१॥
तुही कुनसे किया कूनों मकाँको। तुही बरपा किया सब जिस्म व जाँको ॥ तुही सतपुर्ण ज्ञानी नाम तेरा। तुही बतला दिया नामे निशाँको ॥ किया तुहीने मलकुल मौत पैदा। तुही भेजा है सुरशिव मिहवाँको ॥ कहरेके वास्ते कर काल ज्वार। मिहर कर फिर किया अमनो अमाँको ॥ बनजमे इस जहाँ निर- गुन बनाना। किया पैदा हरी हर वेदरुवाँको। किय मकबूल और मकरुह व मरदूद। तुही खूबी दिया जन्नत जनाँको ॥ तेरे सब नाम हैं आराम बरुशें। वले सब वरुफ सतनाम सुबहाँको ॥ तेरे औसाफ लायक न मलायक। है क्या इमकान इन्साँकी जबाँको ॥ न जाना भेद कुछ हम्दे सरायां। बयों किस तौर कीजे लाबयाँको ॥ तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार। तुही बरुशे अद् और दोस्ताँको ॥ अलख तुही है कोई लख न पाया। ना जाने भेद तुझ राजे निहाँको ॥ तुही सब कुछ किया है सबमें मौजूद। तुही देता है हरकस हर जमाँको ॥ बहर खानो बहर शानो बहरशे। तुही था और तुही होगा तुही है ॥ २ ॥
हजारों पीर गैगाँबर बनाये। जुदा सब मजहबो मिह्वत चलाये ॥ नहीं वह नूर सद मासूर तारे। मिहर तुझ रुख मिहर दैजूर जाये ॥ नहीं लमअ सौसद शमअ शविस्तां। कि बरकत
(२५२)
कबीरपंथी—
तेरी दिन मशअल जलाये । शरीअत शाखकर शारी मुखालिफ नजाते राह इन्साँकों बताये ॥ नबी पीरों फकीरों कैल फरजन्द। सभी औतार धर अछह जताये ॥ सभोंमें बरतरी हैं राम और कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥ जिते मजहब हैं इस आलममें जारी । न राहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥ नहीं मज- हब सो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूजा चलाये ॥ किया सुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरपा दिल को झुकाये ॥ फँसे उसदाममें आराम जानाँ । जपे सब रामनहि सतनाम पाये पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें उधर छूरी उठाये ॥ किया तब रहम तू शुशैद हकीकी । जो साहब था सो सत सुकृत कहाये ॥ करे सब जीवके दुख दन्द तू दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥ ३ ॥
तेरे मस्तोंकी मस्तीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और दीवाना ॥ अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह अनलहकका बहाना ॥ कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई अन्दर जमीके जा छिपाना ॥ कोई गावे बजावे तान तोडे । नकल भांडोंकी सबने अकू ठाना ॥ हुए बेगानः सब अपने अमलसे । न पहचाने कोई अपनायगाना ॥ तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पीया लिया सो जान मुर्दोंका जिलाना ॥ नहीं भगवा तिलक कन्ठी न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥ हुआ जब अरुल से वह वरुल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥ तेरी बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकू आदमके ठिगाना ॥ मुअत्तर मगज-उसबूसे हुआ जब । तो दानाईको खो बैठे हैं दाना ॥ हुए बेखुद खुदीको खोय बैठे । अब तक तीर पहुँचा बरनिशाना ॥
शब्दावली
(२५३)
किते पर पा किये परवाज बाला । जमींपर फिर फिर उनको है आना ॥ ४ ॥
पिला पुर प्याला कर ऐ मेरे साकी । रहेगा नाम बन्दी छोर बाकी ॥ यह चक्की चल रही गरदून गरदाँ । जो खायो पीसकर सब नेक मुर्दा ॥ बले जाते हैं पीरोपीर दामाँ । हकीकत क्या वहाँ फरऊन धामाँ चर्खे चक्की है और सब जीव दाना । मियाँन मेख मुर्शिद मिहरबानाँ ॥ मियामे मेख मुर्शिदके कदमाँ लग । अलग बच जायगा मत हो हिरासाँ ॥ जिधर जावे उधर धर पीस डाले । जमीन और आसमाँ घर बन बियाबाँ ॥ पिये ब्रह्मा हरी हर कृष्ण राघो । पिये नौनाथ और जाहिद बुजुरगाँ ॥ बचे कोई न कर सदहा जो तदबीर । बचौपानी बनाया मेश गुरगाँ ॥ किया कब्जेमें सबके जिस्म व जाँ को । पड़ा पीछे कवी यह नफ़श शैताँ ॥ यह सब खिलकत खोरिश जमकी रोजीनः ॥ मलायक क्या परी और जिन्नोइन्साँ ॥ यह बैठा अकृपर सबके दिल भूत । जिधर चाहे उधर करदे परीशों ॥ जिधर यह भाग जावे आदमीजाद । चमकती सैफ हर जानिब नुमायाँ ॥ बले दन्दान जेरीं कालके सब । यह मुश्किल तुझ सिवा होवे न आसाँ ॥ वहाँ कैल मकाँ आजिजमुकीमाँ । तुही गफ़फ़ूर और तुही रहीमाँ ॥ ५ ॥
॥ तरजीआ बन्द ॥
ऐके दर परदये शुक्र गुफ़्तार । जल्द वह जलवः कोजिये इजहार ॥ सुझे वह जाम भर पिला साकी । मस्त हूँ तेरे इश्कमें सरशार ॥ हर तरफ़ लौलियान लछामा । इस्तलात इनका है अजाबुन्नार ॥ जाहिदोंके जहदमें मिलादे खाक । आबिदोंके न दिलमें सबों करार ॥ ओट तेरी बचाव चोट उनके । मैं हूँ इन्तहा व दुश्मनाने बकन्नार ॥ मंजिले दूर तोशए राह नहीं । मैं पियादा
(२५४)
कबीरपंथी-
व वह हमरहान सवार ॥ दस्तगीरी कर ऐ खुजिस्तः हकीर । दूईका परदःअज मियान बरदार ॥ मैं फकीर और मेरा गनीम गनी । न मुकाबिल हो मुफलिसो जरबार ॥
कोई बाकी रहे न सबमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दीछोर ॥१॥ जिस्की जुल्फोंको देखकर लाला । दाग हसरतसे दिल हुआ काला ॥ सद गुलिस्ताँ निसार खाक कदम । बुलबुलें जिस लिये करे नाला ॥ दीद बरदीद है न दीद बदीद । माह पर आन कर पड़ा हाला ॥ तुही खालिक हुआ तुही मखलूक । तुही पैदा किया तुही पाला ॥ जब उठा पांच तीनका झंडा । सारे नामो निश्राँ मिटा डाला ॥ तुही जाहिर है और तुही बातिन । तुही जेरीन और तुही बाला ॥ कदम खाक तेरेकी बरकात । दुश्मने सद ब जेर पामाला ॥ सिर्फ तेरी मिहरसे यह जग जीव । वे गुमाँ लामकान ऊपर चाला ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दीछोर ॥२॥ वे अदद आलमीन् परवर है । ओलिया अम्बियाय सरवर है ॥ बन्दः मुजरिमका जुर्म करदे मुआफ । तू रहीमो करीम बरतर है ॥ जंग मैदानमें हूँ पड़ा घायल न सनाम सैफ ढाल बकतर है ॥ मन मजह्म का तू है जर्गाह । दिले दिलगीरका तू दिलबर है ॥ मने मिसकीन से अपना रुख मत फेर । मुझ ले जाय तेराहि दर है ॥ अब किधर जाऊं छोड दामन को । तेरी साये कदम मेरा घर है कर जफा या वफा तुझे सब जेब । मुझे मनजूर जो तेरी सिर है ॥ हैं हुमायूँ नसीब सो जिनके । मूनिसे महे मुदाम दरबर है ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥३॥
देख उस रंग रूप रोगनको । तब लिया जान बाजी गर फनको ॥ शरर अफसाने दीदः हों ताजः । देख जब अपने
शब्दावली
(२५५)
रश्क गुल्शनको ॥ गममें गिरियां खबर न उरियानी । प्यार तिनको न रहे इस तनको ॥ दिल चपल चुलबुला हुआ साकिन । मार कर मुर्दा कर दिया मनको ॥ खसो खासाकसे जब हुआ पाक । पार आ बैठे मार आसनको ॥ तुझसा कादर व मुझसा बे मकदूर । संग पारस मिला जो आहनको ॥ यह गलत मसलए आह और कहो । जिनको पहनाव खास जौशनको ॥ जरूम सब भर व इक नजर न हजर । पारचा पाट टाट सोजनको ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥४॥
दे बसा आन गैबका घेरा । जल्द कर मेरे कूचेमें फेरा ॥ जाल खंजर न छोड़ बिस्मिलको । ऐ दिलराम काम कर मेरा ॥ कारपरदाज तू गरीब निवाज । खानये दिल मेरे करो देरा ॥ हूय खुरशेदकी झलक झिलमिल । नूर हों पूर दूर अंधेरा ॥ भागजा जहां पड़े व पा जंजीर । सब जवानिब है कालका घेरा ॥ रुबाब गफलत्से कर कर दिया बेदार । बेहद अहसान बन्दः पर तेरा ॥ बिन तेरे कौन कब जग जीव । तूही साहब है और सब चितेरा ॥ हाथ थर कर जिसे उठाया तू ॥ बेगुमाँ उसका पारहो बेरा ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीरबन्दी छोर ॥६॥
बरुश तू दयाल मुझको किन्लेगाह । रोजो शब तूही तू है शाम पगाह ॥ कीजै सुहरम व दीजै अकल हिलाल । रख मेरा जामः पाक जेर निगाह ॥ होत गाफिल न तुझसे लमह कोई । बरुशदे मुझको मेरे शाहन्शाह ॥ यह दगाबाज दिल ये सुरदारा । रख पनह खुद जे हीलये रोबाह ॥ ऐ मेरे जान ऐ जानाँ । मुन्तजिर जलवः तेरे दीदः बराह ॥ हूबहु तेरे हूँ मैं किस ढबसे । हूँ पशेमाँ फेलनामा स्याह । कोई बाकी रहा नहीं चारा । लैक
(२५६)
कबीरपंथी—
दम सर्द तोबः नालः व आह ॥ रू रहई रही न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥ न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥६॥
इस जहाँ का न काम बाकी । एक तेरा सत्य नाम बाकी है । कुल पानी जो दीदः मनजरमें । सार शब्द पयाम बाकी है ॥ हक तेरेसे अदा न कोई ऐ हक । हक तेरा लाकलाम बाकी है ॥ सब चले जायँगे रहे न कोई । इक तेराही कयाम बाकी है ॥ देता है तू जो खास खासोंको । शरबते नोश जाम बाकी है ॥ परदेसे पैरुवाँका रहबर है । जल्सए खासों आम बाकी है ॥ तेरी हमदो सना रहै कायम । जब तलक सुबह व शाम बाकी है ॥ होखुका जोर दूरका आजिज । अब तेरा यह तमाम बाकी है ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥७॥
तरजिआ बन्द ॥ २ ॥
न तुझ बिन कोई सीधी राह पाया । भटकते मरगया घरको न आया ॥ जो कुफ़रस्तानमें खुद खुद फँसाया । रहे पुरखार दौरों ने दिखाया ॥ पकड़ जमराजने उसको भुलाया । पड़े सुरगों सब सध्यादके फंद ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥१॥ कभी तुझ बिन न जिवका कुफ़रूटे यह फिर फिर जाय कर उसहीसे जूटे ॥ यह दानाईकी दौलत सारि लूटे । तमीज और अकू दानिश उसकी छूटे ॥ हुआ सरमस्त इसमें फिर न फूटे । मिलाया बागवान्ने उससे पैबन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द ॥ खुदावन्दा खुदा- वन्दा खुदावन्द ॥ २ ॥ पकड़ कर हाथ अपनी रह दिखादे । सफीना सीनः पर नाम लिखादे ॥ न भूलूं फिर सबक सुझको
शरवनाथ
चैत्र शुद्ध ५, संवत् १९८४ वि० की कबीरपंजी महासभा कौदरमालके कसियथ सत बहुरोश फोटो
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शब्दावली
(२५७)
सिखादे । किताबें अछकी ताको रखादे ॥ रहे बाकी न कोई सब उठादे । खयाले खाम अज दिल चन्द दर चन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥३॥ बबजमें खुद परिस्तां कौन जावे वहांकी ला खबर हमको सुनावे ॥ गया जो फिर कभी कोई न आवे । जो आवे सो खबर पिछली भुलावे । न भूले तौ कभी इकता कहावे । मिहर तेरीसे पावें जीव आनन्द ॥ छुडाले बन्देको अब हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥४॥ इस आसी बन्दःको अपने करमसे बचाले पाँच और तीनों भरमसे ॥ गिरह दिल खोलकर महरम मरमसे । के रखलीजे पनह अपनी शरमसे ॥ अरज करता है आजिज दीदः नमसे । कदम बरकत तेरी हो फाल फरखुन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥५॥२१॥
छन्द ।
अब सन्त सुरति सम्हाल देखो कन्त निज पहचानिये । अगम अबिचल अलख लखि निह अन्त वाको जानिये ॥ लखि वार पार है सोई साहब ज्ञान आँख जो तानिये । देख दो तीर कबीर जहाँ तहाँ दूसरो नहीं मानिये ॥ १ ॥ अविगत अलेख भौ लेख नहीं सो एक बन्दी छोर है । नर देह वाते नेह काजे भयो अब निसि भोर है ॥ जो नाम रत काल डरत है हरत सो जम जोर है । बड भाग अटल सुहाग उनको जिहि भरोसा तोर है ॥२॥ लोमस भुशुंडके झुंड ऋषिमुनि जासु गुन वर्णन करें । सनकादि नारद धनुक गुप्त सेवत चित् चरणन धरे ॥ ऋषभ आदि योगेश्वर जनक नृप सत पद चरणन परे । बहु कवीरपंथी शब्दावली ९
(२५८)
कवीरपंथी-
सिद्ध सो ऋषि गुरुड गोरख आय तुम शरणन तरे ॥३॥ कोटिन पयम्बर पीर गये भव तीर नाम कवीरते । केहि कहत बनत अगनित ऋषि भये अमर सत शरीरते ॥ धरमदासको प्रभु खास निजकर बिलग नीरो छीरते । सत्तनाम मिल निज धाम दीनो काम एक पद थीरते ॥४॥ विष बेलि फल संसार है यह झार विष जेहि तेहि भरा । विष अण्ड पिण्ड समस्त है विष वारिमय भव सागरा ॥ बिलगाय विषते कौन ऐसो भवन तीनमें नागरा । करि कोटियतन नज्ञान रतन है मिटे किमियहझा रा ॥५॥ जहाँ काम क्रोध और लोभ मोहते सकल पूरण पावई । सब रोम रोममें विष भरा है अमृत नाहि समावई ॥ जग विषम आग है लागि तुम बिनु ताहि कौन बुझावई । जीव कठिन काल कराल वशते बन्दीछोर छुडावई ॥६॥ स्तुति करें और आरति सब हंस मिलि सत लोकमें । सतपुरुष आय बचाय खुद जीव जरत यमकी झोंकमें ॥ न पाव कोइ उपाय साहब धाय धर जीव शोकमें । अरुझा सबहिं सरुझा न कोई जीव लोक वेद अथोकमें ॥७॥ सत्तलोक हंस विलोक आनंद बजत खनहद तूर है । प्रभु आरति अरु स्तुति करत सब सहज और अंकूर है । इच्छा सोहं अचित्त अक्षर शिरधरे पद धूर है । यक रोम जासु प्रकाश ऐसो कोटि चन्दा सूर है ॥ ८ ॥ यह तीन लोक सशोक देखिये आय आनन्द कन्द है । दशदिशि षसर यम जाल है सब जीव फन्द तेहि फन्द है । गुरु वैद्य साँचा वेदवाचा हर लियो दुख द्रन्द है । भव भीर हरण कवीर दासन दास परमानन्द है ॥ ९ ॥
कवित ।
पावन पतित जीव दीननके हितु प्रभु, तुही गुरु पुरुष कहायो