कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी
भरोसा तोर है सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जब गिरियः और जारी हुई जम जातना भारी हुई । तब आपकी यारी हुई सदा शुक्र बन्दीछोरका ॥ दारा सिकन्दर कुट गये सूफी कलन्दर लुट गये । कोई हंस तुझसे जुट गये सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ दरियाय दिलकी लहरमें सब बह गये इस बहरमें । पहुँचे कोई तेरे शहरमें सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जिसक यह तीनों भौन है उससे बचे कह कवन है । तूही सकल दुख दवन है सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जग जीवको मारा झुला जाहिद व आबिद सब भुला । अब मुक्तिका द्वारा खुला सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ अगला न रिश्ताः तोड़िये अपने कदमसे जोड़िये । आजिजका हाथ न छोड़िये सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ ६ ॥
सामा न सरे देखिये इस अहद हमारे । सब फितनः भरे देखिये इस अहद हमारे ॥ कोई न सुने पन्द न पहचान न देखे । अन्धे भरे देखिये इस अहद हमारे ॥ इल्म न अमल सब है अबस बादफरोशी । गोया घिरे देखिये इस अदह हमारे ॥ है कौन गुरु और कहाँ धर्म खुदा है । कोई न डरे देखिदे इस अहद हमारे ॥ नेकीसे भगे सारे है बेपार बदीका । जम सबको घेरे देखिये इस अहद हमारे ॥ इस अहदके आदमके अमल पर जो नजर कर । कोई न तरे देखिये इस अदद हमारे ॥ आई जो खिजा बाद गुलिस्तां में सब गुल । पजमुर्दा पड़े देखिये इस अहद हमारे ॥ जब आकर अब्र तेरी बारिशे बारों । सूखे लहर देखिये इस अहद हमारे । आजिजको बशारत हैं यह सतगुरुके शब्दसाख । सब खुशक हरे देखिये इस अहद हमारे ॥ ७ ॥