कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 968 में से
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सद्गुरुकी स्तुति ।
मुसद्दस ।
मालूम हुआ वेद व कुरआँकी रकमसे । जाहिर है तेरी हमद वसना अहले कलमसे॥ क्या किलक लिखे हीमःगो वागे अरमसे । दुनियामें न कोई वाकिफ है वस्ले सनमसे॥ जो कुछ नजर आता है सो तेरेही करमसे । सब इल्मो अमल बरकत सद्गुरुके कदमसे १
जुजसायःकदम तेरे न इनसाँ का गुजारा । तदबीर नहीं तेरे शरणका है सहारा ॥ लिखते तेरी औसाफ लगे वहा किनारा । दिलदिदः रौशन करे मजम्हू हमारा ॥ पैदा कलम हरकत तुझ दीदः दमसे । सब इल्म व अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे॥२॥
है कौनसा बाजार तेरा इश्क जहां है । है कौन फिरोशिन्दः खरिदार कहाँ है ॥ हमराज कोई आशिके जाँबाज वहां है । जिस रम्ज की फहमीदको सर सिदकः शहाँ है ॥ सो हाथ लगे कोई न दीनार दिरम है । सब इल्मो अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥ ३ ॥
आई है जहां जेठ सो खुरशैद झलक है । सब तार फना जर्ः पा नूर झलक है॥ उमीद न कुछ आदम और जिन्नो मलिक है । है जाँ अमाँ बरुश तुही फितनः फलक है ॥ जुज तेरे न महरम कोई इन्सानके धरमसे । सब इल्मों अमल बरकत सद्गुरु की कदमसे ॥ ४ ॥ तू रहबर हो जिसकी करे रहनुमाई । फिलफौर सोई खुदमें लिया देख खुदाई ॥ हरजा तू है तुही है तुही अर्ज समावी । सदहा खाते गोता न इसरार सो पाई ॥ है फजल तेरा आजिजकी दीदः नम से । सब इल्म व अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥ ५ ॥