कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४६ )
कवीरपंथी—
गजल प्रारम्भः ।
बुल बुल्लों सुजदए बहार आया । इसके साथही पयाम यार आया ॥ आह व नालेके दिन गये हैं गुजर । दिल परागन्दा बरकरार आया ॥ खुल्द और जन्नते जिन्नों क्या जान । दिन बशाशतका बेशुमार आया ॥ शोर बरूतीके दिन गये हैं गुजर । नेकबरूतीका रोजगार आया ॥ मिहर सुरझद कवीर जिस पर हो । उसको है भेद वार पार आया ॥ फिर न कोई दवा दविश आजिज । हाथमें अपने जब शिकार आया ॥ १ ॥
नखले मुहब्बतका समर मुझको दिखा ऐ बागवाँ । तेरे बागमें उल्फते शिजर मुझको दिखा ऐ बागवाँ ॥ शफ़कत किया जो निहाल पर ताजा किया तो पालकर । भूला करम क्यों टालकर मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ सब खारो खसको खींचकर पाला है तूने सींचकर । बैठो क्यों आंखे मींचकर मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ खुद बागमें शामिल किया और पालकर कामिल किया । फिर काटना क्यों दिल दिया मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ आजिज पडा आजिज पडा ऊँधा हुआ पानी घडा । तुझ बिन भरे फिर कौन आ मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ २ ॥
बागवाँ बाग कुहनमें तेरे अशजार जिते । कोई है समर बरूश हैं पुर खार किते ॥ तुही खालिक तुही मालिक सभी तहरीक तेरी । तू शाहनशाह जहाँ फौजके सरदार किते ॥ सभी महकूम तेरे हाकिमे आला है तूही । तुही सरकार बडा छोटे हैं सरकार किते ॥ है हयात अबदी उनको जिसे तू बरूश अमाँ । जिन्दा है कोई कोई और हैं मुरदान किते ॥ आलमोंका तु खुदाबन्द फिक् सबकी तुझे । सबका दिलवर है तुही और हैं दिलदार किते ॥ नाम लेते हैं बहुत लोग तेरी दुनियामें । हंस है कोई कोई और