कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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बूतेमार किते ॥ आसमाँ और जमीँ काँपते कवीर कहे । आशि- कको खबर गो कि खबरदार किते ॥ पेशकश हाथ सर अपना ले गली यारमें आ । बेकीमतके वस्ल खरीदार किते ॥ जिस्को तू अमल बरुश है अलमस्त सोई । बे नशः के छूटे हैं सरशार किते ॥ सबका है खुदा तुही खुदाबन्दा नेक । बे बहा तू है समर बरुश समर बार किते ॥ आजिजको चखा लज्जते उल्फत ऐ गुल । गोबुलबुलो सद जानिवे हरचार किते ॥ ३ ॥
बुलबुलो खिजाँ गया अब आया है दिन बहार । गा गीत चहचहे सदा कर लै लोनेहार ॥ गुल्शनमें जाके मगज मुअत्तर कर अपनेको । क्या क्या है हुस्न खूब खिले गुल हैं पुर कत्तार ॥ कह जाग बूम झूम से अब दूर भागजा । खूबोंकी खूबियाँ तेरी आँखोंमें लगते खार ॥ वह वक्त क्या सुवारक व सायत सईद है । खुद वक्त बरुश आशिको माशूक दर किनार ॥ साहब कवीर होवे मिहबाँ जिस ऊपर । बे मिहनत सो आजिज हो दरिया पार ॥ ४ ॥
तुम साहब रहमान हो अगली मिहर मत छोड़िये । दया धरमके खान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ हम तो हैं दायम पुर खता इल्मो अमल कीजे अता । दुनियाँ व दीन सुल्तान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ हम इल्मो अकुमें हेच हैं जम कालके दर पेच हैं । तुम जछेआलीशान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ जान बरुश मुर्दा लाशका पर्दः ढकें कल्लाशका । तुम आलमीं खाकान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ नाचार आजिज जिऊ हम सामाँ नहीं कोई बहम । तुम साहबे सामान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ ५ ॥
दुशमन दिले शहजोर है छलबल भरा सो चोर है । निस दिन